सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी आपराधिक मामले की जांच पुलिस के अधिकार क्षेत्र का विषय है और अदालत केवल अभियोजन की किसी एक अलग-थलग पंक्ति के आधार पर यह घोषित नहीं कर सकती कि जांच पूरी हो चुकी है। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने UAPA मामले में आरोपी को डिफॉल्ट बेल देने वाला बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जांच एजेंसी को चार्जशीट दाखिल करने के लिए दी गई अतिरिक्त 15 दिनों की अवधि को वैध ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन की इस बात को कि आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है, इस अर्थ में नहीं पढ़ा जा सकता कि पूरी जांच समाप्त हो चुकी थी। अदालत को किसी आवेदन या आदेश की एक पंक्ति को अलग करके नहीं, बल्कि पूरे दस्तावेज और मामले की परिस्थितियों के संदर्भ में पढ़ना चाहिए।
क्या था मामला
महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वॉड ने 21 सितंबर 2022 को मुंबई में कई आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। आरोप भारतीय दंड संहिता की धारा 120B, 121A और 153A तथा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी UAPA की धारा 13(1)(b) के तहत लगाए गए थे।
मोमिन मोइनुद्दीन गुलाम हसन उर्फ मोइन मिस्त्री और एक अन्य आरोपी को 22 सितंबर 2022 को गिरफ्तार किया गया। शुरुआती पुलिस हिरासत के बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
चार्जशीट दाखिल करने की 90 दिनों की अवधि समाप्त होने से पहले विशेष अदालत ने अभियोजन को 20 दिसंबर 2022 से 30 दिनों का अतिरिक्त समय दिया। इसके बाद 12 जनवरी 2023 को अभियोजन ने दूसरी बार 15 दिनों का और समय मांगा, जिसे विशेष जज ने 18 जनवरी 2023 को स्वीकार कर लिया।
आरोपियों ने डिफॉल्ट बेल की मांग की, लेकिन 20 जनवरी 2023 को उनकी अर्जी खारिज कर दी गई। बाद में 2 फरवरी 2023 को चार्जशीट दाखिल की गई।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 15 जुलाई 2024 को दूसरी समय-वृद्धि को अवैध मानते हुए कहा था कि जांच पूरी हो चुकी थी और केवल अभियोजन की मंजूरी मिलने का इंतजार होने के आधार पर चार्जशीट दाखिल करने की समयसीमा नहीं बढ़ाई जा सकती। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर आरोपियों को डिफॉल्ट बेल का हकदार माना था।
डिफॉल्ट बेल का अधिकार और UAPA में समय-वृद्धि
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डिफॉल्ट बेल का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा महत्वपूर्ण अधिकार है। यदि जांच एजेंसी कानून में निर्धारित या वैध रूप से बढ़ाई गई अवधि के भीतर जांच पूरी नहीं करती और आरोपी जमानत देने के लिए तैयार है, तो उसे डिफॉल्ट बेल का अधिकार मिलता है।
हालांकि, UAPA की धारा 43D के तहत विशेष परिस्थितियों में जांच पूरी करने की अवधि 90 दिनों से बढ़ाकर अधिकतम 180 दिन तक की जा सकती है, बशर्ते पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की रिपोर्ट में जांच की प्रगति और आरोपी को आगे हिरासत में रखने के विशेष कारण बताए गए हों।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी वैधानिक व्यवस्था को यांत्रिक तरीके से न तो स्वीकार किया जा सकता है और न ही खारिज। अदालत को आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जांच एजेंसी के जांच जारी रखने के अधिकार के बीच संतुलन बनाना होता है।
हाईकोर्ट ने एक वाक्य से निकाला गलत निष्कर्ष
इस मामले में विवाद मुख्य रूप से अभियोजन की दूसरी समय-वृद्धि अर्जी में लिखी एक पंक्ति को लेकर था, जिसमें कहा गया था कि आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सबूत उपलब्ध हैं।
हाईकोर्ट ने इसी बयान से निष्कर्ष निकाला कि जांच पूरी हो चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत बताते हुए कहा:
“किसी आदेश या फैसले के एक वाक्य को उसके संदर्भ से अलग करके इस तरह नहीं पढ़ा जा सकता कि उससे निर्णय के पीछे का तर्क ही समाप्त हो जाए। किसी दस्तावेज को टुकड़ों में नहीं, बल्कि समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिए।”
पीठ ने कहा कि अभियोजन ने कहीं यह नहीं कहा था कि जांच पूरी हो चुकी है और चार्जशीट केवल सरकारी मंजूरी के इंतजार में रोकी गई है।
कोर्ट ने कहा कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री होने और जांच पूरी हो जाने में अंतर है।
“अभियोजन का यह कहना कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है, इस रूप में नहीं पढ़ा जा सकता कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस तरह के एक अकेले बयान को आधार बनाकर ATS की जांच पूरी करने या आगे की जांच करने की वैधानिक शक्ति को सीमित नहीं किया जा सकता।
जांच कब खत्म हो, यह अदालत तय नहीं कर सकती
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराते हुए कहा कि अपराध की जांच पुलिस का क्षेत्र है।
पीठ ने कहा:
“किसी अपराध की जांच पुलिस का विशिष्ट क्षेत्र है। किसी मामले में जांच कब रोक दी जानी चाहिए, यह तय करना अदालत का अधिकार क्षेत्र नहीं है।”
कोर्ट ने कहा कि जांच की दिशा और उसका तरीका तय करना सामान्यतः जांच एजेंसी पर छोड़ा जाना चाहिए। अदालत पुलिस को मिली वैधानिक जांच शक्तियों को केवल अपवादात्मक परिस्थितियों में या जहां कानून खुद जांच पर रोक लगाता हो, वहीं सीमित कर सकती है।
इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने द किंग एम्परर बनाम ख्वाजा नजीर अहमद और बिहार राज्य बनाम जे.ए.सी. सल्दान्हा के फैसलों का उल्लेख किया।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस का दायित्व अपराध की जांच करना और कथित अपराधी को कानून के सामने लाना है। जांच अधिकारी की जांच संबंधी जिम्मेदारी रिपोर्ट अदालत के सामने दाखिल होने तक जारी रहती है, हालांकि कानून के अनुसार आगे की जांच भी की जा सकती है।
फॉरेंसिक डेटा और बैंक खातों की जांच बाकी थी
सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन की दूसरी समय-वृद्धि अर्जी में केवल मंजूरी का मुद्दा नहीं था।
जांच एजेंसी ने बताया था कि गवाहों के वॉयस सैंपल फॉरेंसिक लैब भेजे गए थे, आरोपियों के बैंक खातों की जांच चल रही थी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों सहित विभिन्न सूचनाओं का विश्लेषण और आपस में मिलान किया जाना बाकी था।
कोर्ट ने कहा कि फॉरेंसिक लैब से प्राप्त डेटा का विश्लेषण खुद जांच का हिस्सा है।
पीठ ने कहा:
“फॉरेंसिक लैब से प्राप्त डेटा का विश्लेषण जांच का हिस्सा है और इसे चार्जशीट दाखिल करने के बाद नहीं किया जा सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि जांच एजेंसी को चार्जशीट में यह बताना होता है कि आरोपियों के बैंक खातों में धन का प्रवाह कथित गतिविधियों से किस प्रकार जुड़ता है।
कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों में यह मान लेना वास्तविकता से परे होगा कि ATS की जांच हर पहलू से पूरी हो चुकी थी।
पूरी चार्जशीट दाखिल करना केवल औपचारिकता नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पूर्ण चार्जशीट दाखिल करना महज एक तकनीकी या औपचारिक प्रक्रिया नहीं है।
UAPA के तहत अभियोजन की मंजूरी देने वाला सक्षम प्राधिकारी जांच में एकत्र सामग्री पर स्वतंत्र रूप से विचार करता है। यदि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त न हो तो वह मंजूरी देने से इनकार भी कर सकता है।
पीठ ने कहा कि अभियोजन को मंजूरी देने वाले प्राधिकारी के सामने जरूरी और पर्याप्त सामग्री रखनी होती है। इसलिए वैज्ञानिक डेटा के विश्लेषण और पूरी रिपोर्ट तैयार करने के लिए समय मांगने की अभियोजन की दलील को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।
अभियोजन की मंजूरी पर हाईकोर्ट की चर्चा मूल मुद्दे से भटकी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने दूसरी समय-वृद्धि की वैधता तय करते समय ऐसे मुद्दे पर अधिक जोर दिया जो वास्तविक विवाद के केंद्र में नहीं था।
पीठ ने कहा:
“अभियोजन की मंजूरी पर पूरी चर्चा मूल मुद्दे से भटकी हुई थी। हाईकोर्ट चार्जशीट दाखिल करने के लिए अतिरिक्त समय मांगने के अभियोजन के मुख्य आधार से हट गया।”
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने इस धारणा पर आगे बढ़कर विचार किया कि जांच पूरी हो चुकी थी और चार्जशीट केवल मंजूरी के इंतजार में थी, जबकि रिकॉर्ड ऐसा निष्कर्ष नहीं दर्शाता था।
इसलिए विशेष जज द्वारा 18 जनवरी 2023 को अभियोजन को दी गई 15 दिनों की दूसरी समय-वृद्धि में हस्तक्षेप करना गलत था।
सुप्रीम कोर्ट ने डिफॉल्ट बेल का आदेश रद्द किया
सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार और ATS की अपील स्वीकार करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का 15 जुलाई 2024 का फैसला रद्द कर दिया।
कोर्ट ने विशेष जज के 18 जनवरी 2023 के आदेश को वैध ठहराया, जिसके जरिए जांच एजेंसी को चार्जशीट दाखिल करने के लिए 15 दिनों का अतिरिक्त समय दिया गया था।
इसके परिणामस्वरूप 20 जनवरी 2023 को आरोपियों की ओर से दाखिल डिफॉल्ट बेल अर्जी भी खारिज मानी गई।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी नंबर एक को 30 दिनों के भीतर सरेंडर करने का निर्देश दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि वह कानून के अनुसार नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।
केस का शीर्षक: महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य बनाम मोमिन मोइनुद्दीन गुलाम हसन उर्फ मोइन मिस्त्री एवं अन्य
केस नंबर: विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 12932/2024 से उत्पन्न आपराधिक अपील
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
तारीख: 21 सितंबर 2026

