पति की हत्या: दोषी महिला की उम्रकैद की सजा पर रोक लगाने से राजस्थान हाईकोर्ट का इनकार, 9 साल की बेटी की गवाही बनी आधार

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने पति की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रही एक महिला की सजा निलंबन अर्जी को खारिज कर दिया है। अदालत ने मामले में दंपती की नौ वर्षीय बेटी की चश्मदीद गवाही, मृतक के सीने पर चाकू के घाव की पुष्टि करने वाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट और आरोपी के खुलासे पर बरामद हुए हथियार को अहम आधार माना।

जस्टिस महेंद्र कुमार गोयल और जस्टिस प्रवीर भटनागर की खंडपीठ महिला की आपराधिक अपील के साथ दाखिल सजा निलंबन याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा कि साबित हुए अपराध की गंभीरता को देखते हुए अपील पर अंतिम फैसला आने तक सजा पर रोक लगाने का कोई औचित्य नहीं बनता।

मासूम बेटी की गवाही और बरामदगी बनी अहम आधार

हाईकोर्ट ने 14 सितंबर को दिए अपने आदेश में दंपती की नौ साल की बेटी (अदालती रिकॉर्ड में सुश्री ‘एस’) के बयान पर खास तौर पर गौर किया। बच्ची ने सुनवाई के दौरान बताया था कि उसने अपनी मां को पिता पर चाकू से वार करते हुए देखा था।

बचाव पक्ष ने जिरह का हवाला देते हुए दावा किया था कि बच्ची ने अपनी दादी के सिखाने पर यह बयान दिया। हालांकि, अदालत ने रेखांकित किया कि बच्ची ने जिरह के दौरान बचाव पक्ष के उस सुझाव को सिरे से नकार दिया था कि उसने अपनी मां को पिता पर हमला करते नहीं देखा था।

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इसके साथ ही अदालत ने मेडिकल साक्ष्यों का भी संज्ञान लिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से साबित हुआ था कि मृतक के सीने पर चाकू का गहरा घाव था। इसके अलावा, वारदात में इस्तेमाल किया गया हथियार भी आरोपी महिला के बयान के आधार पर ही बरामद किया गया था।

बचाव पक्ष की दलीलें खारिज

सजा पर रोक की मांग करते हुए महिला के वकील ने तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल को मामले में झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने एफआईआर दर्ज करने में हुई कथित देरी और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में केवल एक ही चोट पाए जाने का हवाला देते हुए राहत देने की गुहार लगाई थी।

हालांकि, अदालत ने इस स्तर पर इन आपत्तियों को खारिज कर दिया।

सजा निलंबन पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला

हाईकोर्ट ने सजा के निलंबन से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि अपीलीय अदालत को इस चरण में अभियोजन पक्ष के मामले में छोटी-मोटी खामियां या कमियां तलाशने के लिए सबूतों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।

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पीठ ने रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट से दोषी करार दिए जा चुके व्यक्ति की कानूनी स्थिति विचाराधीन आरोपी से बिल्कुल अलग होती है।

अदालत ने कहा कि हत्या जैसे जघन्य अपराधों में सजा का निलंबन बेहद असाधारण परिस्थितियों में ही दिया जाना चाहिए। इसके लिए आरोपों की प्रकृति, अपराध को अंजाम देने के तरीके और मामले की गंभीरता को ध्यान में रखा जाता है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वह इस आदेश में मुख्य आपराधिक अपील पर फैसला नहीं दे रही है, बल्कि यह निर्णय केवल सजा पर अंतरिम रोक लगाने तक सीमित है।

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ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद

ट्रायल कोर्ट ने 22 अगस्त 2025 को महिला को हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। इसके अलावा उस पर 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था, जिसके भुगतान में चूक होने पर दो महीने के अतिरिक्त साधारण कारावास का आदेश था।

हाईकोर्ट ने अंत में कहा कि महिला पर साबित हुए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए वह सजा को निलंबित करने के पक्ष में नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने उसकी अर्जी खारिज कर दी।

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