सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की शक्तियों की सीमा पर सवाल उठाया। कोर्ट ने कहा कि BCI पाठ्यक्रम तय कर सकती है, कानून की पढ़ाई की अवधि निर्धारित कर सकती है और कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कदम उठा सकती है, लेकिन क्या वह लॉ कॉलेजों को नियंत्रित या संचालित भी कर सकती है, इस प्रश्न की जांच जरूरी है।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ BCI Trust PEARL-First को ट्रांसफर किए गए फंड से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। यह ट्रस्ट वर्ष 2020 में उस पुराने BCI ट्रस्ट की जगह अस्तित्व में आया था, जो 1974 से काम कर रहा था।
पीठ ने गिरिश मित्तल की याचिका पर नोटिस जारी किया। BCI के स्थायी वकील ने नोटिस स्वीकार किया और कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के कार्यालय को भी याचिका की प्रति देने का निर्देश दिया।
कानूनी शिक्षा में BCI की भूमिका की सीमा पर सवाल
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि BCI कानूनी शिक्षा का पाठ्यक्रम तय कर सकती है और यह भी निर्धारित कर सकती है कि पढ़ाई चार साल की हो या पांच साल की। वह कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए जरूरी कदम भी उठा सकती है।
हालांकि, पीठ ने यह सवाल उठाया कि क्या इन शक्तियों के आधार पर BCI को कानून विश्वविद्यालयों या कॉलेजों के संचालन और नियंत्रण तक अधिकार मिल सकता है।
कोर्ट ने संकेत दिया कि वह सबसे पहले यह तय करेगा कि कानून विश्वविद्यालयों के नियंत्रण और नियमन के मामले में BCI के पास वास्तव में कितनी वैधानिक शक्ति है।
इस संदर्भ में Advocates Act, 1961 की धारा 7(1)(h) की भी व्याख्या की जाएगी। इस प्रावधान के तहत BCI को कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देने और उसके मानक तय करने की जिम्मेदारी दी गई है।
पीठ ने यह भी कहा कि जरूरत पड़ने पर इस मुद्दे को बड़ी बेंच के पास भेजा जा सकता है।
गोवा और आंध्र प्रदेश के दो लॉ कॉलेजों का मामला
याचिका में गोवा और आंध्र प्रदेश में स्थापित दो लॉ कॉलेजों की स्थापना और संचालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
ये संस्थान BCI Trust PEARL-First और संबंधित राज्य सरकारों के बीच हुए समझौतों के बाद स्थापित किए गए थे। याचिका में यह भी सवाल उठाया गया है कि BCI के फंड किस तरह नए ट्रस्ट तक पहुंचाए गए और उनका इस्तेमाल कैसे किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट प्रशांत भूषण ने नए ट्रस्ट को फंड ट्रांसफर किए जाने पर आपत्ति जताई।
उन्होंने कोर्ट को बताया कि मनन कुमार मिश्रा, जो 2012 से BCI का नेतृत्व कर रहे हैं और PEARL-First ट्रस्ट की स्थापना में भी उनकी भूमिका रही है, उन्होंने स्वयं को नए ट्रस्ट का आजीवन ट्रस्टी घोषित किया।
रेगुलेटर और संचालक की भूमिका साथ होने पर आपत्ति
प्रशांत भूषण ने दलील दी कि दोनों कॉलेजों से जुड़े कानूनों के प्रावधानों के चलते BCI को उन संस्थानों के संचालन पर व्यापक नियंत्रण मिल जाता है, जबकि वही संस्था उनकी रेगुलेटर भी है।
उन्होंने कहा कि कॉलेजों की एग्जीक्यूटिव काउंसिल के 35 सदस्यों में से 27 सदस्यों को BCI नामित करती है। संबंधित कानूनों में ट्रस्ट को इन लॉ कॉलेजों के संचालन की भूमिका भी दी गई है।
याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई कि कोई रेगुलेटर उसी संस्था का संचालन नहीं कर सकता, जिसे वह खुद रेगुलेट करता है। इस संबंध में भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के BCCI से जुड़े फैसले सहित अन्य निर्णयों का उल्लेख किया।
BCI की शक्तियों के समर्थन में दलील
एक प्रतिवादी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट आत्माराम नाडकर्णी ने कहा कि BCI के पास कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में वैधानिक शक्तियां मौजूद हैं और संबंधित कानूनों के प्रावधानों से इसे दिखाया जा सकता है।
उन्होंने मेडिकल शिक्षा के नियमन का उदाहरण देते हुए कहा कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया भी मेडिकल शिक्षा को नियंत्रित करती रही है और डॉक्टरों के एनरोलमेंट से जुड़ी भूमिका निभाती रही है।
उन्होंने एक संविधान पीठ के फैसले और यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की ओर से मेडिकल शिक्षा को लेकर अपनाए गए रुख का भी उल्लेख किया।
फंड और कॉलेजों की मंजूरी पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता ने भी BCI Trust PEARL-First को ट्रांसफर किए गए फंड पर सवाल उठाए।
उन्होंने कोर्ट के सामने कहा कि लॉ कॉलेजों को मंजूरी देने से जुड़े मामलों में BCI ट्रस्ट को करोड़ों रुपये का डोनेशन मिल रहा है और इससे संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड पर रखे जाएंगे।
सभी पक्षों को सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी करते हुए कहा कि वह कानूनी शिक्षा के नियमन में BCI की वैधानिक भूमिका और लॉ कॉलेजों के प्रबंधन में उसकी भागीदारी की सीमा की जांच करेगा।

