सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले में करीब 14 साल पहले हुए 17 वर्षीय छात्रा के बलात्कार और हत्या के मामले में एक नई विशेष जांच टीम (एसआईटी) बनाकर सिरे से जांच कराने का आदेश दिया है। अदालत ने पूर्व में हुई जांच के तौर-तरीकों पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि जिस ढंग से पहले पड़ताल की गई, उसने अदालत की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया है।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने पीड़िता की मां की याचिका को स्वीकार करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के 30 अगस्त 2024 के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें दोबारा जांच कराने की मांग खारिज कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने नवगठित एसआईटी को तीन महीने के भीतर अपनी तफ्तीश पूरी कर संबंधित अदालत के समक्ष रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है।
पुराने जांच अधिकारियों के शामिल होने पर पूरी तरह रोक
जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए आदेश दिया कि मामले से पहले जुड़े रहे किसी भी अधिकारी को नई एसआईटी में शामिल नहीं किया जाएगा। पीठ ने स्पष्ट किया कि बेलथांगड़ी पुलिस स्टेशन, सीआईडी या सीबीआई की उन पुरानी टीमों का कोई भी सदस्य इस नई जांच का हिस्सा नहीं बन सकेगा, जो पहले इस मामले से संबद्ध रहे थे।
फैसला लिखते हुए जस्टिस संजीव सचदेवा ने कहा कि एक 17 साल की नाबालिग के नृशंस बलात्कार और हत्या के मामले में जिस तरह से जांच आगे बढ़ी और विभिन्न जांच एजेंसियों ने साक्ष्य जुटाए व उनका मूल्यांकन किया, वह स्तब्ध करने वाला है। अदालत ने रेखांकित किया कि जिस व्यक्ति पर मुकदमा चलाया गया, उसे यह अपराध करने में ही असमर्थ माना गया था। इससे यह स्पष्ट है कि जांच इस तरह की गई जिससे पीड़िता को घोर अन्याय का सामना करना पड़ा।
पीठ ने यह भी जोड़ा कि इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि असली गुनाहगारों ने जांच को प्रभावित किया हो। अदालत के अनुसार, इस तरह की ढीली और लापरवाह जांच उन जांच अधिकारियों को पुरस्कृत करने जैसी है जो अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी और सतर्कता से निभाने में पूरी तरह विफल रहे। अदालत ने कहा कि अगर समाज इतने जघन्य अपराध की सही जांच कराकर वास्तविक दोषियों को कानून के शिकंजे में नहीं लाता, तो वह अपने मूल कर्तव्य में विफल साबित होगा।
निचली अदालत में बरी हुआ था आरोपी, शुरुआती जांच पर उठे थे सवाल
यह मामला 9 अक्टूबर 2012 का है, जब पीड़िता अपनी कक्षाएं समाप्त होने के बाद घर नहीं लौटी। अगले दिन धर्मस्थल के मन्नासंका के पास झाड़ियों से उसका शव बरामद किया गया था। 11 अक्टूबर 2012 को दो स्थानीय युवकों ने संतोष राव नामक व्यक्ति को पकड़ा और पुलिस के हवाले कर दिया। राव ने लगातार खुद को बेकसूर बताते हुए फंसाए जाने का दावा किया था। बाद में भारी जनविरोध के चलते मामले की जांच पहले राज्य सीआईडी और फिर सीबीआई को सौंपी गई, लेकिन दोनों ही एजेंसियों ने राव को ही मुख्य अभियुक्त ठहराया।
पीड़िता का परिवार इस जांच से कभी संतुष्ट नहीं रहा और उसने तीन अन्य लोगों की भूमिका पर लगातार संदेह जताया, जिनमें राव को पकड़ने वाला एक व्यक्ति भी शामिल था। पीड़िता के पिता की याचिका पर सत्र अदालत ने पहले एक नई जांच का निर्देश दिया था, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया था।
16 जून 2023 को ट्रायल कोर्ट ने संतोष राव को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोपों को साबित करने में नाकाम रहा और उसे घटना से जोड़ने वाला कोई सबूत या परिस्थिति मौजूद नहीं थी। ट्रायल कोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाते हुए यह भी कहा था कि अपराध के तुरंत बाद के सबसे अहम समय (‘गोल्डन ऑवर’) में जांच सही ढंग से नहीं की गई थी।
हाईकोर्ट के विरोधाभास पर शीर्ष अदालत का फैसला
कर्नाटक हाईकोर्ट ने आरोपी को बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ दायर अपील और परिवार की नई जांच वाली अर्जी को खारिज कर दिया था। हालांकि, याचिका खारिज करते हुए भी हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि यदि संतोष राव ने यह अपराध नहीं किया, तो निश्चित तौर पर कोई और इसके लिए जिम्मेदार है, और यह स्थिति अपने आप में नए सिरे से जांच की मांग करती है। हाईकोर्ट के इसी आदेश को पीड़िता की मां ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप करते हुए नई एसआईटी जांच का निर्देश जारी किया।

