कर्नाटक के मैसूरु की एक अदालत ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के एक पूर्व मुख्य प्रबंधक को बैंक के आंतरिक फंड और एक दिवंगत ग्राहक के खाते से 61.57 लाख रुपये के गबन का दोषी ठहराते हुए एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए दो टूक कहा कि अपराध उजागर होने के बाद हड़पी गई रकम लौटा देने से किसी भी दोषी की आपराधिक देनदारी समाप्त नहीं हो जाती।
मैसूरु स्थित प्रथम अतिरिक्त वरिष्ठ सिविल जज एवं मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने यह आदेश शुक्रवार को चामुंडीपुरम शाखा के पूर्व चीफ मैनेजर अनिरुद्ध वसंतराव कुलकर्णी के खिलाफ जारी किया। जेल की सजा के साथ ही अदालत ने दोषी पर 50,000 रुपये का आर्थिक जुर्माना लगाया है। इसके अलावा, कानूनी प्रक्रिया के खर्च और वित्तीय नुकसान की भरपाई के तौर पर बैंक को 50,000 रुपये मुआवजा देने का भी निर्देश दिया गया है।
मृत्यु के चार साल बाद शुरू हुआ अवैध निकासी का सिलसिला
पुलिस जांच और अदालती दस्तावेजों के अनुसार, कुलकर्णी ने 13 मई 2009 से 23 दिसंबर 2011 के दौरान शाखा प्रबंधक पद पर रहते हुए इस धोखाधड़ी को अंजाम दिया। उन्होंने कृष्णा अय्यर नाम के एक खाताधारक के खाते से 40.53 लाख रुपये की अवैध निकासी की। आश्चर्यजनक बात यह थी कि कृष्णा अय्यर का निधन निकासी शुरू होने से करीब चार वर्ष पूर्व, 7 अप्रैल 2005 को ही हो चुका था।
जांच में सामने आया कि आरोपी प्रबंधक ने इसके साथ ही बैंक के अपने आंतरिक प्रशासनिक खाते से भी 21.04 लाख रुपये निकाले। इस प्रकार कुल 61.57 लाख रुपये की सरकारी रकम को धोखाधड़ी के जरिए खुद के और अपने बेटे नंदन कुलकर्णी के निजी बैंक खातों में ट्रांसफर कर लिया गया।
गुमनाम पत्र और वारिसों के दावे से खुली पोल
यह पूरा फर्जीवाड़ा पहली बार दिसंबर 2011 में प्रकाश में आया, जब एसबीआई के विजिलेंस विभाग को चामुंडीपुरम शाखा में चल रहे वित्तीय घपले को लेकर एक गुमनाम शिकायत मिली। इस पर संज्ञान लेते हुए बैंक के राज्य सतर्कता प्रमुख ने विस्तृत जांच की और अपनी रिपोर्ट आला अधिकारियों को सौंपी।
इसी दौरान गबन की पुष्टि तब और पुख्ता हो गई, जब कृष्णा अय्यर के कानूनी वारिस चेन्नई की एक अदालत का आदेश लेकर खाते में जमा 40 लाख रुपये की शेष राशि लेने शाखा पहुंचे। बैंक पहुंचने पर परिजनों को जानकारी मिली कि खाते की पूरी रकम पहले ही निकाली जा चुकी है।
पैसे लौटाने के बावजूद अदालत ने खारिज की राहत की दलील
सतर्कता विभाग की जांच के आधार पर पुलिस ने 2012 में कुलकर्णी के खिलाफ धोखाधड़ी का आपराधिक मामला दर्ज किया। इसके बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया, हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी।
मुकदमे की अंतिम सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील ने अदालत से नरमी बरतने की गुहार लगाई। बचाव पक्ष का तर्क था कि कुलकर्णी अब 65 वर्ष के हो चुके हैं, कई बीमारियों से ग्रस्त हैं और अपने परिवार में 90 वर्षीय बुजुर्ग मां व पत्नी के इकलौते सहारे हैं। यह भी कहा गया कि उनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है, उन्होंने हर अदालती तारीख पर पेश होकर सहयोग किया और मामला खुलने के बाद बैंक को 62 लाख रुपये की पूरी रकम स्वेच्छा से लौटा भी दी थी।
मजिस्ट्रेट ने बचाव पक्ष की इन दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि गबन की पोल खुलने के बाद रकम वापस कर देने से जुर्म की गंभीरता कम नहीं हो जाती और न ही यह कानून की नजर में बरी होने का कोई आधार हो सकता है।

