ऋण वसूली में बाहुबल के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: वाहनों की जबरन जब्ती पर लगाई रोक, आरबीआई को दिए सख्त निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) कर्ज की अदायगी न होने पर वाहनों को जब्त करने के लिए बाहुबल, जबरदस्ती या डराने-धमकाने का रास्ता नहीं अपना सकतीं। जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि किसी भी कर्ज की वसूली कानून के दायरे में रहकर ही की जा सकती है और वित्तीय संस्थानों को नियमों को दरकिनार कर मनमानी करने की कतई अनुमति नहीं दी जा सकती।

शीर्ष अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि आक्रामक वसूली पर लगाम लगाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा तय किए गए दिशानिर्देश केवल कागजों तक ही सीमित रह गए हैं और उन्हें धरातल पर उतारने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए। कोर्ट ने आरबीआई को अपने परिपत्रों और नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराने के लिए प्रभावी कदम उठाने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने आधी रात को जबरन ट्रक छीनने के मामले में पीड़ित वाहन मालिक के संवैधानिक अधिकारों का हनन मानते हुए उसे मुआवजा देने का भी आदेश दिया।

वित्तीय समावेशन को उत्पीड़न का हथियार नहीं बनने दिया जा सकता

जस्टिस आलोक अराधे ने फैसले में रेखांकित किया कि वाहन को कब्जे में लेने का अधिकार एक निजी अनुबंध से निकलता है, जो प्रारंभिक चरण में किसी न्यायिक निगरानी के बिना काम करता है। यही व्यवस्था वित्तीय संस्थानों के लिए सीमित आय वाले लोगों को संपत्ति की सुरक्षा के आधार पर ऋण देना व्यावहारिक बनाती है।

हालांकि, अदालत ने आगाह किया कि इस अधिकार पर यदि अंकुश न रहे, तो इसका उपयोग आधी रात को, धोखे से या बलपूर्वक संपत्ति हड़पने के अनियंत्रित लाइसेंस के रूप में किया जा सकता है। ऐसा होने से वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने वाली व्यवस्था उन लोगों के उत्पीड़न का जरिया बन जाएगी, जिनकी भलाई के लिए इसे तैयार किया गया था। पीठ ने कहा कि ऋणदाता कंपनी को अपनी वसूली की आवश्यकता और कर्जदार के आजीविका के साधन को निष्पक्ष प्रक्रिया व पूर्व नोटिस के साथ संरक्षित रखने के हक के बीच संतुलन साधना अनिवार्य है।

READ ALSO  अधीनस्थ कर्मचारियों के माध्यम से रिश्वत की मांग भी धारा 7 पीसी एक्ट के तहत अपराध हो सकती है; सुप्रीम कोर्ट ने सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ एफआईआर बहाल की

अयोध्या में आधी रात को तोड़ा गया था ट्रक का लॉक

यह पूरा विवाद शर्मा नामक एक व्यावसायिक वाहन संचालक से जुड़ा है, जिन्होंने चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड से ट्रक के लिए कर्ज लिया था। किस्तें न चुका पाने पर कंपनी ने पहले नोटिस देकर वाहन जब्त किया था, जिसे बाद में एकमुश्त भुगतान और खाता नियमित करने के आश्वासन पर छोड़ दिया गया। इसके बाद दोबारा चूक होने पर कंपनी ने वाहन को फिर से कब्जे में लेकर बेच दिया।

वाहन मालिक का आरोप था कि 9 अप्रैल 2023 को रात करीब एक बजे, जब उनका ट्रक अयोध्या के एक गोदाम में माल उतारकर खड़ा था, तभी चार अज्ञात लोग आए और उन्होंने स्टीयरिंग का लॉक तोड़कर वाहन को जबरन अगवा कर लिया। उनका कहना था कि जब्ती से पहले उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई और नीलामी से मिली रकम काटने के बाद कंपनी ने बाकी बकाया चुकाने की मांग की। अयोध्या की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत और इलाहाबाद हाईकोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद पीड़ित ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

अनुबंध की एकतरफा शर्तें कानून और नियमों के खिलाफ

READ ALSO  झारखंड हाईकोर्ट ने रांची में बढ़ते अपराध को लेकर शीर्ष पुलिस अधिकारियों को तलब किया

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि वाहन को कब्जे में लेने से पहले कर्जदार को अनिवार्य सात दिनों का पूर्व नोटिस जारी नहीं किया गया था। अदालत ने गौर किया कि ऋण समझौते में कंपनी ने नोटिस देने और बिक्री के समय व तरीके को पूरी तरह से अपनी एकतरफा मर्जी पर छोड़ रखा था।

पीठ ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था 5 मई 2003 के आरबीआई के ‘फेयर प्रैक्टिसेज कोड फॉर लेंडर्स’ और भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है। इसके अलावा, अदालत ने 26 फरवरी 2007 के ‘मैनेजर, आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड बनाम प्रकाश कौर व अन्य’ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि कानून के राज वाले देश में बैंक कर्ज वसूली के लिए गुंडों की मदद नहीं ले सकते। अदालत ने कहा कि रात के अंधेरे में स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन ले जाना सीधे तौर पर उसी गुंडागर्दी का प्रमाण है, जिसे आरबीआई और शीर्ष अदालत पहले भी खारिज कर चुके हैं।

READ ALSO  नाबालिग लड़की को "आजा आजा" कहना यौन उत्पीड़न के बराबर है- मुंबई कोर्ट ने पॉक्सो एक्ट और धारा 354D IPC के तहत दोषी ठहराया
Ad 20- WhatsApp Banner

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles