सहकर्मी पर वित्तीय गड़बड़ी का झूठा आरोप लगाने पर पूर्व मैनेजर पर 50 लाख का हर्जाना, मद्रास हाईकोर्ट का फैसला

मद्रास हाईकोर्ट ने एक नीति अनुसंधान केंद्र के कार्यकारी निदेशक (एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर) पर वित्तीय धोखाधड़ी के बेबुनियाद आरोप लगाने के मामले में संस्थान के पूर्व प्रोजेक्ट्स फाइनेंस मैनेजर को 50 लाख रुपये का हर्जाना भरने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी वरिष्ठ पेशेवर पर वित्तीय हेराफेरी का लांछन लगाना गंभीर नैतिक और व्यावसायिक कदाचार के दायरे में आता है, जिससे संबंधित व्यक्ति की सामाजिक और पेशेवर प्रतिष्ठा को भारी क्षति पहुंचती है।

यह आदेश जस्टिस के. गोविंदराजन थिलाकावडी ने ‘इंस्टीट्यूट फॉर फाइनेंशियल मैनेजमेंट एंड रिसर्च’ (आईएफएमआर) के तहत संचालित ‘इंक्लूजन इकोनॉमिक्स इंडिया सेंटर’ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर द्वारा दायर दीवानी मानहानि मुकदमे में 21 सितंबर को सुनाया। एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर ने मानहानि और प्रतिष्ठा की भरपाई के लिए 1,00,10,000 रुपये के मुआवजे की मांग की थी। हालांकि, अदालत ने प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान का प्रमाण न मिलने के आधार पर मुआवजे की राशि घटाकर 50 लाख रुपये निर्धारित की।

संस्थान के फंड के गबन का आरोप सामान्य आलोचना नहीं: हाईकोर्ट

अदालत ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि आरोपी पूर्व मैनेजर द्वारा भेजे गए ईमेल में लगाए गए आरोप कार्यस्थल की सामान्य असहमति या आलोचना तक सीमित नहीं थे। अदालत के अनुसार, किसी वरिष्ठ अधिकारी पर संस्थान के धन के गबन का सीधा आरोप लगाना उसके नैतिक चरित्र और पेशेवर निष्ठा पर सीधा प्रहार है।

जस्टिस थिलाकावडी ने कहा कि इस तरह के लांछन समाज के विवेकशील नागरिकों की नजर में और विशेष रूप से अकादमिक व पेशेवर साथियों के बीच किसी व्यक्ति की साख को गंभीर रूप से गिराते हैं। अदालत ने माना कि यह मामला सीधे तौर पर वादी की ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को धूमिल करने की दुर्भावना से जुड़ा हुआ था।

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अदालत में पेश नहीं हुआ आरोपी, निर्विरोध रहे सारे सबूत

मुकदमे की सुनवाई के दौरान प्रतिवादी पूर्व मैनेजर न तो स्वयं अदालत में पेश हुआ, न ही उसने अपना कोई लिखित पक्ष या गवाही पेश की। इसके चलते एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर द्वारा पेश किए गए मौखिक बयान और दस्तावेजी साक्ष्य अदालत के समक्ष निर्विरोध रहे।

अदालत ने वादी द्वारा प्रस्तुत 26 मई 2022 के ईमेल, 16 दिसंबर 2022 को भेजे गए कानूनी नोटिस, 20 दिसंबर 2022 को प्राप्त प्रतिवादी के जवाब और 7 फरवरी 2023 की कर्मचारी अनुशासन कार्रवाई रिपोर्ट की समीक्षा की। इन दस्तावेजों के आधार पर अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंची कि वादी की प्रतिष्ठा को चोट पहुंचाने के उद्देश्य से संस्थान के प्रबंधन और ऑडिट से जुड़े महत्वपूर्ण पक्षों तक यह मानहानिकारक सामग्री जानबूझकर पहुंचाई गई थी।

ऑडिट में हेराफेरी सामने आने के बाद शुरू हुआ था विवाद

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यह पूरा विवाद चेन्नई स्थित आईएफएमआर के ‘इंक्लूजन इकोनॉमिक्स इंडिया सेंटर’ में शुरू हुआ था, जो केंद्र और राज्य सरकारों के मंत्रालयों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं के सहयोग से नीतिगत शोध कार्य करता है। प्रतिवादी को 12 जून 2018 को 1,41,667 रुपये के मासिक वेतन पर प्रोजेक्ट्स फाइनेंस मैनेजर के पद पर नियुक्त किया गया था।

मामले के अनुसार, एक व्हिसलब्लोअर द्वारा वरिष्ठ प्रबंधन को अनियमितताओं की सूचना दिए जाने के बाद 24 मार्च 2022 को संस्थान में नियमित आंतरिक ऑडिट कराया गया। ऑडिट में धन की हेराफेरी पकड़े जाने के अगले ही दिन, 25 मार्च 2022 को मैनेजर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

वादी के अनुसार, जब तत्कालीन मैनेजर से इन वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर पूछताछ की गई, तो उसने संस्थान के मुख्य वित्तीय अधिकारी (सीएफओ) और रजिस्ट्रार के साथ फोन पर हुई बातचीत में माना कि उसने लालच में आकर यह कदम उठाया था। इसके बाद उसने संस्थान को दो किस्तों में कुल 6,07,988 रुपये की राशि वापस भी लौटाई थी।

फॉरेंसिक ऑडिटर को ईमेल भेजकर लगाए थे झूठे आरोप

इस्तीफे और पैसे लौटाने के करीब दो महीने बाद, आरोपी पूर्व मैनेजर ने 26 मई 2022 को संस्थान के फॉरेंसिक ऑडिटर को एक ईमेल भेजा। इस ईमेल में एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर के चरित्र, आचरण और सत्यनिष्ठा पर गंभीर लांछन लगाए गए थे। बाद में यह ईमेल संस्थान के रजिस्ट्रार को भेजा गया, जिसकी जानकारी वादी को 11 अक्टूबर 2022 को मिली।

एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर ने अदालत को बताया कि यह ईमेल उनकी पेशेवर छवि को बर्बाद करने की सोची-समझी साजिश थी।

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प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान साबित न होने पर तय हुआ 50 लाख का मुआवजा

मुआवजे के निर्धारण पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हर्जाने की राशि केवल वादी द्वारा मांगी गई रकम के आधार पर तय नहीं की जा सकती, बल्कि यह उपलब्ध साक्ष्यों और वस्तुस्थिति पर निर्भर करती है।

अदालत ने पाया कि वादी ने अपनी गरिमा, सामाजिक प्रतिष्ठा और साख को पहुंचे मानसिक व पेशेवर आघात को पूरी तरह साबित किया है। हालांकि, आरोपों के कारण नौकरी जाने, आय में प्रत्यक्ष कमी आने या किसी बड़े पेशेवर अनुबंध के रद्द होने जैसा कोई सीधा वित्तीय नुकसान दस्तावेजी तौर पर प्रमाणित नहीं हुआ। इन सभी पहलुओं, आरोपों की गंभीरता और दोनों पक्षों की पेशेवर स्थिति का आकलन करने के बाद अदालत ने पूर्व मैनेजर को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।

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