1984 दंगा पीड़िता से 7.23 लाख रुपये की वसूली रद्द, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार पर लगाया 50 हजार का हर्जाना

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 1984 के सिख विरोधी दंगों की एक विधवा पीड़िता से संपत्ति मुआवजे के 7.23 लाख रुपये वापस वसूलने के प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने सीहोर जिला प्रशासन की इस कार्रवाई को मनमाना, गैर-कानूनी और असंवेदनशील करार देते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पीड़िता को मानसिक प्रताड़ना, कष्ट और अनुचित कानूनी विवाद में घसीटने के एवज में 50,000 रुपये का हर्जाना अदा करे।

हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव एस. कालगांवकर ने सीहोर के अपर कलेक्टर द्वारा 18 सितंबर 2014 को जारी रिकवरी सर्टिफिकेट और उसके आधार पर स्थानीय तहसीलदार द्वारा शुरू की गई वसूली की तमाम कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया। अदालत ने पाया कि महिला द्वारा पहले मिली वित्तीय सहायता छिपाने का प्रशासनिक आरोप पूरी तरह तथ्यहीन और सरकारी अभिलेखों के विपरीत था।

प्रशासनिक असंवेदनशीलता और लापरवाही पर हाईकोर्ट की फटकार

जस्टिस कालगांवकर ने 10 सितंबर के अपने आदेश में सीहोर कलेक्टर और अधीनस्थ अधिकारियों की कार्यशैली पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने टिप्पणी की कि 1984 दंगा पीड़िता और एक विधवा से मुआवजे की वसूली का आदेश जारी करना अधिकारियों में आवश्यक जांच-पड़ताल, संवेदनशीलता और विवेक के इस्तेमाल के गंभीर अभाव को दर्शाता है।

अदालत ने कहा कि जब याचिकाकर्ता ने अपने मूल आवेदन में अंतरिम राहत और अनुग्रह राशि मिलने की बात स्पष्ट रूप से दर्ज की थी, तब उस पर तथ्य छिपाने या अवैध रूप से सरकारी धन लेने का आरोप मढ़ने का कोई औचित्य ही नहीं था। अधिकारियों ने अपने ही रिकॉर्ड का सत्यापन किए बिना सतही और यांत्रिक तरीके से यह कदम उठाया। संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए पीठ ने कहा कि पीड़िता को वर्षों तक अकारण कानूनी परेशानी झेलनी पड़ी, जिसके लिए उन्हें आर्थिक मुआवजा दिया जाना सर्वथा न्यायसंगत है।

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अनुग्रह राशि और संपत्ति मुआवजे में अंतर स्पष्ट

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में अनुग्रह सहायता (एक्स-ग्रेशिया) और संपत्ति क्षतिपूर्ति के कानूनी स्वरूप में अंतर को स्पष्ट किया। अदालत ने रेखांकित किया कि अनुग्रह सहायता संकट के समय तुरंत दी जाने वाली एक स्वैच्छिक अंतरिम मदद होती है, जबकि संपत्ति का मुआवजा नुकसान के वैधानिक और विधिवत मूल्यांकन पर आधारित दायित्व होता है।

अदालत ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा 16 जनवरी 2006 को जारी पुनर्वास दिशा-निर्देशों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं था कि अनुग्रह राशि का भुगतान ‘पूर्ण और अंतिम निपटारा’ माना जाएगा या इससे भविष्य में तय होने वाले मुआवजे का दावा करने पर रोक लग जाएगी। लिहाजा, पूर्व में आपात राहत या अनुग्रह राशि स्वीकार करना किसी भी दंगा पीड़ित को उसकी नष्ट हुई संपत्ति के वास्तविक मुआवजे के अधिकार से वंचित नहीं कर सकता।

मुआवजे की मंजूरी से लेकर अनुचित वसूली तक का घटनाक्रम

यह मामला 1984 की हिंसा के दौरान याचिकाकर्ता के पति की संपत्ति को पहुंचे नुकसान से जुड़ा है। केंद्र सरकार के 2006 के पुनर्वास पैकेज के तहत प्रभावित व्यक्तियों को अपनी क्षतिग्रस्त आवासीय, व्यावसायिक अथवा औद्योगिक संपत्तियों के नुकसान के आकलन के लिए कलेक्टर के समक्ष दावा पेश करने का अधिकार दिया गया था।

इसी क्रम में महिला ने 9 मई 2013 को सीहोर कलेक्टर को मुआवजे के लिए आवेदन सौंपा। आवेदन में उन्होंने साफ तौर पर बताया कि उन्हें पूर्व में मध्य प्रदेश सरकार से 5,000 रुपये अंतरिम राहत और केंद्र सरकार की योजना के तहत 40,000 रुपये मिले थे। अपने कुल दावे की गणना करते समय उन्होंने पहले मिली इस 50,000 रुपये की राशि को कुल मांग में से घटाया था और उस पर 40 प्रतिशत ब्याज जोड़ा था।

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कलेक्टर कार्यालय ने भी अपने दस्तावेजों में बाकायदा दर्ज किया कि आवेदिका को राज्य से 5,000 रुपये और केंद्र से 45,000 रुपये प्राप्त हुए थे तथा यह राशि दावे में से कम कर दी गई है। पूरी जांच के बाद प्रशासन ने 7,23,800 रुपये के मुआवजे की स्वीकृति दी, जिसे राज्य सरकार ने 7 दिसंबर 2013 को आवंटन पत्र जारी कर पीड़िता को वितरित कर दिया।

रिकॉर्ड की अनदेखी कर जारी किया गया था रिकवरी नोटिस

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भुगतान के करीब नौ महीने बाद सीहोर कलेक्टर ने 1 सितंबर 2014 को महिला को कारण बताओ नोटिस थमा दिया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने मई 2013 के आवेदन में पूर्व भुगतान की जानकारी छिपाई थी। पीड़िता ने नोटिस का बिंदुवार जवाब देकर साफ किया कि वे पहले ही सारे तथ्य कागजातों में दर्ज करा चुकी थीं।

इसके बावजूद अपर कलेक्टर ने 18 सितंबर 2014 को 7.23 लाख रुपये की वसूली का सर्टिफिकेट जारी कर दिया और तहसीलदार ने जबिया वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी। कलेक्टर ने गृह विभाग के प्रमुख सचिव को पत्र लिखकर महिला से वसूली कराने और संबंधित अधिकारियों पर विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का प्रस्ताव भी भेज दिया था। हाईकोर्ट ने इन सभी कार्यवाहियों को अधिकार क्षेत्र का मनमाना दुरुपयोग ठहराते हुए पूरी तरह खत्म कर दिया है।

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