केरल के एक निजी अस्पताल को इलाज का अत्यधिक बिल वसूलने और मरीज के फर्जी हस्ताक्षर वाले दस्तावेज बीमा कंपनी को भेजने के मामले में कड़ा झटका लगा है। कोल्लम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने अस्पताल प्रबंधन को सेवा में गंभीर कमी का दोषी ठहराते हुए शिकायतकर्ता को कुल 1.14 लाख रुपये चुकाने का आदेश दिया है। इस पूरी राशि का भुगतान 45 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया गया है।
आयोग की अध्यक्ष एस के श्रीला और सदस्य स्टैनली एच की पीठ ने 19 अगस्त को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि अस्पताल अधिक बिलिंग और विवादित हस्ताक्षर पर कोई भी संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में पूरी तरह नाकाम रहा है। आयोग ने अस्पताल को निर्देश दिया कि वह अनुचित रूप से वसूली गई 79,000 रुपये की अतिरिक्त रकम मरीज को लौटाए। इसके अलावा मरीज को हुई मानसिक प्रताड़ना व असुविधा के लिए 25,000 रुपये का मुआवजा और अदालती खर्च के तौर पर 10,000 रुपये देने का भी आदेश सुनाया गया।
अनुमानित खर्च 40 हजार, बीमा कंपनी से क्लेम किए 1.30 लाख
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता को 30 अक्टूबर 2025 की दोपहर करीब 1:45 बजे पेट में असहनीय दर्द के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालत गंभीर होने के कारण उन्हें लगभग 12 घंटे तक आईसीयू में रखा गया और अगले दिन सामान्य कमरे में स्थानांतरित कर दिया गया। मरीज को 3 नवंबर को छुट्टी मिलने की बात कही गई थी। डिस्चार्ज से पहले अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें बताया था कि पूरे इलाज पर करीब 40,000 रुपये का खर्च आएगा।
मरीज के पास 2.50 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा कवर उपलब्ध था, इसलिए उन्होंने बिल बीमा कंपनी को भेजने पर सहमति जताते हुए कहा कि जो खर्च पॉलिसी के तहत कवर नहीं होगा, उसका भुगतान वह खुद करेंगे। हालांकि, बाद में अस्पताल ने बीमा कंपनी को लगभग 1.30 लाख रुपये का क्लेम थमा दिया, जिसमें से बीमा कंपनी ने 1.19 लाख रुपये मंजूर भी कर दिए।
फर्जी हस्ताक्षर का खुलासा और अस्पताल का टालमटोल
इलाज के मुकाबले भारी-भरकम बिल देखकर जब मरीज ने सवाल उठाया, तो अस्पताल कर्मचारियों ने तर्क दिया कि इनडोर भर्ती के शुल्क ओपीडी की तुलना में ज्यादा होते हैं। इसके बाद जब मरीज ने बीमा कंपनी को भेजे गए बिल की जांच की, तो सामने आया कि उनके नाम के आगे जो हस्ताक्षर किए गए थे, वे उनके थे ही नहीं।
अस्पताल द्वारा वास्तविक खर्च से करीब 79,000 रुपये अतिरिक्त ऐंठने और फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेने से आहत होकर मरीज ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अधिक वसूली गई राशि की वापसी के साथ-साथ अनुचित व्यापार व्यवहार के लिए 4 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी।
नोटिस मिलने के बाद भी अदालत से नदारद रहा अस्पताल
उपभोक्ता आयोग ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि नोटिस मिलने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन न तो पीठ के सामने हाजिर हुआ और न ही उसने अपनी ओर से कोई आधिकारिक जवाब दाखिल किया।
आयोग ने स्पष्ट किया कि इलाज और बिलिंग से जुड़े सभी दस्तावेज अस्पताल की कस्टडी में थे, इसलिए यह साबित करने की पूरी जिम्मेदारी अस्पताल प्रबंधन की थी कि विवादित हस्ताक्षर वाला दस्तावेज कैसे बना और उसका आधार क्या था। चूंकि अस्पताल ने शिकायतकर्ता के बयानों और दस्तावेजों पर कोई जिरह नहीं की और न ही कोई खंडन पेश किया, इसलिए पीठ ने मरीज के सबूतों को पूरी तरह सही माना और अस्पताल के खिलाफ एकतरफा आदेश पारित कर दिया।

