सोशल मीडिया पर इनफिनिट स्क्रॉल और ऑटोप्ले की लत: दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से नीतिगत रुख पूछा

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार, 16 सितंबर को केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या वह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लत को बढ़ावा देने वाले फीचर्स—जैसे इनफिनिट स्क्रॉल और ऑटोप्ले—को विनियमित करने के लिए किसी नीति पर विचार कर रही है। जस्टिस नितिन वासुदेव साम्ब्रे और जस्टिस अमित शर्मा की पीठ ने इस विषय पर केंद्र से आवश्यक निर्देश हासिल करने का निर्देश देते हुए जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई तीन सप्ताह के लिए टाल दी।

नीतिगत दायरे और याचिका की वैधता पर सरकार का रुख

अदालत में पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने बताया कि सरकार की ओर से इस बाबत किसी नीति को तैयार किए जाने को लेकर फिलहाल उनके पास कोई स्पष्ट निर्देश नहीं हैं। उन्होंने कहा कि याचिका में महत्वपूर्ण विषय उठाए गए हैं, लेकिन यह नीति-निर्माताओं के कार्यक्षेत्र में आता है। उन्होंने यह सुझाव भी दिया कि याचिकाकर्ता अपनी मांगों को लेकर सरकार को एक औपचारिक प्रतिवेदन सौंप सकते हैं।

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वहीं, केंद्र सरकार और कुछ सोशल मीडिया कंपनियों के वकीलों ने याचिका की सुनवाई-योग्यता पर सवाल उठाए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाईकोर्ट्स के पूर्व के आदेशों का हवाला दिया, जिनमें इसी प्रकृति के मामलों पर याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया गया था।

सामग्री नहीं, प्लेटफॉर्म्स के डिजाइन ढांचे पर कानूनी आपत्ति

यह जनहित याचिका विधि प्राध्यापक (लॉ प्रोफेसर) विकास कथूरिया की ओर से अधिवक्ता कार्तिका शर्मा, हर्षा साधवानी और सुभिका जोशी के जरिए दाखिल की गई है। याचिका में कहा गया है कि मुख्य विवाद सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाली सामग्री का नहीं, बल्कि इन प्लेटफॉर्म्स की तकनीकी बनावट का है।

याचिका के अनुसार, इनफिनिट स्क्रॉल, ऑटोप्ले, एल्गोरिदम-आधारित पर्सनलाइज्ड फीड, लगातार आने वाले नोटिफिकेशन्स और ‘लाइक्स’ जैसी वेरिएबल-रिवॉर्ड प्रणालियां विशेष रूप से इस तरह बनाई गई हैं ताकि वे यूज़र्स का ध्यान खींचें, उन्हें लंबे समय तक उलझाए रखें और बार-बार प्लेटफॉर्म पर लौटने को प्रेरित करें।

युवाओं के स्क्रीन टाइम और मानसिक सेहत पर प्रतिकूल असर

याचिका में आंकड़ों का उल्लेख करते हुए बताया गया कि भारत में 18 से 24 वर्ष आयु वर्ग के युवा प्रतिदिन औसतन 120 मिनट से अधिक समय सोशल मीडिया पर बिताते हैं।

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याचिकाकर्ताओं ने क्लिनिकल प्रमाणों का हवाला देते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर लंबे समय तक स्क्रीन टाइम का सीधा संबंध किशोरों में अवसाद (डिप्रेशन) और आत्महत्या के बढ़ते मामलों से पाया गया है।

नियमन और विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग

याचिका में दिल्ली हाईकोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह केंद्र सरकार तथा राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को इनफिनिट स्क्रॉल, ऑटोप्ले, पर्सनलाइज्ड फीड्स और लगातार आने वाले नोटिफिकेशन्स को प्रतिबंधित, सीमित या विनियमित करने का निर्देश दे। इसके साथ ही याचिका में एक विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग भी की गई है, जो यूज़र्स के एंगेजमेंट को अधिकतम करने वाले इन तकनीकी फीचर्स की जांच करे और सुरक्षात्मक दिशा-निर्देशों की सिफारिश करे।

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