सुप्रीम कोर्ट ने शीर्ष अदालत की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी के उपयोग की संभावनाओं पर विचार करने और सिफारिशें देने के लिए आयोग गठित करने का निर्देश देने की मांग वाली जनहित याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि भाषा से जुड़े सुधार प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और इन्हें न्यायिक आदेशों के माध्यम से लागू नहीं किया जा सकता।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता द्वारा मांगी गई राहत के क्रियान्वयन के लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी।
अदालती आदेशों से नहीं, चरणबद्ध प्रशासनिक प्रक्रिया से लागू होते हैं भाषाई सुधार: चीफ जस्टिस
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट प्रशासनिक स्तर पर भाषा संबंधी सुधारों को पहले से ही क्रमिक और चरणबद्ध तरीके से लागू कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह के बदलाव अदालती आदेशों से नहीं होते, बल्कि ये संस्थागत सुधारों के रूप में धीरे-धीरे और योजनाबद्ध ढंग से अमल में आते हैं।
चीफ जस्टिस ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सभी कानूनी रिपोर्टों और फैसलों का संक्षिप्त विवरण हिंदी में उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है और आगे चलकर इस पहल का विस्तार अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में भी किया जाएगा। उन्होंने रेखांकित किया कि शीर्ष अदालत देश की भाषाई संस्कृति को संरक्षित रखने और सभी क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मान करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
संविधान संशोधन की जरूरत और याचिकाकर्ता की दलीलें
यह जनहित याचिका ब्रह्मेश्वर नाथ मिश्रा की ओर से दायर की गई थी। याचिका में केंद्र सरकार को एक आयोग गठित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया था, जो सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक भाषा के तौर पर हिंदी को शामिल करने के संबंध में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत करे।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने विभिन्न संवैधानिक अनुच्छेदों का हवाला देते हुए तर्क रखा कि केंद्र सरकार को इस तरह का आयोग गठित करने का निर्देश दिया जा सकता है। पीठ द्वारा इस मांग से जुड़ी संवैधानिक अड़चनों को सामने रखे जाने के बाद भी वकील ने कम से कम आयोग गठन का निर्देश जारी करने का अनुरोध दोहराया।
पीठ ने इस मांग पर कोई भी राहत देने से इनकार करते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

