दहेज हत्या के मामले में प्रताड़ना के आरोपों के बीच हार्ट अटैक से मौत को स्वतः ‘प्राकृतिक’ नहीं माना जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस चवण प्रकाश की एकलपीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि शादी के सात साल के भीतर लगातार दहेज उत्पीड़न के आरोप हों, तो सिर्फ मेडिकल रिपोर्ट में मौत का कारण कार्डियक अरेस्ट या मायोकार्डियल इन्फार्कशन (हार्ट अटैक) दर्ज होने को स्वतः ‘प्राकृतिक मौत’ का निर्णायक प्रमाण मानकर आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती। कोर्ट ने कहा कि शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना भी इस तरह की जानलेवा शारीरिक स्थितियों को ट्रिगर कर सकती है। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में सास की ओर से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत दाखिल उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें चार्जशीट, संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला 4 मई 2021 को हुई एक शादी से जुड़ा है। अभियोजन के अनुसार, 18/19 फरवरी 2025 की दरम्यानी रात विवाहिता अपने ससुराल में अचेत अवस्था में मिली। परिजन उसे पहले फिरोजाबाद के लक्ष्मी हॉस्पिटल ट्रॉमा एंड क्रिटिकल केयर ले गए, जहां उसे बुखार, सिरदर्द और दौरे (सीजर्स) की शिकायत थी। हालत गंभीर होने पर 19 फरवरी 2025 को उसे आगरा के उजाला सिग्नस रेनबो हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। न्यूरो आईसीयू में इलाज के दौरान उसे कार्डियक अरेस्ट हुआ और 25 फरवरी 2025 को उसकी मौत हो गई।

घटना के बाद मृतका के भाई ने एक जीरो एफआईआर दर्ज कराई, जिसे बाद में फिरोजाबाद जिले के टूंडला थाने में अपराध संख्या 109/2025 के रूप में स्थानांतरित किया गया। पुलिस ने जांच पूरी कर 10 सितंबर 2025 को सास के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 80(2), 85, 61, 115(2) और दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत चार्जशीट दाखिल की। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, फिरोजाबाद ने 3 जनवरी 2026 को अपराध पर संज्ञान लिया। इसके बाद आरोपी सास ने चार्जशीट और पूरी कार्यवाही को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

आवेदिका (सास) के वकील ने दलील दी कि उन्होंने कभी अतिरिक्त दहेज की मांग नहीं की और न ही बहू के साथ कोई क्रूरता या उत्पीड़न किया। वकील ने अस्पताल के रिकॉर्ड और एमआरआई जांच का हवाला देते हुए कहा कि मृतका वायरल एन्सेफलाइटिस और मेनिनजाइटिस जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित थी और उसकी मौत पूरी तरह से स्वाभाविक मेडिकल जटिलताओं की वजह से हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि मौत का कारण मायोकार्डियल इन्फार्कशन के चलते हुआ शॉक था। वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों—बाबू भाई बनाम गुजरात राज्य (2010), गुजरात राज्य बनाम अफरोज मोहम्मद हसनफत्ता (2019) और हाजी इकबाल बनाम यूपी राज्य (2023) पर भरोसा जताते हुए कहा कि मृतका के शरीर पर चोट, जलने या जहर दिए जाने के कोई साक्ष्य नहीं हैं। इसलिए बीएनएस की धारा 80(2) के तहत ‘अप्राकृतिक मौत’ या ‘असामान्य परिस्थितियों में मौत’ की अनिवार्य वैधानिक शर्त पूरी नहीं होती और मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

इसके विपरीत, राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता (एजीए) और शिकायतकर्ता पक्ष के वकील ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि शादी से पहले और बाद में दबाव डालकर कुल 23,25,000 रुपये का दहेज लिया गया, जिसमें से 16,25,000 रुपये सीधे सास के निजी बैंक खाते में आरटीजीएस के जरिए ट्रांसफर कराए गए थे और 7,00,000 रुपये नकद दिए गए थे। उन्होंने कहा कि लगातार हो रहे उत्पीड़न के कारण विवाहिता जून 2024 में ससुराल छोड़कर अपने मायके चली गई थी और जनवरी 2025 में देवर की शादी के समय ससुराल वालों के भरोसे पर ही लौटी थी। अस्पताल में भर्ती होने से तीन दिन पहले, 15 फरवरी 2025 को उसने अपनी मां को फोन पर बताया था कि सास और ननद ने उसे घसीटा और उसके साथ मारपीट की। पोस्टमार्टम में भी उसके दोनों कंधों पर खरोंच और चोट के निशान पाए गए थे। भूषण कुमार बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) (2012) और कांति भद्र शाह बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2000) के फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने दलील दी कि डॉक्टर के मौखिक बयान के बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट अपने आप में कोई अंतिम साक्ष्य नहीं है और मामले में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया ट्रायल चलाए जाने के योग्य हैं।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

बीएनएसएस की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों के दायरे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि कार्यवाही केवल तभी रद्द की जा सकती है जब एफआईआर या शिकायत के आरोपों को उनके मूल रूप में स्वीकार करने पर भी कोई अपराध न बनता हो। इस चरण पर अदालत सबूतों की सूक्ष्म जांच, उनकी विश्वसनीयता का मूल्यांकन या मिनी-ट्रायल नहीं कर सकती।

अदालत ने बीएनएस की धारा 80, 85 और 86 का विश्लेषण करते हुए रेखांकित किया कि ‘क्रूरता’ में ऐसा कोई भी जानबूझकर किया गया आचरण शामिल है जिससे महिला के जीवन, अंग या शारीरिक अथवा मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर खतरा पैदा होने की संभावना हो। गवाहों के बयानों में सास के खिलाफ स्पष्ट और विशिष्ट आरोप मौजूद हैं।

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दहेज हत्या के मामलों में ‘असामान्य परिस्थितियों में मौत’ पद की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीर फैसले कंस राज बनाम पंजाब राज्य (2000) का उल्लेख किया, जिसमें माना गया था कि सामान्य परिस्थितियों का अर्थ उम्र या सामान्य बीमारी से होने वाली स्वाभाविक मृत्यु से है। मामले की परिस्थितियों को देखते हुए जस्टिस चव्हाण प्रकाश ने अहम टिप्पणी की:

“यदि महज तीन या चार साल पहले ब्याही गई किसी युवती को लगातार क्रूरता या मानसिक प्रताड़ना झेलने के दौरान बुखार, दौरे (सीजर्स) और मायोकार्डियल इन्फार्कशन की हालत में अस्पताल लाया जाता है, तो शुरुआती चरण में स्वतः यह नहीं माना जा सकता कि उसकी मौत पूरी तरह स्वाभाविक थी। शारीरिक तनाव, मानसिक प्रताड़ना या कोई ऐसा अदृश्य विष अथवा पदार्थ, दौरे, कार्डियोजेनिक शॉक या मायोकार्डियल इन्फार्कशन जैसी चिकित्सीय स्थितियों को ट्रिगर कर सकता है।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि जब शादी के सात साल के भीतर दहेज उत्पीड़न और मौत से जुड़े बुनियादी तथ्य प्रथम दृष्टया सामने आ जाते हैं, तब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 के तहत वैधानिक उपधारणा (प्रिजम्प्शन) लागू हो जाती है। मेडिकल रिपोर्ट पर विचार करते हुए अदालत ने कहा:

“यह तय करना कि मेडिकल स्थितियां (बुखार, दौरे और मायोकार्डियल इन्फार्कशन) पूरी तरह प्राकृतिक थीं या फिर सिलसिलेवार क्रूरता अथवा अन्य गंभीर कारणों से उत्पन्न या प्रेरित हुई थीं, इसके लिए इलाज करने वाले डॉक्टरों व चिकित्सा विशेषज्ञों के परीक्षण के साथ-साथ हिस्टोपैथोलॉजिकल और टॉक्सिकोलॉजिकल जांच, विसरा रिपोर्ट तथा उत्पीड़न की नजदीकी समयावधि को लेकर गवाहों की सीधी गवाही की आवश्यकता होगी। ये बिंदु पूरी तरह से ट्रायल के दायरे में आते हैं और बीएनएसएस की धारा 528 के तहत संक्षिप्त कार्यवाही में इनका निर्धारण नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से माना कि केवल मायोकार्डियल इन्फार्कशन की मेडिकल राय के आधार पर कार्यवाही को रद्द करना विशेषज्ञ साक्ष्यों पर समय से पहले ट्रायल चलाने जैसा होगा, जिसकी कानून में अनुमति नहीं है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने माना कि दहेज की मांग, क्रूरता और शादी के चार साल के भीतर हुई मौत से जुड़े तथ्य कानून और तथ्यों का मिला-जुला प्रश्न हैं, जिनका निपटारा निष्पक्ष ट्रायल के दौरान ही गवाहों के परीक्षण और बचाव पक्ष के साक्ष्यों के आधार पर हो सकता है। इन निष्कर्षों के साथ अदालत ने बीएनएसएस की धारा 528 के तहत दायर आवेदन को खारिज कर दिया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: निर्मला देवी बनाम यूपी राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: आवेदन अंतर्गत धारा 528 बीएनएसएस संख्या 11303/2026
पीठ: जस्टिस चवण प्रकाश
निर्णय की तिथि: 24 सितंबर 2026

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