केरल हाईकोर्ट ने 2022 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के कार्यकर्ता एस.के. श्रीनिवासन की हत्या के मामले में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के राष्ट्रीय नेता अशरफ मौलवी की जमानत याचिका खारिज कर दी है। हाईकोर्ट ने दो-टूक कहा कि यूएपीए से जुड़े मामलों में किसी आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मुकाबले समाज का सामूहिक हित और देश की सुरक्षा सर्वोपरि है।
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्णा एस की बेंच ने 21 अगस्त के अपने आदेश में कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत न्याय करते समय अदालतों को न केवल आरोपी की स्वतंत्रता, बल्कि पीड़ितों और उनके परिजनों के हितों और सबसे बढ़कर समाज की सुरक्षा व राष्ट्रहित को ध्यान में रखना चाहिए।
लंबी हिरासत और ट्रायल में देरी रिहाई का आधार नहीं
हाईकोर्ट ने आरोपी की उस दलील को नकार दिया जिसमें मुकदमे की सुनवाई में देरी और लंबी हिरासत को जमानत का आधार बनाया गया था। पीठ ने रेखांकित किया कि हत्या का अपराध अत्यंत गंभीर है, जिसमें मौत की सजा या आजीवन कारावास का प्रावधान है। ऐसे में आरोपी द्वारा हिरासत में बिताई गई अवधि को कानूनन तय सजा का बड़ा हिस्सा नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि आरोपों की गंभीरता और संभावित सजा को देखते हुए सिर्फ मुकदमे में देरी के आधार पर आरोपी को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने यह भी माना कि लगातार हिरासत में रखे जाने से आरोपी के संवैधानिक अधिकारों का हनन नहीं हुआ है।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
विशेष अदालत द्वारा जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद मौलवी ने हाईकोर्ट का रुख किया था। आरोपी की ओर से वरिष्ठ वकील आदित्य सोंधी ने पक्ष रखते हुए कहा कि उनका मुवक्किल तीन साल और आठ महीने से अधिक समय से जेल में बंद है, जबकि निकट भविष्य में मुकदमे की सुनवाई शुरू होने या पूरी होने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित कारण उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
वहीं, राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक शस्तमंगलम एस. अजितकुमार ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि गिरफ्तारी के आधार आरोपी को मौखिक रूप से समझा दिए गए थे। अभियोजन पक्ष ने स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट और जुटाए गए साक्ष्यों से आरोपी के खिलाफ अपराध में शामिल होने का प्रथम दृष्टया ठोस मामला बनता है।
सोची-समझी साजिश और जासूसी के आरोप
हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के निष्कर्षों का हवाला देते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य आरोपी के पीएफआई का नेता होने, साजिश रचने वाली जगह और घटनास्थल पर उसकी मौजूदगी दर्ज होने तथा वारदात में उसकी भूमिका की पुष्टि करते हैं।
जांच एजेंसी के अनुसार, पीएफआई के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने समाज में सांप्रदायिक तनाव फैलाने और दहशत पैदा करने के इरादे से आपराधिक साजिश रची थी। इस साजिश के तहत स्थानीय हिंदू नेताओं की रेकी की गई और बाद में योजनाबद्ध तरीके से श्रीनिवासन को निशाना बनाकर उनकी जान ले ली गई। केंद्र सरकार के निर्देश पर जांच का जिम्मा एनआईए को सौंपा गया था, जिसने जांच पूरी कर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत मौलवी और अन्य के खिलाफ अंतिम रिपोर्ट दाखिल की।
पलक्कड़ में हुई हिंसा की पृष्ठभूमि
यह वारदात पलक्कड़ के मेलामुरी इलाके में हुई थी, जहां आरएसएस के 45 वर्षीय पूर्व जिला पदाधिकारी श्रीनिवासन की उनकी दोपहिया वाहन मरम्मत की दुकान के भीतर हत्या कर दी गई थी। तीन मोटरसाइकिलों पर सवार होकर आए छह हथियारबंद हमलावरों ने दुकान में घुसकर तलवारों से उन पर ताबड़तोड़ वार किए थे।
यह हमला स्थानीय पीएफआई नेता ए. सुबैर की कथित तौर पर आरएसएस कार्यकर्ताओं द्वारा की गई हत्या के महज एक दिन बाद अंजाम दिया गया था।

