सोशल मीडिया पर देशविरोधी सामग्री और मीम्स हटाने की मांग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट से खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया मंचों पर देशविरोधी नारों, भाषणों और मीम्स की पहचान कर उन्हें हटाने और ब्लॉक करने का निर्देश देने की मांग वाली जनहित याचिका पर विचार करने से बुधवार को इनकार कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील की दलीलों से असहमति जताते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

याचिकाकर्ता को अन्य कानूनी विकल्प आजमाने की छूट

यह याचिका अहमदाबाद निवासी हितेंद्र कुमार परसोत्तमभाई गढ़िया की ओर से अधिवक्ता वरुण सिन्हा ने दाखिल की थी। सुनवाई के दौरान पीठ ने इस मामले को सोशल मीडिया सामग्री से जुड़ी पहले से लंबित किसी अन्य याचिका के साथ संलग्न करने से भी मना कर दिया। चीफ जस्टिस ने टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपने वैकल्पिक कानूनी उपायों का सहारा लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

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सीजेपी और भ्रामक संदेशों से कानून-व्यवस्था पर खतरे का दावा

याचिका में कहा गया था कि एक्स कॉर्प, फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप जैसे डिजिटल मंचों पर भारत की संप्रभुता और अखंडता के विरुद्ध देशविरोधी नारों और बयानों का निरंतर प्रसार हो रहा है।

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि तथाकथित ‘सीजेपी’ के बैनर तले उपद्रवी भीड़ और एसएमएस व विभिन्न सोशल मीडिया माध्यमों से फैलाए गए झूठे संदेशों के कारण देश की राष्ट्रीय राजधानी और कई राज्यों की राजधानियों को बंधक जैसी स्थिति में डाल दिया गया था। याचिका के अनुसार, फर्जी खबरों और भड़काऊ बयानों का अनियंत्रित प्रसार सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सद्भाव के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है, जिससे देश में अशांति और गतिरोध की स्थिति बनती है।

केंद्र सरकार और टेक कंपनियों से सामग्री हटाने की थी मांग

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याचिका में सुप्रीम कोर्ट से परमादेश जारी करने की प्रार्थना की गई थी, ताकि एक्स कॉर्प, यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप पर प्रसारित ऐसी सामग्रियों को ब्लॉक या हटाया जा सके, जो आम जनता को भड़काकर सांप्रदायिक सौहार्द, राष्ट्रीय अखंडता और न्यायिक स्वतंत्रता को प्रभावित करती हैं। इसके साथ ही याचिका में यह भी कहा गया था कि ऐसी सामग्री अनभिज्ञ भीड़ के जरिए संवैधानिक पदों पर बैठे पदाधिकारियों की साख को कमजोर करने का काम करती है।

याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के साथ-साथ केंद्रीय गृह मंत्रालय तथा इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी इस मामले में पक्षकार बनाया था।

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