विभागीय कार्यवाहियों में निष्पक्ष प्रक्रिया के पालन को अनिवार्य बताते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में कहा है कि किसी भी कर्मचारी पर लघु दंड (माइनर पेनल्टी) लगाने से पहले भी उसे लिखित प्रस्ताव की जानकारी देना और सुनवाई का उचित अवसर प्रदान करना अनिवार्य है। जस्टिस बिभू दत्त गुरु की एकलपीठ ने एक सहायक मानचित्रकार (असिस्टेंट ड्राफ्ट्समैन) पर लगाए गए दंडादेश को निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि दंड पारित हो जाने के बाद कर्मचारी के अभ्यावेदन (रिप्रजेंटेशन) पर विचार करना, प्राकृतिक न्याय के प्रारंभिक उल्लंघन की भरपाई नहीं कर सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता प्रभावती पटेल, जो ग्रामीण यांत्रिकी सेवा, संभाग कोरबा में सहायक मानचित्रकार के पद पर कार्यरत थीं, ने जिला पंचायत कोरबा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (प्रतिवादी क्रमांक 6) द्वारा 11 जून 2026 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उन पर असंचयी प्रभाव से एक वार्षिक वेतनवृद्धि रोकने का लघु दंड लगाया गया था।
यह अनुशासनात्मक कार्रवाई 10 जून 2026 को निर्माण कार्यों की प्रगति को लेकर आयोजित एक समीक्षा बैठक के आधार पर की गई थी। याचिकाकर्ता ने क्षेत्रीय अधिकारियों द्वारा उपलब्ध कराई गई सामग्री के आधार पर जानकारी संकलित कर समीक्षा बैठक में प्रस्तुत की थी। बैठक के 24 घंटे के भीतर ही, 11 जून 2026 को सक्षम प्राधिकारी ने जानकारी में विसंगतियों का आरोप लगाते हुए दंडादेश पारित कर दिया। इसके उपरांत याचिकाकर्ता ने 15 जून 2026 को अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत किया था।
पक्षकारों के तर्क
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ज़ैनब मुस्तफा वनक ने दलील दी कि आक्षेपित आदेश छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के नियम 16(1)(क) का घोर उल्लंघन कर पारित किया गया है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता को कदाचार के आरोपों से जुड़ा कोई लिखित प्रस्ताव नहीं दिया गया और न ही दंड लगाने से पूर्व अपनी स्थिति स्पष्ट करने का कोई अवसर मिला।
याचिकाकर्ता के वकील ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ओ.के. भारद्वाज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य (सिविल अपील क्रमांक 12774/1996) पर भरोसा जताते हुए कहा कि लघु दंड के मामलों में भी कर्मचारी को अपने ऊपर लगे आरोपों पर स्पष्टीकरण देने का मौका मिलना चाहिए, क्योंकि यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की न्यूनतम आवश्यकता है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दूसरी ओर, राज्य के वकील शलीन सिंह बघेल और प्रतिवादी क्रमांक 6 की ओर से अधिवक्ता राहुल साहू ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि सक्षम प्राधिकारी के समक्ष जानकारी प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी याचिकाकर्ता की थी और प्रस्तुत की गई जानकारी गलत पाई गई थी। उन्होंने कहा कि यह लापरवाही आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में घोर चूक है। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि चूक की प्रकृति को देखते हुए लघु दंड में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, विशेषकर तब जब याचिकाकर्ता के बाद में दिए गए अभ्यावेदन पर सक्षम प्राधिकारी ने विधिवत विचार कर लिया था।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
अदालत के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या 1966 के नियमों के नियम 16 में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना लघु दंड का आदेश पारित किया जा सकता था। कोर्ट ने रेखांकित किया कि नियम 16(1)(क) के तहत शासकीय सेवक को प्रस्तावित कार्रवाई और कदाचार के आरोपों की लिखित सूचना देना तथा अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का युक्तियुक्त अवसर देना अनिवार्य है।
इस प्रक्रियात्मक सुरक्षा को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“नियम 16(1)(क) में दी गई सुरक्षा मात्र एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है। यह प्रावधान निष्पक्षता की उस बुनियादी आवश्यकता को समाहित करता है कि किसी सरकारी कर्मचारी पर दंड लगाए जाने से पहले, उसे आरोपों का सामना करने और अनुशासनात्मक प्राधिकारी के समक्ष अपना स्पष्टीकरण रखने का प्रभावी अवसर मिलना चाहिए।”
कोर्ट ने पाया कि समीक्षा बैठक के 24 घंटे के भीतर आदेश पारित करने और उससे पहले नोटिस या सुनवाई का मौका न देने पर प्रतिवादी कोई उचित कारण नहीं बता सके। प्रतिवादियों के इस तर्क को खारिज करते हुए कि बाद के अभ्यावेदन से प्रक्रिया पूरी हो गई, कोर्ट ने कहा:
“इस प्रकार के उत्तरवर्ती अभ्यावेदन को नियम 16(1)(क) का अनुपालन नहीं माना जा सकता। वैधानिक आवश्यकता यह है कि प्रस्तावित दंड लगाए जाने से पहले अवसर दिया जाए, ताकि कर्मचारी द्वारा प्रस्तुत स्पष्टीकरण पर अनुशासनात्मक प्राधिकारी यह निर्णय लेते समय विचार कर सके कि क्या कोई दंड आवश्यक है और यदि हां, तो कौन सा दंड लगाया जाना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि दंड के लघु होने से वैधानिक अनिवार्यता समाप्त नहीं होती:
“यह तथ्य कि लगाया गया दंड एक लघु दंड है, नियम 16 की अनिवार्य आवश्यकता को समाप्त नहीं करता। इसी प्रकार, यह तर्क भी कि कथित चूक समीक्षा बैठक की कार्यवाही से स्पष्ट थी, नियम 16(1)(क) के तहत मिलने वाले वैधानिक अवसर का स्थान नहीं ले सकता।”
कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि याचिकाकर्ता ने इस तथ्य पर विवाद किया था और कहा था कि डेटा मैदानी अधिकारियों से प्राप्त हुआ था। अदालत ने माना कि इन विवादित बिंदुओं पर विचार कर्मचारी को अपनी स्थिति रखने का अवसर देने के बाद ही किया जाना चाहिए था।
कोर्ट ने निष्कर्ष देते हुए कहा:
“याचिकाकर्ता को दंड अधिरोपित किए जाने से पूर्व न तो कदाचार के आरोपों के साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई के प्रस्ताव की लिखित सूचना दी गई और न ही अपना अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का उचित अवसर दिया गया। आक्षेपित आदेश पारित होने के बाद याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत किया गया उत्तरवर्ती अभ्यावेदन उक्त बुनियादी प्रक्रियात्मक खामी को दूर नहीं कर सकता।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने 11 जून 2026 के दंडादेश को कानून सम्मत न पाते हुए निरस्त कर दिया और निर्देश दिया कि इसके परिणामी लाभ प्रदान किए जाएं। अदालत ने सक्षम अनुशासनात्मक प्राधिकारी को यह छूट दी कि यदि कानूनन अनुमति हो, तो वे 1966 के नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए नए सिरे से कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: प्रभावती पटेल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य
वाद संख्या: डब्ल्यूपीएस संख्या 6103/2026
पीठ: जस्टिस बिभू दत्त गुरु
निर्णय की तिथि: 23 सितंबर 2026

