एटीएम से नहीं निकली नकदी फिर भी कटे पैसे, केरल उपभोक्ता आयोग ने बैंक पर लगाया 70 हजार रुपये का जुर्माना

एटीएम से पैसे न निकलने के बावजूद खाते से रकम कटने के एक दशक पुराने मामले में जिला उपभोक्ता आयोग ने बैंक को कड़ी फटकार लगाते हुए पीड़ित ग्राहक को 70,000 रुपये अदा करने का निर्देश दिया है। त्रिशूर जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 31 अगस्त के अपने फैसले में कहा कि साझा एटीएम नेटवर्क में तकनीकी खामियों का शिकार होने वाले ग्राहकों की सुरक्षा और शिकायतों का त्वरित समाधान करना उसके मूल बैंक की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

आयोग के अध्यक्ष सी. टी. साबू और सदस्य श्रीजा एस. तथा राम मोहन आर. की पीठ ने बैंक को आदेश दिया कि वह खाताधारक से काटी गई 10,000 रुपये की मूल रकम एक महीने के भीतर वापस करे। इसके अतिरिक्त, बैंक को सेवा में गंभीर कमी, ग्राहक को हुई मानसिक प्रताड़ना और वित्तीय असुविधा के एवज में 50,000 रुपये का हर्जाना और कानूनी खर्च के रूप में 10,000 रुपये चुकाने का भी आदेश दिया गया है।

मार्च 2014 में निष्फल हुआ था लेनदेन

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विवाद की शुरुआत 1 मार्च 2014 को हुई थी, जब पीड़ित खाताधारक ने किसी दूसरे बैंक द्वारा संचालित एटीएम से 10,000 रुपये निकालने का प्रयास किया। एटीएम मशीन ने निकासी प्रक्रिया तो शुरू की, लेकिन नकदी बाहर नहीं निकली। इसके कुछ ही देर बाद ग्राहक को पता चला कि उसके खाते से 10,000 रुपये काट लिए गए हैं।

बैंक के पास बार-बार शिकायत करने के बाद भी जब मामले का निपटारा नहीं हुआ, तब पीड़ित ने मार्च 2015 में अपने वकील ए. डी. बेनी के माध्यम से बैंक को कानूनी नोटिस भेजा। वहां से भी कोई संतोषजनक समाधान न मिलने पर उन्होंने सेवा में लापरवाही का आरोप लगाते हुए जिला उपभोक्ता आयोग का रुख किया।

नकदी निकलने का ठोस सबूत नहीं दे पाया बैंक

आयोग के समक्ष बैंक के वकील के. एन. संतोष ने तर्क दिया कि आंतरिक खाता विवरण और ट्रांजैक्शन रिकॉर्ड के अनुसार लेनदेन सफल रहा था और मशीन से पैसे निकाले जा चुके थे।

हालांकि, आयोग ने पड़ताल में पाया कि जिस एटीएम से निकासी का प्रयास किया गया था, उसके इलेक्ट्रॉनिक ऑडिट रिकॉर्ड में इस विवादित लेनदेन का कोई पुख्ता प्रमाण नहीं था। पीठ ने कहा कि बैंक ग्राहक के वैध दावे को खारिज करता रहा, जबकि वह यह साबित करने वाला कोई भी दस्तावेजी प्रमाण पेश नहीं कर सका कि नकदी सचमुच ग्राहक के हाथ में पहुंची थी।

दूसरे बैंक के एटीएम में खराबी पर भी मूल बैंक ही जवाबदेह

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अंतर-बैंक एटीएम व्यवस्था में वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय करते हुए आयोग ने स्पष्ट किया कि ग्राहक का सीधा अनुबंध और संबंध उसी बैंक से होता है जहां उसका खाता है। एक सामान्य उपभोक्ता से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह बैंकों के साझा तकनीकी ढांचे में आई अंदरूनी खराबी को खुद साबित करता फिरे।

पीठ ने कहा कि यदि किसी तीसरे पक्ष के एटीएम में कोई तकनीकी विफलता आती है, तब भी खाताधारक के बैंक का यह दायित्व है कि वह दूसरे बैंक के साथ लेनदेन का मिलान करे, गड़बड़ी की जांच करे और जमाकर्ता की पूंजी सुरक्षित रखे। एटीएम का संचालन करने वाले बैंक की कोई सीधी लापरवाही न पाते हुए आयोग ने उसके खिलाफ शिकायत को खारिज कर दिया।

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आयोग ने यह भी रेखांकित किया कि यद्यपि ग्राहक ने मुआवजे के रूप में केवल 10,000 रुपये की मांग की थी, लेकिन एक दशक से अधिक की देरी और बैंक के लापरवाह रवैये को देखते हुए अधिक जुर्माना लगाना सर्वथा उचित है। आयोग ने कहा कि एक वैध उपभोक्ता के रूप में शिकायतकर्ता पारदर्शी, निष्पक्ष और कुशल बैंकिंग सेवा पाने का पूरा हकदार था।

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