हैदराबाद के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 43 वर्षीय एक महिला उद्यमी का वाहन दुर्घटना दावा अनुचित तरीके से खारिज करने पर कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने संबंधित बीमा कंपनी को सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी ठहराते हुए पीड़िता को कुल 5.60 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। आयोग ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी अपने इन आरोपों के समर्थन में कोई ठोस दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं कर सकी कि वाहन में पहले से खराबी थी या पॉलिसी लेते समय तथ्य छिपाए गए थे।
आयोग के अध्यक्ष वक्कंती नरसिम्हा राव और सदस्य सुमा वला की पीठ ने 18 अगस्त को पारित आदेश में बीमा कंपनी को 45 दिनों के भीतर पूरी राशि अदा करने का समय दिया है। फैसले के तहत कंपनी को अस्वीकार किए गए बीमा दावे के रूप में 5 लाख रुपये, मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के एवज में 50,000 रुपये का मुआवजा तथा कानूनी खर्च के लिए 10,000 रुपये चुकाने होंगे।
हादसे और नुकसान के आकलन पर विवाद
पूरा मामला 21 जुलाई 2021 का है, जब रात करीब 10 बजे नरसिंगी इलाके में महिला की चार पहिया गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया था। इस हादसे में वाहन के अगले हिस्से को भारी नुकसान पहुंचा। अधिकृत शोरूम ने मरम्मत पर करीब 4 से 5 लाख रुपये खर्च आने का अनुमान जताया था। इसके बाद बीमा कंपनी के सर्वेक्षक ने नुकसान का मुआयना कर प्रदर्श बी-2 के तहत क्षति का कुल आकलन 6.21 लाख रुपये किया। चूंकि महिला ने पॉलिसी के तहत केवल 5 लाख रुपये के क्लेम की मांग की थी, इसलिए आयोग ने भुगतान की राशि को भी 5 लाख रुपये तक ही सीमित रखा।
शिकायतकर्ता ने 20 अगस्त 2021 को पत्र भेजकर बीमा कंपनी को इस दुर्घटना की औपचारिक सूचना दी थी। हालांकि, कंपनी ने 8 अक्टूबर 2021 को दावा खारिज कर दिया। कंपनी का कहना था कि वाहन कथित दुर्घटना से पहले ही क्षतिग्रस्त हो चुका था और इसके मालिकाना हक में बदलाव तथा वास्तविक स्थिति की जानकारी छिपाई गई थी। इसके बाद महिला ने अधिवक्ता रामुलु गोब्बुर के माध्यम से उपभोक्ता आयोग का रुख किया।
सबूतों के अभाव में खारिज हुईं बीमा कंपनी की दलीलें
आयोग के समक्ष बीमा कंपनी के अधिवक्ता गंगाधर राव देशपांडे ने तर्क दिया कि महिला ने नुकसान की सूचना आठ दिनों की देरी से दी, जिससे कंपनी समय पर जांच नहीं कर सकी। कंपनी ने दलील दी कि मामले की जांच के लिए सर्वेक्षक और जांचकर्ता नियुक्त किए गए थे, जिनकी फोरेंसिक रिपोर्ट के अनुसार यह क्षति कथित दुर्घटना की तारीख से काफी पहले की थी। कंपनी ने यह भी कहा कि 20 जुलाई 2021 को वाहन का स्वामित्व बदला गया था और बीमा कराते वक्त उसकी वास्तविक स्थिति का खुलासा नहीं किया गया, जो पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है।
दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद उपभोक्ता आयोग ने बीमा कंपनी के सभी तर्कों को निराधार पाया। आयोग ने कहा कि कंपनी इस आरोप को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रही कि वाहन दुर्घटना से पहले से क्षतिग्रस्त था। इसके अलावा, मालिकाना हक में बदलाव और जानकारी छिपाने से जुड़े दावों को भी कंपनी किसी पुख्ता साक्ष्य से साबित नहीं कर सकी। आयोग ने स्पष्ट किया कि बिना पर्याप्त और ठोस दस्तावेजी सबूतों के महज संदेह के आधार पर बीमा दावा खारिज करना कानूनन गलत है।

