आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रिवेंशन ऑफ इललीसिट ट्रैफिक इन नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1988 (पिट एनडीपीएस एक्ट) के तहत जारी एक प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अंतिम कथित आपराधिक घटना और डिटेंशन आदेश पारित होने के बीच लगभग दो साल की अस्पष्ट देरी दोनों के बीच के आवश्यक कारण-कार्य संबंध को समाप्त कर देती है। जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर की खंडपीठ ने निर्णय दिया कि घटनाओं और निरोध के बीच तात्कालिक एवं निरंतर संबंध (लाइव एंड प्रॉक्सिमेट लिंक) का न होना डिटेनिंग अथॉरिटी की व्यक्तिपरक संतुष्टि (सब्जेक्टिव सेटिस्फैक्शन) को अमान्य बनाता है, जिससे यह डिटेंशन पूरी तरह गैरकानूनी हो जाता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला पी. राहुल और एक अन्य व्यक्ति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर आया, जिसमें बंदी पी. परंदामु उर्फ परंदामाया की प्रिवेंटिव डिटेंशन को चुनौती दी गई थी।
सरकार के प्रमुख सचिव ने 21 नवंबर 2025 को पिट एनडीपीएस एक्ट, 1988 की धारा 3(1) के तहत जी.ओ.आरटी.सं. 1429, राजस्व (आबकारी.II) विभाग के माध्यम से डिटेंशन आदेश जारी किया था। इसके बाद राज्य सरकार ने 13 जनवरी 2026 को जी.ओ.आरटी.सं. 72 के जरिए इस आदेश की पुष्टि की थी।
प्रिवेंटिव डिटेंशन का यह आदेश बंदी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट, 1985 के तहत दर्ज सात आपराधिक मामलों पर आधारित था:
- अपराध संख्या 128/2011, धारा 20(b) एनडीपीएस एक्ट, श्रीकालहस्ती II टाउन पुलिस स्टेशन।
- अपराध संख्या 01/2015, धारा 20(b) एनडीपीएस एक्ट, श्रीकालहस्ती II टाउन पुलिस स्टेशन।
- अपराध संख्या 78/2016, धारा 8(c) सहपठित 20(b)(ii)(C) एनडीपीएस एक्ट, मद्यनिषेध एवं आबकारी स्टेशन, श्रीकालहस्ती।
- अपराध संख्या 10/2020, धारा 20(b)(ii)(C) एनडीपीएस एक्ट, रेणिगुंटा पुलिस स्टेशन।
- अपराध संख्या 219/2020, धारा 20(b)(ii)(C) एनडीपीएस एक्ट, श्रीकालहस्ती II टाउन पुलिस स्टेशन।
- अपराध संख्या 280/2022, धारा 20(b)(ii)(C) एनडीपीएस एक्ट, येरपेडु पुलिस स्टेशन।
- अपराध संख्या 39/2023, धारा 20(b)(ii)(C) एनडीपीएस एक्ट, श्रीकालहस्ती II टाउन पुलिस स्टेशन।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री वी.आर. रेड्डी कोव्वुरी ने दलील दी कि आदेश में उल्लिखित अंतिम आपराधिक घटना 3 अप्रैल 2023 को हुई थी, जबकि डिटेंशन आदेश 21 नवंबर 2025 को पारित किया गया—यानी अंतिम घटना के लगभग दो वर्ष बाद। उन्होंने कहा कि अंतिम घटना से इतने लंबे समय बाद और पुराने मामलों से कई वर्षों बाद प्रिवेंटिव डिटेंशन के कड़े प्रावधानों को लागू करना न तो उचित है और न ही कानून में वैध ठहराया जा सकता है।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों की ओर से पेश सहायक सरकारी वकील श्री अकुला वेंकट साई जगदीश ने तर्क दिया कि डिटेनिंग अथॉरिटी ने बंदी के आचरण के समग्र पैटर्न पर विचार किया था, जिसमें 2020, 2022 और 2023 के हालिया मामले शामिल थे। उन्होंने कहा कि इन मामलों से गांजे की अवैध तस्करी में बंदी की निरंतर संलिप्तता की प्रवृत्ति उजागर होती है, जिससे 2023 तक बार-बार नशीले पदार्थों के अपराधों में शामिल रहने के कारण ‘लाइव और प्रॉक्सिमेट लिंक’ बरकरार रहा।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और कानूनी नजीरें
दोनों पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का अवलोकन करने के बाद पीठ ने दोहराया कि नुकसानदेह गतिविधियों और डिटेंशन के उद्देश्य के बीच एक तात्कालिक एवं निरंतर संबंध होना आवश्यक है, जिससे दोनों के बीच एक तर्कसंगत नेक्सस स्थापित हो सके।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के मोहम्मद शहाबुद्दीन बनाम डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, 24 परगना के फैसले का उल्लेख किया, जहां डिटेंशन आदेश को सिर्फ इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि वह आपराधिक घटना के करीब सात महीने बाद पारित किया गया था। पीठ ने उस फैसले के पैरा 3 को रेखांकित किया:
“आपराधिक घटना और हिरासत आदेश के बीच लंबे और अस्पष्ट विलंब के आधार पर, इस अदालत ने माना है कि ऐसी हिरासत को अवैध ठहराया जाना चाहिए क्योंकि व्यक्तिपरक संतुष्टि का नुकसानदेह कृत्य के साथ कोई तात्कालिक और तर्कसंगत संबंध नहीं रह जाता है। हमें यहां भी उसी दृष्टिकोण का पालन करना होगा। हिरासत का आदेश रद्द किया जाता है, रूल निसी को निरपेक्ष बनाया जाता है और याचिकाकर्ता को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया जाता है।”
इसके अलावा, अदालत ने राजिंदर अरोड़ा बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले का भी हवाला दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि डिटेंशन आदेश जारी करने में देरी इसे रद्द करने का एक वैध आधार है। उस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के टी.ए. अब्दुल रहमान बनाम केरल राज्य के फैसले को उद्धृत किया गया था:
“उपरोक्त निर्णयों का सार इस प्रकार संक्षेपित किया जा सकता है: यह सवाल कि किसी व्यक्ति की नुकसानदेह गतिविधियां, जिनके कारण हिरासत का आदेश देना आवश्यक हुआ, क्या उस समय के निकट हैं जब आदेश दिया गया है अथवा नुकसानदेह गतिविधियों और हिरासत के उद्देश्य के बीच का ‘लाइव-लिंक’ टूट चुका है, प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करता है। कोई ऐसा पक्का नियम सटीक रूप से तैयार नहीं किया जा सकता जो सभी परिस्थितियों में लागू हो और इस संबंध में कोई विस्तृत दिशानिर्देश तय नहीं किए जा सकते। इससे यह स्पष्ट होता है कि निकटता का परीक्षण अपराध और हिरासत आदेश के बीच के महीनों को केवल गिनने का कोई कठोर या यांत्रिक परीक्षण नहीं है। हालांकि, जब नुकसानदेह गतिविधियों और हिरासत आदेश जारी करने के बीच अत्यधिक और लंबा विलंब होता है, तो अदालत को यह जांचना होता है कि क्या हिरासत प्राधिकारी ने इस देरी की संतोषजनक जांच की है और जवाब मांगे जाने पर यह उचित और तर्कसंगत स्पष्टीकरण दिया है कि ऐसी देरी क्यों हुई, तथा अदालत को यह भी पड़ताल करनी होती है कि क्या प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में कारण-कार्य संबंध टूट गया है।”
उक्त निर्णय में आगे यह भी रेखांकित किया गया था:
“इसी तरह, जब हिरासत आदेश की तिथि और बंदी की गिरफ्तारी सुनिश्चित करने की तिथि के बीच असंतोषजनक और अस्पष्ट देरी होती है, तो ऐसी देरी हिरासत प्राधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि की वास्तविकता पर गंभीर संदेह पैदा करती है, जिससे यह उचित निष्कर्ष निकलता है कि प्राधिकारी बंदी को नुकसानदेह तरीके से कार्य करने से रोकने के उद्देश्य से हिरासत में लेने की आवश्यकता को लेकर वास्तव में और यथार्थ रूप से संतुष्ट नहीं था।”
मौजूदा मामले के तथ्यों पर इन सिद्धांतों को लागू करते हुए पीठ ने पाया कि सातवें आधार में दर्ज अंतिम घटना के लगभग दो साल बाद डिटेंशन आदेश जारी किया गया, जबकि बाकी छह घटनाएं उससे भी काफी पहले की थीं। इतने लंबे समय तक कोई कदम न उठाए जाने का कोई औचित्य न मिलने पर पीठ ने टिप्पणी की:
“यदि निवारक हिरासत का आदेश पारित करने की आवश्यकता पर इतने लंबे समय तक विचार नहीं किया गया, तो इन घटनाओं और निवारक हिरासत के उद्देश्य या लक्ष्य के लिए बंदी को निवारक रूप से हिरासत में लेने की आवश्यकता के बीच न तो कोई औचित्य हो सकता है और न ही कोई कारण-कार्य संबंध। आपराधिक घटनाओं और हिरासत आदेश के बीच एक लंबा और अस्पष्टीकृत विलंब है। हिरासत प्राधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि का आपराधिक घटनाओं के साथ कोई तात्कालिक तर्कसंगत संबंध नहीं है। निवारक हिरासत और पुष्टि के आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता।”
अदालत का अंतिम निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि डिटेनिंग अथॉरिटी की व्यक्तिपरक संतुष्टि और पूर्व आपराधिक घटनाओं के बीच कोई तात्कालिक तर्कसंगत संबंध नहीं रह गया था। इसी आधार पर अदालत ने रिट याचिका स्वीकार करते हुए 21 नवंबर 2025 के प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश और 13 जनवरी 2026 के पुष्टिकरण आदेश को रद्द कर दिया।
पीठ ने निर्देश दिया कि यदि बंदी किसी अन्य लंबित मामले में हिरासत में रखने के लिए आवश्यक न हो, तो उसे तुरंत रिहा कर दिया जाए। लागत के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया गया और सभी लंबित विविध याचिकाओं को भी समाप्त कर दिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: पी. राहुल एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य व 6 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 11968/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहारी और जस्टिस अलापति गिरिधर
निर्णय की तिथि: 09.09.2026

