पटना हाईकोर्ट ने करीब दो दशक पुराने एक मामले में रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फैसले को निरस्त करते हुए चलती ट्रेन से गिरकर जान गंवाने वाले 20 वर्षीय युवक के पिता के पक्ष में फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध साक्ष्य यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि मृतक एक वैध यात्री था और उसकी मौत एक अप्रिय दुर्घटना के चलते हुई थी। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह पुराने और संशोधित दोनों नियमों के तहत मुआवजे की गणना करे और जो भी राशि अधिक बने, उसका भुगतान पीड़ित परिवार को करे।
जस्टिस खतीम रज़ा ने 10 सितंबर को यह आदेश नवल किशोर यादव की अपील पर सुनवाई करते हुए पारित किया। यादव ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल की पटना बेंच के 18 मार्च 2016 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके अविवाहित पुत्र कुंदन कुमार की मौत पर मुआवजे का दावा खारिज कर दिया गया था। कुंदन की नवंबर 2005 में विक्रमशिला एक्सप्रेस से गिरकर मौत हो गई थी।
मुआवजे की दोहरी गणना और अधिकतम भुगतान का निर्देश
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के पुराने आदेश को खारिज करते हुए निर्देश दिया कि मुआवजे की राशि का आकलन दो अलग-अलग आधारों पर किया जाए। पहले तरीके के तहत पुराने नियमों के अनुसार 4 लाख रुपये की मूल राशि पर 7.5 प्रतिशत सालाना ब्याज जोड़ा जाए। वहीं दूसरे तरीके के तहत संशोधित नियमों के मुताबिक 8 लाख रुपये की एकमुश्त राशि तय की जाए। अदालत ने साफ कहा कि इन दोनों आकलनों में से जो भी रकम अधिक निकलती है, उसका भुगतान दावेदार को बिना किसी देरी के जल्द से जल्द किया जाए।
भीड़भाड़ वाली बोगी से गिरने से हुई थी कुंदन की मौत
मामले के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, कुंदन कुमार ने 9 नवंबर 2005 को धरहरा से कहलगांव जाने के लिए सेकंड क्लास का सामान्य टिकट और सुपरफास्ट अधिभार टिकट खरीदा था। इसके बाद वह विक्रमशिला एक्सप्रेस में सवार हुआ। डिब्बे में भारी भीड़ थी और अचानक लगे एक जोरदार झटके के कारण वह चलती ट्रेन से नीचे गिर गया। दशरथपुर रेलवे स्टेशन के समीप गंभीर चोटें आने से उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
घटना के तुरंत बाद स्टेशन मास्टर ने जमालपुर रेलवे पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने उसी दिन पंचनामा तैयार कर अप्राकृतिक मौत का मामला दर्ज किया। अगले दिन 10 नवंबर 2005 को हुए पोस्टमार्टम में पुष्टि हुई कि कुंदन की मौत किसी सख्त और कुंद वस्तु से टकराने के कारण लगे सदमे और अत्यधिक आंतरिक रक्तस्राव से हुई थी। पुलिस जांच ने भी यही निष्कर्ष निकाला था कि युवक दुर्घटनावश ट्रेन से गिरा था। इसके अलावा मृतक की तलाशी के दौरान उसके शव से यात्रा का वैध टिकट भी बरामद हुआ था।
ट्रिब्यूनल के तर्कों को हाईकोर्ट ने किया खारिज
हादसे के बाद मृतक के पिता नवल किशोर यादव ने ट्रिब्यूनल के समक्ष 4 लाख रुपये के मुआवजे का दावा पेश किया था। हालांकि, मार्च 2016 में ट्रिब्यूनल ने इस आधार पर याचिका खारिज कर दी कि घटना का कोई सीधा चश्मदीद गवाह पेश नहीं किया गया और खुद पिता भी मौके पर मौजूद नहीं थे। ट्रिब्यूनल ने पुलिस कागजात में तारीखों की कुछ विसंगतियों और एफआईआर व पंचनामे के दस्तावेजों के धुंधले व अपठनीय होने को भी दावा खारिज करने की वजह बनाया था।
हाईकोर्ट में अपील दायर कर पिता ने पक्ष रखा कि तारीखों में मामूली अंतर केवल लिपिकीय भूल थी, जबकि पोस्टमार्टम और पुलिस की विस्तृत जांच रिपोर्ट घटना की तारीख 9 नवंबर 2005 ही दर्शाती है। रेलवे ने चश्मदीद के अभाव और दस्तावेजों की कमियों का हवाला देकर इस अपील का विरोध किया।
कल्याणकारी कानून की उदार व्याख्या पर जोर
हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के दृष्टिकोण को अनुचित ठहराते हुए कहा कि सिर्फ इसलिए कि कुछ दस्तावेज हल्के या धुंधले हैं, उन्हें पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, खासकर तब जब उनकी मुख्य बातें पोस्टमार्टम रिपोर्ट, स्टेशन मास्टर के मेमो और शव से बरामद टिकट जैसे ठोस साक्ष्यों से पुष्ट होती हैं।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि रेलवे प्रशासन ने पिता के दावे को झुठलाने के लिए न तो कोई मौखिक गवाही दी और न ही कोई दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत किया। यहां तक कि रेलवे ने इस तरह के मामलों में अनिवार्य मानी जाने वाली मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) की घटना रिपोर्ट भी दाखिल नहीं की।
सुप्रीम कोर्ट के उन कानूनी सिद्धांतों का हवाला देते हुए, जिनमें कहा गया है कि आम जनता की भलाई के लिए बने सामाजिक कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या उदारतापूर्वक की जानी चाहिए, हाईकोर्ट ने माना कि मृतक एक वैध यात्री था और उसकी मौत एक अप्रिय रेल दुर्घटना में हुई थी, जिसके चलते उसके माता-पिता वैधानिक राहत पाने के पूर्ण हकदार हैं।

