विभिन्न हाईकोर्ट्स के विरोधाभासी फैसलों पर विराम लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया है कि गर्भाधान पूर्व और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम, 1994 (PCPNDT Act) के तहत दर्ज अपराधों के लिए राज्य पुलिस को स्वतंत्र रूप से प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने या जांच करने का अधिकार नहीं है। अदालत ने माना कि इस कानून के तहत नियुक्त सक्षम अधिकारी (Appropriate Authority) ही एकमात्र अधिकृत जांच एजेंसी है। इसके साथ ही, धारा 28 के तहत सक्षम मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट या चार्जशीट के आधार पर पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट के अपराधों का संज्ञान लेने के लिए कानूनी रूप से प्रतिबंधित है। हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) या भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) जैसे सामान्य आपराधिक कानूनों के तहत बनने वाले अलग अपराधों की जांच करने का पुलिस का अधिकार बरकरार रहेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद 134-ए और 134(1)(सी) के तहत जारी प्रमाण पत्र के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। मुख्य मामला एफआईआर संख्या 628/2017 से जुड़ा था, जिसमें आरोपी ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत याचिका दाखिल कर आईपीसी की धारा 315, 511 और पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट की धारा 4, 5(2), 6(ए), 23 और 25 के तहत दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी।
यह एफआईआर बुलंदशहर के जिलाधिकारी (जो इस एक्ट के तहत सक्षम अधिकारी हैं) को मिली गुप्त सूचना के आधार पर हुई कार्रवाई का परिणाम थी। अवैध भ्रूण लिंग परीक्षण की शिकायत पर डेकॉय ऑपरेशन (फर्जी ग्राहक भेजकर) और अस्पताल पर छापेमारी की गई थी। हाईकोर्ट के सिंगल जज ने चार्जशीट रद्द करने की याचिका तो स्वीकार कर ली, लेकिन यह देखते हुए कि विभिन्न हाईकोर्ट्स में इस बात पर मतभेद है कि धारा 27 के तहत अपराध संज्ञेय (cognizable) होने के कारण पुलिस एफआईआर दर्ज कर सकती है या नहीं, उन्होंने निम्नलिखित तीन सवाल सुप्रीम कोर्ट को संदर्भित किए:
- क्या पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट के तहत अपराधों को संज्ञेय और गैर-जमानती बनाए जाने मात्र से पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज करना स्वीकार्य है?
- क्या इस एक्ट के तहत अपराधों की पुलिस जांच की अनुमति है, और इन शिकायतों की जांच करने के लिए कौन अधिकृत है?
- क्या पुलिस जांच के बाद प्रस्तुत चार्जशीट के आधार पर सक्षम मजिस्ट्रेट पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट के तहत अपराध का संज्ञान ले सकता है?
पक्षों की दलीलें
न्यायालय की सहायता के लिए नियुक्त एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री मुक्ता गुप्ता और अन्य वरिष्ठ वकीलों ने तर्क दिया कि धारा 17, 17ए, 28 और पीसीएंडपीएनडीटी नियम, 1996 के नियम 18ए(3)(iv) को एक साथ पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि जांच, तलाशी, जब्ती और शिकायत दर्ज करने की पूरी जिम्मेदारी केवल सक्षम अधिकारी (Appropriate Authority) की है। उन्होंने कहा कि धारा 28 संज्ञान लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाती है, सिवाय इसके कि शिकायत सक्षम अधिकारी या उसके द्वारा अधिकृत अधिकारी द्वारा दर्ज की गई हो। धारा 27 में प्रयुक्त शब्द “संज्ञेय” को अलग से पढ़कर इस विशेष वैधानिक तंत्र को समाप्त नहीं किया जा सकता और न ही पुलिस को जांच की सर्वोच्चता दी जा सकती है।
दूसरी ओर, भारत सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की ओर से तर्क दिया गया कि धारा 27 अपराधों को स्पष्ट रूप से संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-शमनीय (non-compoundable) बनाती है, जिससे स्वतः ही सीआरपीसी और बीएनएसएस के तहत पुलिस की सामान्य जांच शक्तियां सक्रिय हो जाती हैं। उन्होंने कहा कि “जांच” और “संज्ञान” दो अलग-अलग कानूनी चरण हैं, और धारा 28 केवल संज्ञान के चरण को सीमित करती है, न कि एफआईआर दर्ज करने और प्रारंभिक जांच करने के पुलिस के कर्तव्य को छीनती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि नियम 18ए(3)(iv) में “जहां तक संभव हो” (as far as possible) वाक्यांश केवल निर्देशात्मक है, जिसका उद्देश्य पुलिस के साथ समन्वय को बढ़ावा देना है, न कि पुलिस को पूरी तरह बाहर करना।
अदालत का विश्लेषण और नज़ीरें
मुख्य फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल ने टिप्पणी की कि पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट एक स्व-निहित (self-contained) विशेष कानून है, जिसे चिकित्सा निदान तकनीकों को नियंत्रित करने और महिला भ्रूण हत्या को रोकने के साथ-साथ डॉक्टरों को अनावश्यक उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाया गया है। इस सिद्धांत के तहत कि विशेष कानून सामान्य कानून पर प्रभावी होता है (सीआरपीसी / बीएनएसएस की धारा 4 और 5), विशेष कानून द्वारा प्रदान की गई प्रक्रिया ही लागू होनी चाहिए।
अदालत ने अन्य समान विशेष कानूनों में तय नज़ीरों की समीक्षा की:
- मानव अंग और ऊतक प्रत्यारोपण अधिनियम, 1994 (TOHO Act) की धारा 22 के तहत, जीवराज कुमार राउत बनाम सीबीआई मामले में माना गया था कि पुलिस रिपोर्ट दर्ज करना कानूनन वर्जित है और केवल अधिकृत अधिकारी ही शिकायत याचिका दायर कर सकता है।
- औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (Drugs and Cosmetics Act) की धारा 32 के तहत, यूनियन ऑफ इंडिया बनाम अशोक कुमार शर्मा मामले में तय किया गया था कि पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज नहीं कर सकता और न ही सीआरपीसी के तहत अध्याय IV के संज्ञेय अपराधों की जांच कर सकता है।
- खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR Act) के तहत स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली) बनाम संजय मामले में माना गया कि पुलिस संज्ञान पर रोक केवल विशेष कानून के अपराधों तक सीमित है, जबकि आईपीसी के तहत बनने वाले स्वतंत्र अपराध प्रभावित नहीं होते।
- अदालत ने पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट के तहत शिकायतों और तलाशी के कड़े नियमों को रेखांकित करने के लिए मध्य प्रदेश राज्य बनाम मनविंदर सिंह गिल, राजस्थान राज्य बनाम मोहम्मद इम्तियाज, और रविंदर कुमार बनाम हरियाणा राज्य के मामलों का भी उल्लेख किया।
धारा 27 (अपराधों का संज्ञेय होना) और धारा 28 (शिकायत के जरिए ही संज्ञान की बाध्यता) के बीच के विरोधाभास पर विचार करते हुए अदालत ने वैधानिक व्याख्या के सिद्धांतों का प्रयोग किया और टिप्पणी की:
“यदि किसी अधिनियम की दो धाराओं में सामंजस्य नहीं बिठाया जा सकता और उनमें पूर्ण विरोधाभास हो, तो अक्सर यह कहा जाता है कि अंतिम धारा ही मान्य होगी। लेकिन इस मार्ग को केवल अंतिम उपाय के रूप में ही अपनाया जाना चाहिए।”
सीआईटी बनाम हिंदुस्तान बल्क कैरियर्स में दिए गए निरर्थकता से बचाव के नियम और ग्रे बनाम पियर्सन के सिद्धांत का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:
“ऐसी व्याख्या से बचा जाना चाहिए जो कानून को निरर्थक बना दे। किसी अधिनियम या उसके किसी प्रावधान की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए कि वह प्रभावी और कार्यात्मक बना रहे, जो ‘उत् रेस मैगिस वैलिएट क्वाम पेरीएट’ के सिद्धांत पर आधारित है…”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस को जांच करने और चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति दी जाती है, तो भी धारा 28 के कारण अदालत उस पर संज्ञान नहीं ले पाएगी, जिससे पुलिस की पूरी कार्यवाही कानूनी रूप से निरर्थक हो जाएगी। अदालत ने यह भी माना कि नियम 18ए(3)(iv) वैधानिक बल रखता है। मध्य प्रदेश राज्य बनाम नर्मदा बचाओ आंदोलन का हवाला देते हुए पीठ ने टिप्पणी की कि “जहां तक संभव हो” शब्द सक्षम अधिकारी को केवल सीमित परिस्थितियों में पुलिस की पूरक (supplemental) सहायता लेने का अधिकार देते हैं।
सहमतिपूर्ण राय और दोहरा कानूनी ढांचा
एक सहमत फैसले में जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह ने उन परिस्थितियों के लिए विस्तृत प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश दिए जहां एक ही घटना से पीसीएंडपीएनडीटी उल्लंघन और स्वतंत्र सामान्य आपराधिक अपराध (आईपीसी/बीएनएस) दोनों उत्पन्न होते हैं:
- यदि पुलिस को मिली सूचना केवल पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट के उल्लंघन से संबंधित है, तो पुलिस को इसे स्टेशन डायरी में दर्ज करना होगा और तुरंत संबंधित सामग्री सक्षम अधिकारी को भेजनी होगी, बिना कोई स्वतंत्र जांच शुरू किए।
- यदि सूचना से आईपीसी या बीएनएस के तहत कोई स्वतंत्र संज्ञेय अपराध प्रकट होता है (जैसे मौत या हत्या से संबंधित चिकित्सीय कार्य), तो पुलिस उस विशिष्ट अपराध की जांच कर सकती है, और साथ ही पीसीएंडपीएनडीटी से जुड़े पहलू को सक्षम अधिकारी को भेज सकती है।
- दोनों एजेंसियों को आपस में समन्वय बनाना होगा: पुलिस सक्षम अधिकारी से निरीक्षण निष्कर्ष और तकनीकी रिपोर्ट मांग सकती है, जबकि सक्षम अधिकारी पुलिस से सुरक्षा, डिजिटल या लॉजिस्टिक सहायता मांग सकता है।
- सक्षम अधिकारी को दी जाने वाली पुलिस सहायता को किसी भी स्थिति में स्वतंत्र पुलिस जांच में नहीं बदला जा सकता और न ही इसके आधार पर पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट के तहत पुलिस चार्जशीट दाखिल की जा सकती है।
अदालत का निर्णय
संदर्भित प्रश्नों का उत्तर देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया:
- एफआईआर का पंजीकरण: पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट के तहत अपराधों के लिए पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करना गैर-कानूनी है, क्योंकि कानून जांच का अधिकार केवल सक्षम अधिकारी को देता है।
- जांच प्राधिकारी: धारा 17(4) के तहत केवल सक्षम अधिकारी को ही शिकायतों की जांच करने का अधिकार है। पुलिस केवल सक्षम अधिकारी के विशेष अनुरोध पर पूरक भूमिका निभा सकती है।
- चार्जशीट पर संज्ञान: सक्षम मजिस्ट्रेट पुलिस चार्जशीट के आधार पर पीसीएंडपीएनडीटी एक्ट के अपराधों का संज्ञान नहीं ले सकता।
अदालत ने संदर्भ का निपटारा करते हुए मामले को आगे की कार्यवाही के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट को वापस भेज दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य बनाम बृज पाल सिंह एवं अन्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 2938 / 2025
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटेश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 20 अगस्त 2026

