सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि POCSO Act के तहत आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे पिता को, ऐसे मामले के लंबित रहने के दौरान, बच्चों की कस्टडी देना उचित नहीं होगा, खासकर तब जब बच्चों की सुरक्षा और उनके सर्वोत्तम हित का सवाल हो। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने फिलहाल मां को अपने दोनों नाबालिग बच्चों को यूनाइटेड किंगडम ले जाने और वहां किसी अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने की अनुमति दे दी है। साथ ही, पिता को दोनों बच्चों की एकमात्र कस्टडी देने वाले निचली अदालतों के आदेशों पर लगी रोक जारी रखी गई है।
मामला दिल्ली हाईकोर्ट के 23 जनवरी 2026 के फैसले के खिलाफ मां की अपील से जुड़ा था। दिल्ली हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा था, जिसमें पिता को दोनों बच्चों की एकमात्र कस्टडी दी गई थी। हाईकोर्ट ने मां की बच्चों को यूनाइटेड किंगडम ले जाने की अनुमति वाली अर्जी भी खारिज कर दी थी।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों की शादी सितंबर 2011 में हुई थी। उनके बेटे का जन्म अप्रैल 2013 में और बेटी का जन्म जनवरी 2019 में हुआ। फैसले के अनुसार, 2018 में पति-पत्नी के संबंध खराब हो गए, जब मां चार महीने की गर्भवती थी। वह वैवाहिक घर छोड़कर चली गई और सितंबर 2018 में बेटे की कस्टडी वापस अपने पास ले ली। बेटी जन्म के बाद से ही मां की देखरेख में रही।
मां कंप्यूटर साइंस और इंजीनियरिंग क्षेत्र की शिक्षाविद हैं। उन्होंने IIT जोधपुर और VIT यूनिवर्सिटी सहित कई संस्थानों में काम किया और बाद में बेंगलुरु चली गईं। इसके बाद उन्हें यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटी ऑफ हल में लेक्चरर की नौकरी मिली, जहां उनकी आय करीब तीन लाख रुपये प्रति माह बताई गई। दूसरी ओर, पिता पश्चिम बंगाल में पार्ट-टाइम लेक्चरर के रूप में करीब 17,000 रुपये प्रति माह कमा रहे थे।
जुलाई 2024 में फैमिली कोर्ट ने पिता की गार्जियनशिप याचिका स्वीकार कर उन्हें दोनों बच्चों का एकमात्र कस्टोडियन घोषित कर दिया। जनवरी 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखा।
इस बीच बेटे में आक्रामक व्यवहार के संकेत दिखने पर उसे बेंगलुरु स्थित NIMHANS ले जाया गया। फैसले के अनुसार, वहां उसने पिता द्वारा कथित यौन उत्पीड़न से जुड़ी बातें बताईं। इसके बाद नवंबर 2023 में POCSO Act के तहत FIR दर्ज हुई। जांच के बाद पिता के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। पिता ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द कराने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की, जो अभी लंबित है।
बच्चों ने पिता के साथ रहने में दिखाई गंभीर अनिच्छा
सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही के दौरान पीठ ने माता-पिता और दोनों बच्चों से चैंबर में बातचीत की। अदालत ने दर्ज किया कि बेटा पिता के साथ रहने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था और पिता के साथ होने की बात पर भी उसके व्यवहार में गहरा डर दिखाई दे रहा था। इसके बाद फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट और फैमिली कोर्ट के आदेशों पर रोक लगा दी।
बाद में कोर्ट ने गर्मियों की छुट्टियों के दौरान पिता और बच्चों की निगरानी में मुलाकात की व्यवस्था की। काउंसलरों की रिपोर्ट में कहा गया कि दोनों बच्चे पिता से बातचीत करने में लगातार अनिच्छा दिखा रहे थे। बेटी में डर और भावनात्मक परेशानी भी देखी गई। दोनों बच्चों ने मां के साथ रहने की इच्छा जाहिर की।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट में बातचीत और मुलाकात की प्रक्रिया से यह बात स्पष्ट हुई कि बेटा पिता के साथ रहने को लेकर बेहद अनिच्छुक था। अदालत ने यह भी नोट किया कि बेटी का जन्म मां के वैवाहिक घर छोड़ने के बाद हुआ था और अदालत द्वारा कराई गई अस्थायी मुलाकातों को छोड़कर उसका पिता से बहुत कम संपर्क रहा था।
मां की ओर से क्या कहा गया
मां की ओर से सीनियर एडवोकेट जोहेब हुसैन ने कहा कि कई वर्षों से मां ही दोनों बच्चों की मुख्य देखभाल कर रही हैं। बेटा सितंबर 2018 से उनके साथ रह रहा है और बेटी जन्म से उनकी देखरेख में है। ऐसे में बच्चों की स्थापित जीवन व्यवस्था को बदलना उनके हित में नहीं होगा।
यह भी दलील दी गई कि मां ने बार-बार नौकरी अपनी इच्छा से नहीं बदली, बल्कि परिस्थितियों के कारण ऐसा करना पड़ा। इसलिए उनके रोजगार के सिलसिले में अलग-अलग शहरों में जाने को “घुमंतू जीवनशैली” कहना उचित नहीं था। मां की ओर से बच्चों की इच्छा, उनकी पढ़ाई और काउंसलरों की रिपोर्ट पर भी भरोसा किया गया।
POCSO केस को लेकर कहा गया कि NIMHANS में बच्चे द्वारा की गई बातों को कस्टडी तय करते समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर जब जांच के बाद चार्जशीट दाखिल हो चुकी है।
मां ने यह भी कहा कि यूनाइटेड किंगडम में रहने से बच्चों को आर्थिक सुरक्षा, बेहतर शिक्षा और स्थिर माहौल मिलेगा।
पिता की ओर से क्या दलील दी गई
पिता की ओर से सीनियर एडवोकेट श्याम दीवान ने कहा कि केवल माता-पिता की आर्थिक स्थिति में अंतर के आधार पर कस्टडी तय नहीं की जा सकती।
उन्होंने दावा किया कि यह parental alienation का मामला है और मां ने बच्चों को पिता से दूर कर दिया है। उन्होंने बच्चों को UK ले जाने का भी विरोध किया और कहा कि इससे वे बंगाली परिवार की सांस्कृतिक परंपराओं और मूल्यों से दूर हो सकते हैं।
POCSO केस को लेकर उनकी ओर से कहा गया कि पिता की quashing petition कलकत्ता हाईकोर्ट में लंबित है और केवल चार्जशीट दाखिल हो जाने से उनका बच्चों की कस्टडी मांगने का अधिकार खत्म नहीं हो जाता।
मां की नौकरी बदलने को ‘घुमंतू जीवन’ कहना सुप्रीम कोर्ट ने गलत माना
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों के उस नजरिए से असहमति जताई, जिसमें मां द्वारा अलग-अलग जगह नौकरी करने को “nomadic life” कहा गया था।
कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक घर छोड़ने के बाद मां ने अपने और बच्चों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए अपनी योग्यता के अनुरूप अच्छी नौकरी पाने का प्रयास किया।
पीठ ने कहा:
“अधीनस्थ अदालतों ने मां के इस प्रयास को ‘घुमंतू जीवन’ करार दिया, जो हमारी राय में पूरी तरह अनुचित और वास्तविकता से बहुत दूर है।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि मुकदमों का सामना करते हुए अलग-अलग नौकरियां कर अपने और बच्चों के लिए आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की मां की कोशिशें कस्टडी के सवाल पर उनके पक्ष में महत्वपूर्ण पहलू हैं।
POCSO केस पर दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणियां हटाईं
सुप्रीम कोर्ट ने POCSO FIR की सच्चाई को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई।
कोर्ट ने कहा कि FIR बच्चे द्वारा NIMHANS के मनोचिकित्सक को दी गई जानकारी के बाद दर्ज हुई थी और पुलिस जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है।
पीठ ने कहा:
“हमारी स्पष्ट राय है कि POCSO FIR की सत्यता को लेकर हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियां अनुचित, अनावश्यक और समय से पहले थीं।”
सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटा दिया और निर्देश दिया कि FIR से जुड़ी आपराधिक कार्यवाही में इन पर विचार नहीं किया जाएगा।
मुकदमे का सामना कर रहे पिता को कस्टडी देना उचित नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब POCSO Act के तहत आरोपों की जांच के बाद पिता के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, तब उन्हें बच्चे की कस्टडी देना उचित नहीं होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कस्टडी तय करते समय बच्चों का सर्वोत्तम हित सबसे महत्वपूर्ण विचार होना चाहिए। इस संबंध में कोर्ट ने Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015 की धारा 3 में दिए गए बच्चे की भागीदारी, सर्वोत्तम हित, सुरक्षा और अधिकारों से जुड़े सिद्धांतों का उल्लेख किया।
पीठ ने कहा:
“जब तक प्रतिवादी-पिता आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे हैं, तब तक किसी भी परिस्थिति में उन्हें बच्चों की कस्टडी का हकदार नहीं माना जा सकता।”
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर पिता कलकत्ता हाईकोर्ट में अपनी quashing petition में सफल हो जाते हैं, तब भी बच्चे द्वारा आरोप लगाए जाने की परिस्थितियां अपने आप खत्म नहीं हो जाएंगी। बच्चे की आशंकाएं उसकी कस्टडी और कल्याण तय करते समय प्रासंगिक बनी रहेंगी।
मां को बच्चों के साथ UK जाने की अनुमति
सुप्रीम कोर्ट ने पिता की इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया कि दूसरे देश में जाने से बच्चे बंगाली संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों से दूर हो जाएंगे।
कोर्ट ने कहा कि केवल किसी दूसरे देश में रहने से यह मान लेना उचित नहीं है कि बच्चे अपने सांस्कृतिक मूल्यों को खो देंगे।
मां की UK में नौकरी, बच्चों की मौजूदा स्थिति और पिता के खिलाफ लंबित POCSO मुकदमे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मां की relocation की मांग को फिलहाल उचित माना।
मां को दोनों बच्चों को यूनाइटेड किंगडम ले जाने और वहां अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने की अनुमति दी गई है। उन्हें छह सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल कर बच्चों के स्कूल की जानकारी कोर्ट के रिकॉर्ड पर रखनी होगी।
इसके अलावा मां को यह undertaking देनी होगी कि सुप्रीम कोर्ट या किसी अन्य अदालत के निर्देश पर वह बच्चों को कोर्ट के सामने पेश करेंगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कलकत्ता हाईकोर्ट पिता की quashing petition का फैसला स्वतंत्र रूप से और उसके अपने गुण-दोष के आधार पर करेगा। दिल्ली हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट की कस्टडी मामले में की गई टिप्पणियों से वह प्रभावित नहीं होगा।
मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2027 में होगी।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: देबराती भुनिया चक्रवर्ती बनाम सुमन शंकर भुनिया
केस नंबर: सिविल अपील संख्या 12774 और 12775 ऑफ 2026
बेंच: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता
तारीख: 23 सितंबर 2026

