संयुक्त किरायेदार वैधानिक समय-सीमा से बचने के लिए धारा 7 के तहत अलग-अलग आवेदन नहीं कर सकते: कलकत्ता हाईकोर्ट

कलकत्ता हाईकोर्ट ने माना है कि जहां कई संयुक्त किरायेदार एक ही किरायेदारी और एक ही परिसर से जुड़े हों, वहां एक किरायेदार द्वारा West Bengal Premises Tenancy Act, 1997 की धारा 7(1) और 7(2) के तहत दाखिल आवेदन समय-सीमा से बाहर होने के कारण खारिज हो जाने के बाद दूसरा संयुक्त किरायेदार उन्हीं प्रावधानों के तहत नया आवेदन दाखिल कर वैधानिक समय-सीमा को दरकिनार नहीं कर सकता। जस्टिस अजय कुमार गुप्ता ने कहा कि धारा 7 के तहत उपलब्ध बचाव संयुक्त किरायेदारों के लिए एकीकृत प्रकृति का है।

हाईकोर्ट ने Presidency Small Causes Court के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनके तहत दूसरे प्रतिवादी का बाद में दाखिल धारा 7 का आवेदन स्वीकार किया गया था। हालांकि दूसरे प्रतिवादी को नया नोटिस देने वाला हिस्सा बरकरार रखा गया, ताकि वह कानून के अनुसार बेदखली वाद का मुकाबला कर सके।

मामले की पृष्ठभूमि

मामला Presidency Small Causes Court, Calcutta में दायर एक बेदखली वाद से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने किराया न चुकाने, अनधिकृत निर्माण, उपयोग में बदलाव और उचित आवश्यकता सहित विभिन्न आधारों पर प्रतिवादियों की बेदखली मांगी थी।

दोनों प्रतिवादियों को 25 मार्च 2025 को कोर्ट बेलिफ और Speed Post A/D के जरिए समन भेजे गए थे। रिकॉर्ड के अनुसार, प्रतिवादी नंबर 1 का समन उसकी पुत्रवधू “Moumita” ने 26 मार्च 2025 को प्राप्त किया था। प्रतिवादी नंबर 2 को भेजी गई डाक भी उसी व्यक्ति को पहुंची, लेकिन बाद में “addressee left without instruction” की टिप्पणी के साथ वापस कर दी गई।

29 अप्रैल 2025 के आदेश से Chief Judge ने प्रतिवादी नंबर 1 द्वारा धारा 7(1) और 7(2) के तहत दाखिल आवेदन को समय-सीमा से बाहर होने के कारण खारिज कर दिया। इसके बावजूद कोर्ट ने प्रतिवादी नंबर 2 को दोबारा समन भेजने का निर्देश दिया।

इसके बाद प्रतिवादी नंबर 2 ने 9 जून 2025 को धारा 7(1) और 7(2) के तहत नए आवेदन दाखिल किए। 3rd Judge, Presidency Small Causes Court ने 11 सितंबर 2025 को उन आवेदनों को स्वीकार कर लिया।

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इसके खिलाफ वादी ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता ने कहा कि जब एक संयुक्त किरायेदार का धारा 7 के तहत आवेदन वैधानिक समय-सीमा से बाहर होने के कारण खारिज हो चुका था, तब दूसरा किरायेदार उसी आधार पर नया आवेदन देकर उसी बचाव को दोबारा जीवित नहीं कर सकता।

यह भी दलील दी गई कि यदि ऐसा करने की अनुमति दी जाती है तो कानून में तय समय-सीमा का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि CPC की धारा 151 का सहारा लेकर किसी स्पष्ट वैधानिक रोक को पार नहीं किया जा सकता।

अपनी दलीलों के समर्थन में Uma Beriwal and Ors. v. Sree Shree Iswar Annapurna Mata & Ors., Jayanti Dam and Ors. v. Aurobinda Pyne, Seventh Day Adventist Senior Secondary School v. Ismat Ahmed and Ors. तथा Vishwabandhu v. Sri Krishna and Anr. सहित कई फैसलों पर भरोसा किया गया।

दूसरे प्रतिवादी का पक्ष

प्रतिवादी नंबर 2 की ओर से कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने खुद उसके खिलाफ नया समन जारी करने का निर्देश दिया था और नया समन प्राप्त होने के बाद उसने तय समय के भीतर धारा 7 के आवेदन दाखिल किए।

यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता ने 29 अप्रैल 2025 के उस आदेश को चुनौती नहीं दी थी, जिसमें प्रतिवादी नंबर 2 को दोबारा समन देने का निर्देश था। इसलिए बाद के आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी।

संयुक्त किरायेदारी में धारा 7 का बचाव अलग-अलग नहीं हो सकता

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड से पाया कि दोनों प्रतिवादी एक ही रेंट रसीद के तहत संयुक्त किरायेदार थे। इसके बाद कोर्ट ने यह प्रश्न विचार के लिए लिया कि जब तथ्य, किराये का परिसर और बचाव समान हों तथा एक किरायेदार का आवेदन पहले ही खारिज हो चुका हो, तो क्या अलग-अलग संयुक्त किरायेदार धारा 7(1) और 7(2) के तहत अलग-अलग आवेदन दाखिल कर सकते हैं।

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धारा 7 के तहत किरायेदार को बेदखली वाद में समन की सेवा के एक महीने के भीतर बकाया किराया और ब्याज जमा करना होता है। यदि किराये की देय राशि को लेकर विवाद हो, तो स्वीकार की गई राशि जमा करने के साथ किराया निर्धारण के लिए आवेदन करना आवश्यक है।

हाईकोर्ट ने कहा:

“धारा में ‘tenant’ शब्द tenant/joint tenant दोनों को शामिल करता है, क्योंकि दोनों किराये के परिसर के लिए संयुक्त रूप से किराया जमा करते हैं।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार धारा 7(1) और 7(2) के आवेदन खारिज हो जाने के बाद दूसरे संयुक्त किरायेदार का अलग आवेदन स्वीकार नहीं किया जा सकता।

30 दिन की समय-सीमा अनिवार्य

हाईकोर्ट ने कहा कि बकाया किराया जमा करने के लिए निर्धारित 30 दिन की वैधानिक अवधि अनिवार्य है। इसे Limitation Act की धारा 5 या CPC की धारा 151 में निहित शक्तियों का इस्तेमाल कर बढ़ाया नहीं जा सकता।

कोर्ट ने आगे कहा कि धारा 7 के तहत बचाव उन सभी प्रतिवादियों के लिए एकीकृत है जिन्हें किरायेदार या उनके कानूनी प्रतिनिधि के रूप में पक्षकार बनाया गया है।

हाईकोर्ट ने कहा:

“शेष सह-किरायेदारों/प्रतिवादियों के लिए उपलब्ध बचाव भी समान रूप से प्रभावित होगा, क्योंकि धारा 7 के तहत दायित्व एक एकीकृत बचाव है और एक व्यक्ति की गैर-अनुपालना को अन्य की देयता से अलग नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी गैर-अनुपालना की स्थिति में धारा 7(3) के तहत कब्जा सौंपने के खिलाफ प्रतिरक्षा समाप्त की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पुराने फैसलों पर भरोसा

हाईकोर्ट ने Arsala Khan v. Land & Bricks & Entertainment Ltd. के फैसले पर आधारित ट्रायल कोर्ट की उस टिप्पणी से सहमति जताई कि 1997 का अधिनियम किरायेदार को निर्धारित अवधि के बाद बकाया किराया जमा करने के लिए Limitation Act का सहारा लेने की अनुमति नहीं देता।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Bijay Kumar Singh v. Amit Kumar Chamariya फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें स्वीकार किया गया किराया जमा करने और निर्धारण के लिए आवेदन एक साथ करने को पूर्व शर्त माना गया था तथा देरी की स्थिति में Limitation Act की सहायता से राहत देने से इनकार किया गया था।

इसके अलावा Debasish Paul v. Amal Boral का भी उल्लेख किया गया, जिसमें Bijay Kumar Singh के सिद्धांत को दोहराते हुए कहा गया था कि यदि West Bengal Premises Tenancy Act कम समय-सीमा निर्धारित करता है तो Limitation Act की धारा 5 से उसे बढ़ाया नहीं जा सकता।

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ट्रायल कोर्ट ने अधिकार-क्षेत्र से आगे बढ़कर आदेश दिया

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पहले संयुक्त किरायेदार का आवेदन खारिज हो जाने के बाद दूसरे किरायेदार का धारा 7 का आवेदन स्वीकार करके ट्रायल कोर्ट ने अपने अधिकार-क्षेत्र से आगे बढ़कर काम किया।

कोर्ट ने कहा:

“ट्रायल कोर्ट ने अधिनियम के अनिवार्य प्रावधानों को दरकिनार करते हुए प्रतिवादी नंबर 2, जो एक अन्य किरायेदार है, का धारा 7 के तहत आवेदन स्वीकार कर अपने अधिकार-क्षेत्र से आगे बढ़कर कार्य किया, जबकि ऐसा एक आवेदन पहले ही खारिज हो चुका था।”

हाईकोर्ट ने इस आदेश को gross perversity और palpable illegality वाला बताते हुए रद्द करने योग्य माना।

फैसला

हाईकोर्ट ने Civil Revision को मंजूर करते हुए 29 अप्रैल 2025 और 11 सितंबर 2025 के आदेशों को रद्द कर दिया। हालांकि प्रतिवादी नंबर 2 को नया नोटिस देने वाला हिस्सा बरकरार रखा गया।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी नंबर 2, यदि चाहे, कानून के अनुसार बेदखली वाद का मुकाबला कर सकती है। अंतरिम आदेश, यदि कोई था, उसे भी समाप्त कर दिया गया।

केस डिटेल्स

केस टाइटल: Sanjoy Paul v. Ayodhya Prasad and Anr.

केस नंबर: C.O. No. 4196 of 2025

बेंच: जस्टिस अजय कुमार गुप्ता

तारीख: 18 सितंबर 2026

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