रिश्वत की मांग के पुख्ता सबूत बिना सिर्फ नकदी की बरामदगी सजा का आधार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग के कर्मी को किया बरी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने करीब एक दशक पुराने रिश्वतखोरी के मामले में शिक्षा विभाग के एक लेखापाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण कानून के तहत रिश्वत मांगे जाने के ठोस सबूत के अभाव में सिर्फ रंग लगे नोटों की बरामदगी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने 18 सितंबर को यह आदेश पारित करते हुए विशेष अदालत के वर्ष 2017 के फैसले को निरस्त कर दिया। निचली अदालत ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत सूरजपुर जिले के जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय में पदस्थ 41 वर्षीय लेखापाल मुरली प्रसाद चौधरी को दोषी ठहराकर जेल की सजा सुनाई थी। चौधरी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

अदालत ने कहा कि अवैध लाभ की मांग ही इस अपराध का मूल आधार है। जब तक अभियोजन पक्ष रिश्वत मांगे जाने की बात को संदेह से परे साबित नहीं कर देता, तब तक अभियुक्त के पास से केवल नकदी बरामद होने से अपराध सिद्ध नहीं माना जा सकता।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने नर्सरी और प्राथमिक विद्यालयों के लिए स्थानीय भवन उपनियमों के अनुपालन का प्रावधान किया

शिकायतकर्ता और प्रमुख गवाह अदालत में मुकरे

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाह रिश्वत मांगने के आरोप को सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रहे। मामले का मुख्य गवाह और शिकायतकर्ता मोहित राम राजवाड़े अदालत में अपने पूर्व बयानों से मुकर गया। मां सरस्वती शिक्षा समिति के अध्यक्ष व प्रबंधक राजवाड़े ने गवाही में कहा कि चौधरी ने उनसे कभी किसी तरह की घूस नहीं मांगी थी।

राजवाड़े ने अदालत को बताया कि डॉ. प्रताप नामक व्यक्ति ने उन्हें जानकारी दी थी कि स्कूल की मान्यता हासिल करने के लिए बैंक में सावधि जमा (एफडी) खाता खुलवाना आवश्यक है। इस उद्देश्य से उन्होंने सीधे डॉ. प्रताप को 9,000 रुपये सौंपे थे। इसके अलावा, शिकायतकर्ता ने यह भी खुलासा किया कि पुलिस और सतर्कता अधिकारियों ने एक विश्राम गृह में दस्तावेजों और पंचनामों पर उनके हस्ताक्षर करवाए थे, जबकि उन प्रपत्रों की सामग्री उन्हें पढ़कर नहीं सुनाई गई थी। इस मामले में अभियोजन के एक अन्य गवाह कुंवर साय भी अदालत में अपने बयान से पलट गए।

हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की ओर से रखी गईं दलीलें

READ ALSO  प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए बीएड डिग्री धारकों को अयोग्य घोषित करने वाला निर्णय 11 अगस्त 2023 के बाद से लागू होगा: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया

अपीलार्थी मुरली प्रसाद चौधरी की ओर से पेश अधिवक्ता आशुतोष त्रिवेदी ने दलील दी कि कानून के तहत अपराध साबित करने के लिए रिश्वत की मांग और उसकी स्वीकृति दोनों को प्रमाणित करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता और मुख्य गवाह के मुकर जाने के बाद रिश्वत मांगने का बुनियादी आरोप स्वतः समाप्त हो जाता है।

इसके विपरीत, राज्य सरकार की तरफ से उप महाधिवक्ता डी. आर. मिंज ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि ट्रैप कार्रवाई के दौरान चौधरी की पैंट की बाईं जेब से रंग लगे नोट सीधे बरामद किए गए थे। उन्होंने तर्क दिया कि इस जब्ती की पुष्टि स्वतंत्र गवाहों के साथ-साथ पुलिस गवाहों ने भी की है, इसलिए निचली अदालत द्वारा दी गई सजा उचित है। हालांकि, हाईकोर्ट ने राज्य की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जब तक रिश्वत की मांग ही साबित न हो, तब तक सिर्फ बरामदगी का कोई कानूनी आधार नहीं रह जाता।

वर्ष 2014 में दर्ज हुई थी शिकायत, एसीबी ने बिछाया था जाल

यह मामला जून 2014 का है, जब राजवाड़े अपनी संस्था द्वारा संचालित एक स्कूल की मान्यता के सिलसिले में सूरजपुर स्थित डीईओ कार्यालय पहुंचे थे। अभियोजन के मूल आरोप के अनुसार, 20 जून 2014 को चौधरी ने 15,000 रुपये की मांग की थी और तुरंत 5,000 रुपये देने को कहा था, जिसमें से 4,900 रुपये कथित तौर पर दिए गए थे।

READ ALSO  हरिद्वार धर्म संसद: सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी द्वारा जांच की मांग वाली जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया

इसके बाद राजवाड़े ने 21 जून 2014 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी), बिलासपुर में लिखित शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के सत्यापन के दौरान राजवाड़े को बातचीत रिकॉर्ड करने के निर्देश दिए गए। अभियोजन का दावा था कि रिकॉर्डिंग के दौरान घूस की रकम घटाकर 8,000 रुपये तय की गई थी।

शिकायत और रिकॉर्डिंग के आधार पर एसीबी ने 30 जून 2014 को जाल बिछाया। एजेंसी के अनुसार, चौधरी ने 8,000 रुपये लेकर गिने और नोट अपनी पैंट की बाईं जेब में रख लिए, जिसके तुरंत बाद उन्हें पकड़ लिया गया। एसीबी की चार्जशीट के आधार पर विशेष अदालत ने 2017 में चौधरी को दोषी ठहराया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने पूरी तरह रद्द कर दिया है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles