‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह दोबारा आवंटित करने पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से पूछे सवाल, आदेश सुरक्षित

कलकत्ता हाईकोर्ट ने सोमवार को चुनाव आयोग से पूछा कि इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) की ओर से पहले आवेदन किए जाने के बावजूद ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस (DTC) को क्यों आवंटित किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारियों को अदालत के सामने निष्पक्ष रहना चाहिए और उनके फैसलों के पीछे उचित कारण होने चाहिए।

जस्टिस कृष्णा राव ने ISF की याचिका पर लंबी सुनवाई पूरी होने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया।

यह विवाद 6 अक्टूबर को होने वाले नंदीग्राम विधानसभा उपचुनाव से जुड़ा है। ISF ने हाईकोर्ट का रुख करते हुए कहा कि उसने 2024 लोकसभा चुनाव और 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसके आवेदन के बावजूद यह चिन्ह DTC को दे दिया गया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस राव ने पूछा कि 17 सितंबर को चुनाव आयोग के सामने मौजूद ISF के आवेदन पर विचार क्यों नहीं किया गया।

कोर्ट ने यह भी पूछा कि DTC को यह चुनाव चिन्ह आवंटित करते समय अधिकारियों ने किस प्रावधान पर भरोसा किया और क्या समय की कमी का हवाला देकर चुनाव आयोग किसी भी चिन्ह को किसी अन्य दल को दे सकता है।

चुनाव आयोग के आचरण पर सवाल

चुनाव आयोग ने कोर्ट में कहा कि चुनाव चिन्हों का आवंटन उसके विवेकाधिकार के दायरे में आता है और DTC को ‘लिफाफा’ तथा ISF को ‘अलमारी’ चुनाव चिन्ह देने का फैसला कानून के अनुसार किया गया।

इस पर जस्टिस राव ने कहा कि अधिकारियों को अदालत के सामने निष्पक्ष रहना चाहिए। सुनवाई के दौरान वकीलों के बीच हुई बातचीत को देखते हुए कोर्ट ने चुनाव आयोग और निजी प्रतिवादी के बीच किसी तरह की मिलीभगत की संभावना को लेकर भी सवाल उठाया।

चुनाव आयोग के वकील ने इस बात से इनकार किया कि वह DTC के वकील से निर्देश ले रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि यह कहना सही नहीं होगा कि उन्हें किसी राजनीतिक दल की ओर से निर्देशित किया जा रहा था।

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जस्टिस राव ने चुनाव आयोग के वकील से कहा कि वह एक संवैधानिक संस्था की ओर से पेश हो रहे हैं, इसलिए अदालत के हर सवाल का जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए और किसी अन्य की मदद पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही ISF को ‘लिफाफा’ चिन्ह पर कोई पूर्ण अधिकार न हो और उसका आवेदन खारिज किया जा सकता हो, लेकिन ऐसी अस्वीकृति कारणों के साथ होनी चाहिए।

ISF ने फैसले को मनमाना बताया

ISF की ओर से सीनियर एडवोकेट बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने कहा कि किसी प्राधिकरण को दिया गया विवेकाधिकार तर्कसंगत और उचित तरीके से इस्तेमाल किया जाना चाहिए और इसे पूर्ण या निरंकुश अधिकार नहीं माना जा सकता।

उन्होंने दलील दी कि उपचुनाव 2026 विधानसभा चुनाव की ही निरंतरता है और सवाल उठाया कि उस चुनाव में ISF द्वारा इस्तेमाल किया गया चिन्ह उपचुनाव के दौरान उससे कैसे लिया जा सकता है।

भट्टाचार्य ने चुनाव आयोग के फैसले को अवैध और मनमाना बताया। उन्होंने न्यायहित में उपचुनाव टालने की भी मांग की और कहा कि इससे न तो विधानसभा के गठन पर असर पड़ेगा और न ही कोई संवैधानिक संकट पैदा होगा।

जब जस्टिस राव ने पूछा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने और नामांकन, जांच तथा नाम वापसी की प्रक्रिया पूरी होने के बाद कोर्ट किस हद तक हस्तक्षेप कर सकता है, तब भट्टाचार्य ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला दिया। उनके अनुसार उस फैसले में चुनावों के उचित संचालन को सुनिश्चित करने के लिए अदालत के हस्तक्षेप की गुंजाइश बताई गई थी।

चुनाव आयोग ने नियमों के तहत आवंटन का बचाव किया

चुनाव आयोग के वकील जिश्नु चौधरी ने कहा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव समाप्त होने और 4 मई को परिणाम घोषित होने के साथ ही ISF को दिया गया ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह भी प्रभावी नहीं रहा।

उन्होंने कहा कि आम चुनाव समाप्त होने के बाद गैर-मान्यता प्राप्त दलों को दिए गए चुनाव चिन्ह फिर से मुक्त चिन्ह बन जाते हैं और उन्हें किसी अन्य दल को आवंटित किया जा सकता है।

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चौधरी के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को पार्टी के आरक्षित ‘फूल और घास’ चिन्ह को बंद कर दिया था। नंदीग्राम और रेजीनगर उपचुनाव के लिए नामांकन 16 सितंबर को ही समाप्त हो चुके थे, इसलिए दोनों गुटों के उम्मीदवारों के नामांकन खारिज होने की स्थिति बन सकती थी।

उन्होंने कहा कि दोनों गुटों के अनुरोध के बाद चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए 18 सितंबर को उन्हें मुक्त चुनाव चिन्ह आवंटित किए।

चौधरी ने कहा कि किसी भी दल को किसी मुक्त चुनाव चिन्ह पर पूर्ण अधिकार का दावा नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि उपचुनाव में किसी दल को ऐसा चिन्ह देने पर कोई कानूनी रोक नहीं है।

उन्होंने आम चुनाव और उपचुनाव के बीच अंतर भी बताया। उनके अनुसार, सदन भंग होने पर आम चुनाव होता है, जबकि किसी सीट के खाली होने पर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत उपचुनाव कराया जाता है।

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चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि केवल नामांकन दाखिल कर देने से ISF के पक्ष में किसी चिन्ह पर कोई अधिकार पैदा नहीं होता। ISF ने दावा किया था कि उसने 18 सितंबर के आदेश से पहले ही ‘लिफाफा’ चिन्ह का उल्लेख करते हुए नामांकन दाखिल कर दिया था।

चुनाव आयोग ने यह भी कहा कि ISF नंदीग्राम में नए आवंटित ‘अलमारी’ चिन्ह के साथ प्रचार शुरू कर चुका है और आरोप लगाया कि याचिका का उद्देश्य चुनाव रोकना है।

DTC ने कहा, किसी खास चिन्ह पर ISF का अटूट अधिकार नहीं

डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश वकील ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुट, ममता तृणमूल कांग्रेस और डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस, चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त कर चुके हैं।

DTC की ओर से दलील दी गई कि ISF किसी खास चुनाव चिन्ह पर अटूट अधिकार का दावा नहीं कर सकता।

सुनवाई के दौरान जस्टिस राव ने मौखिक रूप से कहा कि अधिकारियों को ऐसे तरीके से काम करना चाहिए जिससे भविष्य में जटिलताएं पैदा न हों और अदालतों पर अनावश्यक मुकदमों का बोझ न पड़े।

नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर उपचुनाव 6 अक्टूबर को होने हैं, जबकि मतगणना 9 अक्टूबर को होगी।

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने ISF की याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।

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