सीसीएल द्वारा रोजगार देना ही भूमि अधिग्रहण का प्रमाण: झारखंड हाईकोर्ट ने मुआवजा याचिका खारिज करने का आदेश किया रद्द, ट्रिब्यूनल को पुनर्विचार का निर्देश

झारखंड हाईकोर्ट ने कोल बेयरिंग एरियाज (एक्विजिशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 1957 के तहत भूमि अधिग्रहण के मुआवजे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में रेफरेंस ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें केवल ‘फॉर्म-के’ रिटर्न दाखिल न करने के तकनीकी आधार पर रैयत का दावा खारिज कर दिया गया था। जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने दिवंगत मूल दावेदार के कानूनी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाने की अनुमति दी और सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के आदेश 41 नियम 27 के तहत आवश्यक भूमि दस्तावेजों को अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में स्वीकार करते हुए मामले को नए सिरे से गुण-दोष के आधार पर तय करने के लिए अपर न्यायिक आयुक्त प्रथम सह ट्रिब्यूनल, रांची को वापस भेज दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील रांची स्थित अपर न्यायिक आयुक्त प्रथम सह ट्रिब्यूनल द्वारा रेफरेंस केस संख्या 07/1998 में 29 सितंबर 2018 को पारित आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। मूल दावेदार स्वर्गीय टिकेंद्र चौधरी (जिनके निधन के बाद उनकी पत्नी भुनेश्वरी देवी और बच्चों को कानूनी वारिस बनाया गया) ने रामगढ़ जिले (पूर्व में हजारीबाग) के मौजा-सेवई में खाता संख्या 83 के तहत कुल 18.19 एकड़ भूमि पर रैयती अधिकार का दावा किया था। इस भूमि में प्लॉट संख्या 656 (9.00 एकड़), प्लॉट संख्या 1134 (7.19 एकड़) और प्लॉट संख्या 1216 (2.00 एकड़) शामिल हैं।

दावेदार का कहना था कि हुकुमनामा पर्चा, जमींदारी रसीद और सरकारी रसीदों के आधार पर उनका जमीन पर स्वत्व व दखल था। उनका नाम रजिस्टर-II और बुझारत रजिस्टर में भी दर्ज था। जिला भू-अर्जन पदाधिकारी, हजारीबाग ने भी 3 अप्रैल 1989 को इस भूमि को ‘रैयती मान्यता’ प्रदान की थी। यह भूमि मूल रूप से दावेदार की माता बिलाशो देवी के नाम पर दर्ज थी, जिनका निधन नवंबर 1990 में हो गया था।

केंद्र सरकार ने 29 दिसंबर 1962 को अधिसूचना (एस.ओ. संख्या 3894) जारी कर नेशनल कोल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनसीडीसी) की ‘रजरप्पा परियोजना’ के लिए इस भूमि का अधिग्रहण किया था। बाद में एनसीडीसी का विलय सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) में हो गया। अधिग्रहण और पुनर्वास नीति के तहत सीसीएल ने मूल दावेदार को श्रेणी-1 (मजदूर संवर्ग) में नियोजन भी प्रदान किया। हालांकि, 1989, 1990 और 1995 में कई बार आवेदन देने के बावजूद अधिगृहीत भूमि का मुआवजा नहीं दिया गया।

इसके बाद दावेदार ने मार्च 1988 में 1957 के कानून की धारा 17(2) के तहत रांची ट्रिब्यूनल के समक्ष आवेदन देकर अधिकार, स्वत्व की घोषणा और 15,000 रुपये प्रति डिसमिल की दर से मुआवजे के साथ 30 प्रतिशत सोलेशियम व ब्याज की मांग की। ट्रिब्यूनल ने 29 सितंबर 2018 को इस आधार पर दावा खारिज कर दिया कि दावेदार ‘फॉर्म-के’ का रिटर्न जमा करने में विफल रहा।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता रितु कुमार ने दलील दी कि मूल दावेदार एक साधारण ग्रामीण था और सीसीएल में मजदूर वर्ग का कर्मचारी होने के कारण उसे कानूनी जटिलताओं व ट्रिब्यूनल के समक्ष पर्चा दाखिल करने के महत्व की जानकारी नहीं थी।

उन्होंने सीपीसी के आदेश 41 नियम 27 के तहत दायर अर्जी (आई.ए. संख्या 9843/2024) का हवाला देते हुए अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार करने का अनुरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि उसी ट्रिब्यूनल ने उसी दिन (29 सितंबर 2018) को उसी खाता संख्या 83 के अन्य रैयतों के मुआवजे के दावों (रेफरेंस केस संख्या 94 और 95/1993) को पूर्व जमींदार द्वारा दाखिल रिटर्न (प्रदर्श 8/डी) के आधार पर स्वीकार किया था। नए मिले पर्चे में क्रम संख्या 76 पर बिलाशो देवी का नाम स्पष्ट रूप से दर्ज है। अधिवक्ता ने बल दिया कि जब सीसीएल ने जमीन के बदले दावेदार को नौकरी दे दी थी, तो मुआवजा देने से इनकार करना विरोधाभासी है।

दूसरी तरफ, सीसीएल के अधिवक्ता अमित कुमार सिन्हा ने शुरुआत में विरोध करते हुए कहा कि मूल सुनवाई के दौरान ये दस्तावेज ट्रिब्यूनल के सामने नहीं रखे गए थे और अपीलकर्ताओं ने इतनी देरी के बाद अतिरिक्त साक्ष्य दाखिल करने में आवश्यक तत्परता नहीं दिखाई। हालांकि, अदालत के प्रश्नों पर उन्होंने स्वीकार किया कि सीसीएल ने जमीन का अधिग्रहण किया है, रेफरेंस केस संख्या 95/1993 में इसी दस्तावेज के आधार पर दूसरे रैयतों को मुआवजा दिया जा चुका है, और राज्य सरकार भी इस जमीन को गैरमजरूआ बताकर मुआवजे का दावा कर रही है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी ने अपीलीय स्तर पर अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने से जुड़े सीपीसी के आदेश 41 नियम 27 के विधिक प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए कहा:

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“सीपीसी के आदेश 41 नियम 27 के सूक्ष्म परीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि अपील के पक्षकार अपीलीय अदालत में अतिरिक्त साक्ष्य (मौखिक या दस्तावेजी) पेश करने के हकदार तब तक नहीं हैं, जब तक कि वे संहिता के खंड (ए), (एए) और (बी) में दिए गए सिद्धांतों के दायरे में न आते हों—जहां अपीलीय अदालत को निर्णय सुनाने में सक्षम होने के लिए किसी दस्तावेज को पेश करने या किसी गवाह से पूछताछ की आवश्यकता हो, या किसी अन्य ठोस कारण से ऐसा जरूरी हो। ‘निर्णय सुनाने में सक्षम होने के लिए’ इस अभिव्यक्ति की व्याख्या इस प्रकार की गई है कि जब अपीलीय अदालत मौजूदा साक्ष्यों में किसी कमी या त्रुटि के कारण निर्णय सुनाने में खुद को असमर्थ पाती है, तो वह अतिरिक्त साक्ष्य स्वीकार कर सकती है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इस प्रावधान का उपयोग निचली अदालत के समक्ष असफल रहे पक्षकार के कमजोर साक्ष्यों को दुरुस्त करने के लिए किया जाए, हालांकि, यदि अदालत को स्वयं दोनों पक्षों के बीच न्याय करने के लिए साक्ष्य की आवश्यकता महसूस होती है, तो वह इसे स्वीकार कर सकती है।”

हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रिब्यूनल ने केवल प्रदर्श 8/डी पेश न होने के कारण दावा खारिज किया था, जबकि उसी खाते और प्लॉट से संबंधित अन्य दावों को इसी दस्तावेज के आधार पर स्वीकार किया गया था। दावेदार को दी गई नौकरी का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“मूल दावेदार/अपीलकर्ता को प्रतिवादी सीसीएल द्वारा पहले ही रोजगार प्रदान किया जा चुका है, जिससे दावेदारों/अपीलकर्ताओं का यह दावा और मजबूत होता है कि संबंधित भूमि का अधिग्रहण किया गया था और इसी कारण प्रतिवादी सीसीएल ने मूल दावेदार/अपीलकर्ता को रोजगार दिया था।”

न्याय के हित में आवश्यक शर्तें पूरी होने पर हाईकोर्ट ने अंतरिम आवेदन को स्वीकार करते हुए दोनों दस्तावेजों को अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में रिकॉर्ड पर ले लिया।

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हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपर न्यायिक आयुक्त प्रथम सह ट्रिब्यूनल, रांची द्वारा 29 सितंबर 2018 को पारित निर्णय को रद्द कर दिया और रेफरेंस केस संख्या 07/1998 को उसके मूल क्रमांक पर बहाल कर दिया। ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया गया है कि वह अतिरिक्त साक्ष्य के रूप में स्वीकार किए गए दोनों दस्तावेजों को ध्यान में रखते हुए मामले पर नए सिरे से निर्णय ले।

मामला कई दशक पुराना होने के मद्देनजर हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं और सीसीएल दोनों को 29 सितंबर 2026 को सुबह 10:30 बजे संबंधित ट्रिब्यूनल के समक्ष उपस्थित होने का निर्देश दिया। अदालत ने दोनों पक्षों को स्पष्ट हिदायत दी कि वे मामले के त्वरित निस्तारण में पूरा सहयोग करें और अनावश्यक स्थगन न लें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: भुनेश्वरी देवी एवं अन्य बनाम भारत संघ, सीएमडी, सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड के माध्यम से एवं अन्य

वाद संख्या: एम.ए. संख्या 664 / 2018 

पीठ: जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी 

निर्णय की तिथि: 17 सितंबर 2026

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