पार्टनर की मौत के बाद ‘अकाउंट ब्लॉक’ होने पर चेक बाउंस एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी पार्टनर की मृत्यु के बाद बैंक खाता “अकाउंट ब्लॉक” होने के कारण चेक बाउंस होता है, तो नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (एनआई एक्ट) की धारा 138 के तहत आपराधिक कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती। अदालत ने कहा कि धारा 138 का प्रावधान केवल खाते में अपर्याप्त धनराशि (फंड्स की कमी) होने की स्थिति में ही लागू होता है। जीवित पार्टनर के खिलाफ निचली अदालत में लंबित आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए जस्टिस एच.पी. संदेश ने माना कि केवल दो पार्टनरों वाली पार्टनरशिप फर्म एक पार्टनर की मृत्यु के साथ ही स्वतः समाप्त हो जाती है, और इसके बाद किसी पुराने हस्ताक्षरित खाली चेक पर बाद की तारीख डालकर उसे बैंक में प्रस्तुत करना कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला बेंगलुरु स्थित एक्सएलआईआई एडिशनल चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट (सीएमएम) की अदालत में लंबित सी.सी. संख्या 25126/2018 से जुड़ा था, जहां शिकायतकर्ता ने एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत एक निजी शिकायत दर्ज कराई थी।

20 जून 2011 को आरोपी संख्या 2 (टी.एम. प्रभाकरैया) और आरोपी संख्या 3 (वी.बी. नागराज, वर्तमान याचिकाकर्ता) के बीच ‘श्री विनायक ट्रेडर्स’ नाम से एक पार्टनरशिप फर्म का गठन हुआ था। यह फर्म खाद और कीटनाशकों का कारोबार करती थी, जिसकी आपूर्ति शिकायतकर्ता कंपनी मैसर्स पेरेग्रीन फॉस्फेट (पी) लिमिटेड करती थी।

व्यापारिक लेन-देन के दौरान शिकायतकर्ता ने फर्म के हस्ताक्षरित खाली चेक अपने पास रख लिए थे, जिन पर आरोपी संख्या 2 और 3 के हस्ताक्षर थे। फर्म का सारा कामकाज आरोपी संख्या 2 ही संभालते थे, जबकि आरोपी संख्या 3 व्यवसाय के संचालन में शामिल नहीं थे। 21 मई 2017 को आरोपी संख्या 2 का निधन हो गया। इसके बाद कर्नाटक बैंक की हूविनाहदगली शाखा को उनकी मृत्यु की सूचना देकर फर्म का बैंक खाता ब्लॉक करवा दिया गया।

शिकायतकर्ता के प्रतिनिधियों ने आरोपी संख्या 2 के अंतिम संस्कार में भाग लिया था और 6 जून 2017 को एक लिखित पावती देकर फर्म से बचा हुआ स्टॉक भी वापस ले लिया था। इसके बावजूद, आरोपी संख्या 2 की मृत्यु के लगभग दस महीने बाद, 28 मार्च 2018 को शिकायतकर्ता ने अपने पास रखे हस्ताक्षरित खाली चेकों में से एक चेक यह दावा करते हुए बैंक में प्रस्तुत कर दिया कि इसे उसी तारीख को जारी किया गया था।

बैंक ने “अकाउंट ब्लॉक” (क्रमांक 21-25 में दर्ज स्थिति) का कारण बताते हुए चेक बिना भुगतान के लौटा दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने तीनों आरोपियों को कानूनी नोटिस भेजा। आरोपी संख्या 1 को भेजा गया नोटिस “पार्टी चली गई” (पार्टी लेफ्ट), आरोपी संख्या 2 को भेजा गया नोटिस “पार्टी की मृत्यु हो गई” (पार्टी एक्सपायर्ड) के विवरण के साथ लौटा, जबकि आरोपी संख्या 3 ने नोटिस का जवाब दिया। इसके बाद भी शिकायतकर्ता ने एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत मुकदमा दायर कर दिया और निचली अदालत ने इस पर संज्ञान ले लिया। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश विद्वान वकील बी.एम. हलस्वामी ने दलील दी कि चेक केवल इसलिए वापस हुआ क्योंकि हस्ताक्षरकर्ता की मृत्यु के कारण खाता ब्लॉक था। उन्होंने कहा कि आरोपी संख्या 2 की मृत्यु होते ही दो पार्टनरों वाली फर्म का अस्तित्व समाप्त हो गया और आरोपी संख्या 3 अकेले पार्टनरशिप जारी नहीं रख सकते थे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिकायतकर्ता को 21 मई 2017 को ही पार्टनर के निधन की पूरी जानकारी थी, ऐसे में यह दावा करना पूरी तरह असंभव है कि आरोपी संख्या 2 और 3 ने 28 मार्च 2018 को चेक जारी किया था।

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अपनी दलीलों के समर्थन में याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स बनाम सेठ गोविंदराम शुगर मिल्स के फैसले का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि पार्टनरशिप एक्ट की धारा 42(सी) और धारा 31(1) के तहत यदि दो में से एक पार्टनर की मृत्यु हो जाए, तो फर्म अपने आप समाप्त हो जाती है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के फरहाद सूरी व अन्य बनाम प्रवीण चौधरी व अन्य (जिसमें पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के राजेश मीणा बनाम हरियाणा राज्य का संदर्भ लिया गया था) का हवाला देते हुए बताया कि ‘अकाउंट ब्लॉक’ का मामला धारा 138 के दायरे में नहीं आता। उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के क्रिमिनल पिटीशन संख्या 11207/2025 और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के अरविंदरजीत कौर बनाम हरियाणा राज्य व अन्य के निर्णयों पर भी भरोसा जताया, जिनमें माना गया था कि खाता ब्लॉक होने के कारण चेक बाउंस होने पर धारा 138 लागू नहीं होती।

दूसरी ओर, शिकायतकर्ता/प्रतिवादी की ओर से पेश विद्वान वकील के. पलानीमुथु ने तर्क दिया कि पार्टनरशिप एक्ट की धारा 25 के तहत प्रत्येक पार्टनर फर्म के उन सभी कार्यों के लिए संयुक्त और व्यक्तिगत रूप से उत्तरदायी होता है जो उसके पार्टनर रहते हुए किए गए हों। उन्होंने दावा किया कि यह एक पोस्ट-डेटेड चेक था और आरोपी संख्या 2 की मृत्यु की औपचारिक सूचना नहीं दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के धनसिंह प्रभु बनाम चंद्रशेखर व अन्य मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि पार्टनरशिप एक्ट की धारा 25 और एनआई एक्ट की धारा 145 के तहत पार्टनरों की आपराधिक देयता से जुड़े वैधानिक अनुमानों को केवल मुकदमे (ट्रायल) के दौरान ही साबित या खारिज किया जा सकता है।

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जवाब में याचिकाकर्ता के वकील ने दोहराया कि पार्टनरशिप एक्ट की धारा 42 इस मामले पर पूरी तरह लागू होती है और चूंकि खाता पार्टनर की मृत्यु के कारण ब्लॉक था, इसलिए धारा 138 की कार्यवाही नहीं चलाई जा सकती।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने विचार के लिए मुख्य प्रश्न यह तय किया कि क्या बैंक द्वारा “अकाउंट ब्लॉक” (क्रमांक 21-25 के तहत) का मेमो दिए जाने के बावजूद निचली अदालत द्वारा एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत अपराध का संज्ञान लेना गलत था।

रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कोर्ट ने पाया कि आरोपी संख्या 2 की 21 मई 2017 को हुई मृत्यु पर कोई विवाद नहीं था। शिकायतकर्ता को इस बात की पूरी जानकारी थी, क्योंकि उसने अंतिम संस्कार में भाग लिया था, 6 जून 2017 को बचा हुआ स्टॉक वापस लिया था और कानूनी नोटिस पर भी “वह अब जीवित नहीं हैं” की टिप्पणी दर्ज होकर आई थी। कोर्ट ने दर्ज किया कि मृत्यु की जानकारी होने के बावजूद, खाली चेक पर 28 मार्च 2018 की तारीख दर्ज की गई—यानी आरोपी संख्या 2 की मृत्यु के लगभग दस महीने बाद।

अदालत ने टिप्पणी की:

“आरबीआई की अधिसूचना के अनुसार यह चेक वैध नहीं है और इसके अलावा, चेक जारी करने वाला भी अब जीवित नहीं है। यह भी निर्विवाद है कि चेक वापस करने का कारण ‘अकाउंट ब्लॉक’ (क्रमांक 21-25 के अंतर्गत आने वाली स्थिति) था। क्रमांक 23 स्पष्ट करता है कि खाताधारक की मृत्यु के कारण निकासी रोकी गई। यह ध्यान देने योग्य है कि एक पार्टनर की मृत्यु के कारण खाता ब्लॉक किया गया था।”

पार्टनरशिप की विधिक स्थिति पर विचार करते हुए अदालत ने सेठ गोविंदराम शुगर मिल्स मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा:

“पार्टनरशिप एक्ट की धारा 42(सी) को उचित रूप से वहीं लागू किया जा सकता है जहां दो से अधिक पार्टनर हों। यदि उनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाती है, तो फर्म भंग हो जाती है; लेकिन यदि इसके विपरीत कोई अनुबंध हो, तो जीवित पार्टनर फर्म को जारी रख सकते हैं। दूसरी ओर, यदि किसी फर्म के केवल दो पार्टनरों में से एक की मृत्यु हो जाती है, तो फर्म स्वतः ही समाप्त हो जाती है और फिर किसी तीसरे पक्ष को उसमें शामिल करने के लिए कोई पार्टनरशिप बचती ही नहीं है। ऐसी स्थिति में धारा 42 के खंड (सी) को लागू करने का कोई अवसर नहीं है।”

यद्यपि पार्टनरशिप डीड की शर्त संख्या 8 में यह उल्लेख था कि किसी पार्टनर की मृत्यु, सेवानिवृत्ति या दिवालिया होने पर फर्म भंग नहीं होगी और शेष पार्टनर कारोबार जारी रख सकते हैं या कानूनी वारिसों को शामिल कर सकते हैं, अदालत ने पाया कि इस तरह के किसी भी निरंतरता को दर्शाने वाली कोई सामग्री रिकॉर्ड पर पेश नहीं की गई थी।

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प्रतिवादी द्वारा उद्धृत धनसिंह प्रभु के फैसले को अलग बताते हुए अदालत ने कहा कि उस मामले में एनआई एक्ट की धारा 141 और पार्टनरशिप एक्ट की धारा 25 के तहत पार्टनरों की संयुक्त देयता पर चर्चा की गई थी, लेकिन ‘अकाउंट ब्लॉक’ के संबंध में कोई कानूनी सिद्धांत प्रतिपादित नहीं किया गया था।

फरहाद सूरी, राजेश मीणा, अरविंदरजीत कौर और क्रिमिनल पिटीशन संख्या 11207/2025 में स्थापित न्यायिक मिसालों की पुष्टि करते हुए कोर्ट ने कहा:

“ऐसी स्थिति में, पूर्व के फैसले पूरी तरह स्पष्ट हैं कि धारा 138 की कार्यवाही केवल खातों में पर्याप्त धनराशि न होने (फंड की कमी) के मामले में ही शुरू की जा सकती है, न कि अकाउंट ब्लॉक होने के आधार पर। इसलिए, याचिकाकर्ता के विद्वान वकील के इस तर्क में दम है कि जब खाता ब्लॉक हो, तो एनआई एक्ट की धारा 138 आकर्षित नहीं होगी।”

अदालत का निर्णय

जस्टिस संदेश ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि चेक पर प्रबंधकीय कामकाज देखने वाले पार्टनर की मृत्यु के लगभग दस महीने बाद की तारीख डाली गई थी, वह चेक आरबीआई की अधिसूचना के तहत वैध नहीं था, और चेक का बाउंस होना अपर्याप्त धनराशि के कारण नहीं बल्कि खाता ब्लॉक होने की वजह से हुआ था, इसलिए एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

तदनुसार, हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार कर ली और याचिकाकर्ता के खिलाफ निचली अदालत में सी.सी. संख्या 25126/2018 के तहत शुरू की गई कार्यवाही को पूरी तरह रद्द कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: वी.बी. नागराज बनाम मैसर्स पेरेग्रीन फॉस्फेट (पी) लिमिटेड
वाद संख्या: क्रिमिनल पिटीशन संख्या 4428/2019
पीठ: जस्टिस एच.पी. संदेश
निर्णय की तिथि: 25 सितंबर 2026

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