सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ के समक्ष एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम की धारा 29 और 30 के तहत आरोपी के खिलाफ दोष की वैधानिक उपधारणा (प्रिजम्प्शन) निरपेक्ष नहीं, बल्कि खंडनीय है। अदालत ने कहा कि यह उपधारणा अभियोजन पक्ष को अपराध के बुनियादी तथ्यों को संदेह से परे साबित करने के उसके प्राथमिक कर्तव्य से मुक्त नहीं करती है। गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास, मेडिकल और फॉरेंसिक रिपोर्ट में यौन उत्पीड़न की पुष्टि न होने तथा पानी के विवाद में झूठी शिकायत दर्ज कराने की संभावना को देखते हुए शीर्ष अदालत ने पोक्सो कानून की धारा 6 और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 363 के तहत 10 साल के कठोर कारावास की सजा काट रहे अपीलकर्ता को बरी कर तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
अभियोजन की कहानी 11 दिसंबर 2015 को कालकाजी थाने में पीड़िता की मां (पीडब्ल्यू-5) द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुई थी। शिकायत के अनुसार, 9 दिसंबर 2015 की शाम करीब 5:30 बजे उनकी ढाई साल की बेटी अपनी झुग्गी के बाहर खेलते हुए पास की झुग्गी में रहने वाले अपीलकर्ता के पास चली गई। जब बच्ची काफी देर तक नहीं लौटी, तो मां ने तलाश शुरू की। उनके देवर (पीडब्ल्यू-6ए) ने बताया कि अपीलकर्ता बच्ची को हंसराज सिटी पार्क ले गया है। मां का कहना था कि वह पार्क पहुंचीं और बच्ची को घर ले आईं। घर आकर बच्ची सो गई और करीब 7:00 बजे जब वह उठी, तो रोने लगी और अपनी पायजामी खींचने लगी। मां ने आरोप लगाया कि पायजामी पर खून लगा था और ढाई साल की बच्ची ने इशारे से बताया कि अपीलकर्ता ने उसके साथ गलत काम किया है।
शिकायतकर्ता के अनुसार, बच्ची को उसी रात एक निजी डॉक्टर (पीडब्ल्यू-1) के पास ले जाया गया, जिन्होंने उन्हें पुलिस के पास जाने की सलाह दी। इसके बाद विशेष पोक्सो अदालत (साकेत कोर्ट) ने 21 अगस्त 2023 को अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 363 और पोक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई। दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 जुलाई 2025 को अपीलकर्ता की अपील खारिज करते हुए दोषसिद्धि को बरकरार रखा और माना कि पोक्सो की धारा 29 के तहत निर्दोषिता साबित करने का पूरा भार आरोपी पर है। इसके खिलाफ अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी कि अभियोजन का मामला प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों और मेडिकल साक्ष्यों के बीच भारी अंतर्विरोधों से घिरा हुआ है। फॉरेंसिक जांच में जब्त कपड़ों और नमूनों पर किसी भी तरह के खून, वीर्य या पुरुष डीएनए की मौजूदगी नहीं पाई गई, जिससे पेनेट्रेटिव हमले का आरोप पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है। इसके अलावा, जिरह में यह साबित हुआ कि शिकायतकर्ता और आरोपी के परिवार एक ही सार्वजनिक नल से पानी भरते थे और पानी को लेकर दोनों के बीच पुराना विवाद था, जो झूठे आरोप लगाने की स्पष्ट वजह बना।
दूसरी ओर, राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के फैसलों का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि एक मासूम बच्ची के साथ हुआ अपराध बेहद गंभीर प्रकृति का है और गवाहों के बयानों में मामूली अंतर से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता। राज्य का कहना था कि पोक्सो अधिनियम की धारा 29 के तहत कानूनी उपधारणा पूरी तरह से लागू होती है, जिसे आरोपी साबित करने में नाकाम रहा।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि मां (पीडब्ल्यू-5) और निजी डॉक्टर (पीडब्ल्यू-1) की गवाही में स्पष्ट और गंभीर विरोधाभास हैं। निजी डॉक्टर ने अदालत में दावा किया कि मां बच्ची को लेकर शाम 4 से 5 बजे के बीच उनके क्लीनिक पर अकेली आई थी, जबकि मां का कहना था कि वह रात 9:30 बजे अपने पति के साथ क्लीनिक गई थी। इसके अतिरिक्त, डॉक्टर ने स्वीकार किया कि उन्होंने न तो कोई मेडिकल पर्चा बनाया और न ही बच्ची को कोई प्राथमिक उपचार दिया। डॉक्टर का यह दावा भी झूठा साबित हुआ कि उन्होंने कालकाजी थाने में फोन कर सूचना दी थी, क्योंकि किसी भी पुलिस गवाह ने ऐसी कोई कॉल आने की पुष्टि नहीं की। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मां ने अदालत में गवाही देते समय कई नई बातें जोड़ीं, जो मूल प्राथमिकी में दर्ज नहीं थीं।
पीठ ने पाया कि मौखिक बयानों की पुष्टि वैज्ञानिक और चिकित्सीय साक्ष्यों से बिल्कुल नहीं होती। एम्स में बच्ची की शारीरिक जांच करने वाले डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार, बच्ची के निजी अंगों पर चोट या खरोंच का कोई निशान नहीं था, न ही कोई खून पाया गया और हाइमन पूरी तरह सुरक्षित था। इसके अलावा, रोहिणी स्थित एफएसएल के विशेषज्ञ (पीडब्ल्यू-8) ने स्पष्ट किया कि भेजे गए सात पैकेटों के परीक्षण में किसी भी प्रदर्श पर वीर्य या पुरुष डीएनए नहीं मिला और बच्ची की पायजामी पर भी खून नहीं पाया गया।
अभियोजन पक्ष ने स्टेट ऑफ यूपी बनाम बाबुल नाथ के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि चोट या वीर्य का न मिलना अपने आप में दुष्कर्म के आरोप को खारिज नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि वर्तमान मामले में डॉक्टरों की राय और एफएसएल रिपोर्ट मिलकर किसी भी प्रकार के पेनेट्रेटिव हमले की संभावना को पूरी तरह नकारते हैं।
यह परखते हुए कि क्या मां को एक विश्वसनीय और उच्च कोटि का गवाह माना जा सकता है, सुप्रीम कोर्ट ने राय संदीप उर्फ दीपू बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) और गणेशन बनाम राज्य में प्रतिपादित सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा:
“…..एक ‘स्टर्लिंग विटनेस’ (सर्वोच्च कोटि का गवाह) अत्यंत उच्च स्तर और क्षमता का होना चाहिए जिसका बयान पूरी तरह अकाट्य हो। अदालत को ऐसे गवाह के बयान को बिना किसी हिचकिचाहट के स्वीकार करने की स्थिति में होना चाहिए। ऐसे गवाह की गुणवत्ता परखने के लिए गवाह की स्थिति अप्रासंगिक है और प्रासंगिक यह है कि उसके द्वारा दिया गया बयान कितना सच्चा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि बयान शुरू से लेकर अंत तक एक जैसा रहे, अर्थात जब गवाह पहली बार बयान देता है और अंततः जब वह अदालत के समक्ष गवाही देता है। यह स्वाभाविक होना चाहिए और आरोपी के खिलाफ अभियोजन के मामले के अनुरूप होना चाहिए।”
पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि मां के बयानों में मौजूद भारी कमियों, विरोधाभासों और वैज्ञानिक रिपोर्ट से पूर्ण भिन्नता के कारण उन्हें इस श्रेणी का गवाह नहीं माना जा सकता। इसके अलावा, जिरह के दौरान मां ने खुद स्वीकार किया कि चार घरों के लिए एक ही साझा नल था और पानी भरने को लेकर विवाद हुआ करते थे, जिससे रंजिश के चलते झूठी शिकायत दर्ज कराने की पुख्ता संभावना सामने आई।
पोक्सो अधिनियम की धारा 29 और 30 की व्याख्या
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने धारा 29 (अपराध कारित करने की उपधारणा) और धारा 30 (आपराधिक मानसिक स्थिति की उपधारणा) के प्रभाव में आकर साक्ष्यों का गलत मूल्यांकन किया। बॉम्बे हाईकोर्ट के नवीन धनीराम बारइये बनाम महाराष्ट्र राज्य फैसले का हवाला देते हुए शीर्ष अदालत ने दोहराया:
“यह नहीं माना जा सकता कि पोक्सो अधिनियम की धारा 29 के तहत उपधारणा निरपेक्ष है। यह केवल तभी प्रभावी होगी जब अभियोजन पक्ष पहले उन तथ्यों को स्थापित करने में सफल रहे जो पोक्सो अधिनियम की धारा 29 के तहत उपधारणा लागू करने का आधार बनते हैं।”
अदालत ने रेखांकित किया कि पोक्सो की धारा 29 और 30 केवल साक्ष्य के भार को स्थानांतरित करने वाले नियम हैं। नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस (एनडीपीएस) कानून से संबंधित फैसलों जैसे नूर आगा बनाम पंजाब राज्य, नरेश कुमार उर्फ नीतू बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य और गंगाधर उर्फ गंगाराम बनाम मध्य प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:
“अभियोजन पक्ष पर एक प्राथमिक भार होता है और जब वह संतुष्ट हो जाता है, तभी कानूनी भार स्थानांतरित होता है। तब भी, आरोपी द्वारा अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अपेक्षित साक्ष्य का स्तर उतना ऊंचा नहीं होता जितना कि अभियोजन पक्ष का होता है। जहां अभियोजन पक्ष को आरोपी के अपराध को ‘संदेह से परे’ साबित करना होता है, वहीं आरोपी के लिए यह केवल ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (प्रेपोंडरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटी) पर आधारित होता है।”
वी.डी. झिंगन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा कि यदि आरोपी अपने बचाव में एक संभावित और तार्किक स्थिति पेश कर देता है, तो उपधारणा खंडित हो जाती है। इसके साथ ही त्रिलोक चंद जैन बनाम दिल्ली राज्य का उल्लेख करते हुए अदालत ने माना:
“यदि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत की गई कहानी मूल रूप से उस तथ्य के विपरीत या असंगत है जिसकी उपधारणा की जानी है, तो यह उपधारणा शुरुआत से ही निष्प्रभावी हो जाएगी।”
संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार और काली राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य के ऐतिहासिक फैसले को दोहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“आरोपी के अपराध का निर्धारण इस बात से नहीं किया जाना चाहिए कि बड़ी संख्या में लोग उसे दोषी मानते हैं, बल्कि इस बात से किया जाना चाहिए कि क्या उसका दोष रिकॉर्ड पर लाए गए साक्ष्यों द्वारा साबित हुआ है……”
पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि साक्ष्यों के आधार पर दो दृष्टिकोण संभव हों—एक आरोपी के दोष की ओर इशारा करता हो और दूसरा उसकी निर्दोषिता की ओर—तो आरोपी के पक्ष में जाने वाले दृष्टिकोण को ही अपनाया जाना चाहिए।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष के गवाहों में मौजूद गहरे विरोधाभासों, पानी के विवाद से जुड़ी पुरानी रंजिश के पुख्ता बचाव और यौन उत्पीड़न को पूरी तरह नकारने वाली मेडिकल व फॉरेंसिक रिपोर्ट के जरिए अपीलकर्ता ने वैधानिक उपधारणा का सफलतापूर्वक खंडन कर दिया है। परिणामस्वरूप, अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अपराध को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।
पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के 3 जुलाई 2025 के आदेश और ट्रायल कोर्ट की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को आईपीसी की धारा 363 और पोक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत सभी आरोपों से बरी करते हुए जेल से तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: दीपक इन जेसी बनाम राज्य एनसीटी दिल्ली सरकार
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील वर्ष 2026 एसएलपी क्रिमिनल संख्या 21271-21272 वर्ष 2025 से उत्पन्न
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 17 सितंबर 2026

