छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) भर्ती घोटाले के आरोपी और आयोग के पूर्व सचिव जीवन किशोर ध्रुव की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) से जवाब तलब किया है। सोमवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने जांच एजेंसी को नोटिस जारी कर तीन हफ्ते में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत ने याचिकाकर्ता को सीबीआई के जवाब पर एक सप्ताह के भीतर अपना जवाबी हलफनामा (रिजॉइंडर) दाखिल करने की अनुमति दी है। अदालत अब इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद करेगी। ध्रुव ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 5 अगस्त के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिसके तहत उनकी नियमित जमानत अर्जी खारिज कर दी गई थी।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: पेपर लीक हत्या से भी अधिक जघन्य
इससे पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने ध्रुव को राहत देने से साफ इनकार करते हुए बेहद तल्ख टिप्पणी की थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि प्रतियोगी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक कराने वाले तत्व लाखों युवाओं के भविष्य और करियर के साथ खिलवाड़ करते हैं, और ऐसा कृत्य हत्या से भी अधिक जघन्य है।
अदालत ने रेखांकित किया था कि सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया की शुचिता को पहुंचे नुकसान, मामले की गंभीरता और आरोपी की तय भूमिका को देखते हुए उसे जमानत का विवेकाधिकार नहीं दिया जा सकता। सीबीआई ने धांधली के इस मामले में ध्रुव को पिछले वर्ष सितंबर में गिरफ्तार किया था।
गोपनीयता भंग कर बेटे को डिप्टी कलेक्टर बनाने का आरोप
अभियोजन के मुताबिक, यह पूरा मामला 2020 से 2022 के दौरान आयोजित राज्य सेवा परीक्षाओं में हुई अनियमितताओं से जुड़ा है। उस अवधि में ध्रुव आयोग के सचिव पद पर आसीन थे और नियमों के तहत परीक्षा सामग्री की पूर्ण गोपनीयता बनाए रखना उनका पदीय दायित्व था।
जांच एजेंसी का आरोप है कि ध्रुव ने अन्य सह-आरोपियों के साथ मिलकर इस गोपनीयता को भंग किया और प्रश्नपत्र अपने बेटों तक पहुंचाए। इसी के बलबूते उनके एक बेटे का चयन डिप्टी कलेक्टर पद पर हुआ। बेटा भी इस मामले में नामजद आरोपी है। इस घोटाले में आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष तमन सिंह सोनवानी समेत कई अन्य लोग भी आरोपी बनाए गए हैं।
बचाव पक्ष की दलील: केवल पद की वजह से बनाया गया निशाना
दूसरी ओर, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान ध्रुव के वकील ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि उनके मुवक्किल को केवल सचिव पद पर रहने के कारण दुर्भावनापूर्ण तरीके से फंसाया गया है।
बचाव पक्ष का तर्क था कि ध्रुव का प्रश्नपत्र लीक करने में कोई हाथ नहीं था और जांच रिकॉर्ड पर ऐसा कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं है जो कथित अपराध में उनकी संलिप्तता को साबित करता हो।

