सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक मामलों में लिप्त दोषियों और उनके परिजनों की चल-अचल संपत्ति जब्त करने की मांग वाली जनहित याचिका पर शुक्रवार को सुनवाई छह सप्ताह के लिए टाल दी। अदालत ने केंद्र और सभी राज्य सरकारों को इस समयावधि के भीतर अपने जवाबी हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के समक्ष जब यह मामला सुनवाई के लिए आया, तो केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने पीठ से समय देने का अनुरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि याचिका में देश के सभी राज्यों को भी पक्षकार बनाया गया है, ऐसे में सभी पक्षों की ओर से औपचारिक जवाब और कानूनी दस्तावेज रिकॉर्ड पर आने के बाद ही इस मामले में आगे की बहस हो सकेगी। पीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए सभी प्रतिवादियों को अपने जवाबी हलफनामे पेश करने के निर्देश दिए और अगली सुनवाई छह हफ्ते बाद तय की।
दोषियों की संपत्ति कुर्क करने और क्रमिक सजा देने की मांग
अधिवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से वकील अश्वनी कुमार दुबे के माध्यम से दायर इस याचिका में मांग की गई है कि पेपर लीक सिंडिकेट में शामिल अपराधियों और उनके परिवार के सदस्यों की समस्त संपत्तियों का विधिवत मूल्यांकन कराया जाए। याचिका में ऐसे मामलों में धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के कड़े प्रावधानों के तहत संपत्तियां कुर्क करने के निर्देश देने की गुहार लगाई गई है।
भविष्य में ऐसी घटनाओं पर सख्त रोक लगाने के उद्देश्य से याचिकाकर्ता ने अदालत से यह घोषित करने का अनुरोध किया है कि पेपर लीक से जुड़े अपराधों में कारावास की सजा समवर्ती (एक साथ) चलने के बजाय क्रमिक (एक के बाद एक) भुगताई जाए। इसके अतिरिक्त, एक वैकल्पिक राहत के तौर पर यह मांग भी रखी गई है कि विधि आयोग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जाने वाली सर्वश्रेष्ठ कानूनी पद्धतियों का अध्ययन करने और तीन महीने के भीतर पेपर लीक पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का निर्देश दिया जाए।
संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन और छात्रों पर प्रभाव की दलील
इससे पूर्व सुप्रीम कोर्ट ने 18 अगस्त को इस याचिका पर पहली बार संज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया था। उस सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत को अवगत कराया था कि वे पेपर लीक मामलों की समयबद्ध जांच और त्वरित अदालती सुनवाई वाली मांग पर अब दबाव नहीं बना रहे हैं, क्योंकि संसद द्वारा ‘सार्वजनिक परीक्षा संशोधन विधेयक, 2026’ पहले ही पारित किया जा चुका है, जो परीक्षा संबंधी अनियमितताओं पर रोक लगाने के लिए कानूनी ढांचे को सशक्त बनाता है।
याचिका में दलील दी गई है कि पेपर लीक की पुनरावृत्ति रोकने, प्रभावी जांच करने और दोषियों पर मुकदमा चलाने में प्रशासनिक स्तर पर हो रही लगातार विफलता संविधान के अनुच्छेद 14, 16, 19 और 21 के तहत परीक्षार्थियों के मौलिक अधिकारों का खुला हनन है। याचिका में बार-बार पेपर रद्द होने के मानवीय और सामाजिक दुष्प्रभावों को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि इससे छात्र और उनके परिवार भीषण मानसिक व शारीरिक तनाव झेलते हैं, युवाओं के करियर और रोजगार के सुनहरे अवसर नष्ट होते हैं, शिक्षा ऋण का वित्तीय संकट बढ़ता है और छात्रों द्वारा आत्महत्या जैसे कदम उठाने के मामले लगातार सामने आ रहे हैं।

