सहमति साबित हुए बिना और पक्षपात के आक्षेप के बावजूद आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल की नियुक्ति कानूनन अमान्य: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि दूसरी पार्टी की सहमति साबित किए बिना और पक्षपात का आक्षेप लगाए जाने के बावजूद आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का गठन किया जाना पूरी आर्बिट्रेशन प्रक्रिया की शुरुआत को कानून की नज़र में अमान्य (Non Est) बना देता है। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने कर्जदार की अपील को केवल मियाद (लिमिटेशन) के तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल द्वारा पारित तीनों दंडात्मक अंतरिम आदेशों को निरस्त करते हुए संपत्तियों को तुरंत बहाल करने और खातों से ली गई रकम वापस लौटाने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलार्थी आर्थ माइक्रो फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड और अन्य तथा प्रत्यर्थी शिवालिक स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड के बीच एक समझौते को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ था, जिसमें मध्यस्थता (आर्बिट्रेशन) का क्लॉज शामिल था। प्रत्यर्थी बैंक ने कथित तौर पर सहमति के आधार पर एक आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल नियुक्त किया और इस संबंध में 2 मई 2024 को एक नोटिस जारी किया।

आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल से पहला नोटिस मिलने पर अपीलार्थियों ने तुरंत जवाब देकर इस नियुक्ति पर आपत्ति दर्ज कराई। अपीलार्थियों ने विशेष रूप से यह इंगित किया कि नियुक्त ट्रिब्यूनल के प्रत्यर्थी बैंक के साथ करीबी संबंध हैं।

इस गंभीर आपत्ति के बावजूद आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने कार्यवाही आगे बढ़ाई और आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 17 के तहत तीन अंतरिम आदेश पारित कर दिए। अपीलार्थियों ने इन अंतरिम आदेशों को उक्त कानून की धारा 37 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस आधार पर अपील खारिज कर दी कि याचिका देरी से दायर की गई थी और लिमिटेशन एक्ट, 1963 की धारा 5 के तहत देरी माफी के लिए कोई अर्जी दाखिल नहीं की गई थी।

अदालत के समक्ष दलीलें

सुप्रीम कोर्ट में अपीलार्थियों की ओर से सीनियर एडवोकेट के. परमेश्वर और बैंक की ओर से सीनियर एडवोकेट बिस्वजीत भट्टाचार्य पेश हुए।

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प्रत्यर्थी बैंक की दलील थी कि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का गठन आपसी सहमति से किया गया था। लेकिन रिकॉर्ड की पड़ताल करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अपीलार्थियों की ओर से ऐसी कोई सहमति लिए जाने का कोई प्रमाण मौजूद नहीं है।

अदालत ने धारा 17 के तहत आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा जारी किए गए तीनों अंतरिम आदेशों की प्रकृति पर भी गौर किया, जिनके तहत:

  • अपीलार्थियों के पैन से जुड़े आईडीबीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंक खातों को फ्रीज करने का आदेश दिया गया था;
  • प्रत्यर्थी बैंक को अपीलार्थियों की चल और अचल संपत्तियों का कब्जा अपने हाथ में लेने की अनुमति दे दी गई थी; और
  • विभिन्न बैंकों में अपीलार्थियों द्वारा जमा कराई गई रकम को सीधे प्रत्यर्थी बैंक के खाते में ट्रांसफर करने का निर्देश दिया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और अहम टिप्पणियां

पीठ ने टिप्पणी की कि आर्बिट्रेशन को किसी भी सूरत में एकतरफा या मनमानी कार्रवाई में नहीं बदला जा सकता। पीठ ने कहा:

“आर्बिट्रेशन (मध्यस्थता), भले ही इससे मिलता-जुलता शब्द हो, लेकिन यह मनमाना (आर्बिट्रेरी) कदम नहीं हो सकता, यहाँ तक कि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल की नियुक्ति में भी नहीं।”

अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि ट्रिब्यूनल की निष्पक्षता पर स्पष्ट चुनौती के बावजूद ऐसे कठोर अंतरिम निर्देश जारी किए गए। पीठ ने टिप्पणी की:

“हमें यह याद रखना होगा कि यह सब आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल की नियुक्ति पर स्पष्ट आपत्ति और उक्त आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल पर पक्षपात का आरोप लगाए जाने के बावजूद किया गया। पहली नज़र में पारित किए गए ये आदेश भी मनमाने स्वरूप के हैं।”

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि जब ट्रिब्यूनल के गठन में ही कानूनी वैधता और वैध सहमति का अभाव था, तो मध्यस्थता कार्यवाही की शुरुआत ही कानून की नज़र में अमान्य थी।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला और दिशा-निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश और आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल द्वारा पारित तीनों अंतरिम आदेशों को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही पीठ ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. रकम की वापसी: यदि अंतरिम आदेशों के तहत अपीलार्थियों के बैंक खातों से कोई भी राशि प्रत्यर्थी बैंक के खाते में ट्रांसफर की गई है, तो बैंक को वह पूरी रकम आज से एक सप्ताह के भीतर वापस लौटानी होगी।
  2. चूक होने पर चक्रवृद्धि ब्याज: यदि बैंक एक सप्ताह के भीतर यह रकम वापस नहीं लौटाता है, तो कटौती की तारीख से 18 प्रतिशत वार्षिक दर पर मासिक चक्रवृद्धि ब्याज देना होगा। इस ब्याज का समायोजन आर्बिट्रेशन में प्रत्यर्थी के पक्ष में तय होने वाले किसी भी दावे से किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी तय किया कि इस राशि पर देय ब्याज नए आर्बिट्रेटर द्वारा तय किए जाने वाले मुद्दों में से एक होगा।
  3. संपत्तियों की बहाली: अपीलार्थियों की चल या अचल संपत्तियों की कुर्की या उनके कब्जे को पूरी तरह निष्प्रभावी कर दिया गया और संपत्तियों का कब्जा अपीलार्थियों को तुरंत लौटाने का आदेश दिया गया।
  4. स्वतंत्र आर्बिट्रेटर की नियुक्ति: विवाद के कानूनी समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एडवोकेट मयूरी रघुवंशी को नया आर्बिट्रेटर नियुक्त किया। रजिस्ट्री को उन्हें सूचित करने का निर्देश दिया गया है। नई आर्बिट्रेटर दोनों पक्षों को नोटिस जारी करेंगी और वे पक्षों के परामर्श से अपनी फीस तय करने के लिए स्वतंत्र होंगी।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने विवाद के मूल गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और दोनों पक्ष अपनी दलीलें नए आर्बिट्रेटर के समक्ष रखने के लिए स्वतंत्र हैं। मामले में लंबित सभी अर्जियों को भी खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: आर्थ माइक्रो फाइनेंस प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम शिवालिक स्मॉल फाइनेंस बैंक लिमिटेड
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 13015/2026
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 17 सितंबर, 2026

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