समग्र लेनदेन का हिस्सा होने पर लोन एग्रीमेंट का आर्बिट्रेशन क्लॉज पर्सनल गारंटर पर भी लागू होगा: सुप्रीम कोर्ट

कई समझौतों से जुड़े जटिल व्यावसायिक लेनदेन पर एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने स्पष्ट किया है कि यदि पर्सनल गारंटी किसी एकल और समग्र लेनदेन का अभिन्न अंग है, तो मुख्य लोन एग्रीमेंट में मौजूद आर्बिट्रेशन क्लॉज पर्सनल गारंटर पर भी बाध्यकारी होगा। पीठ में जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे शामिल थे। कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि “क्या ऐसे मामलों में, जहां पक्षकारों ने परस्पर जुड़े कई दस्तावेजों के माध्यम से एक एकल लेनदेन तैयार किया हो, एक दस्तावेज में मौजूद आर्बिट्रेशन क्लॉज दूसरे ऐसे दस्तावेज के पक्षकार को बाध्य कर सकता है, जो उससे स्पष्ट रूप से जुड़ा तो है लेकिन उसमें स्वयं कोई आर्बिट्रेशन क्लॉज नहीं है?”

जस्टिस आलोक अराधे द्वारा लिखे गए फैसले में शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के निर्णय और एकमात्र आर्बिट्रेटर के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत पर्सनल गारंटर को आर्बिट्रेशन की कार्यवाही से बाहर कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 7(5) के तहत लोन एग्रीमेंट का आर्बिट्रेशन क्लॉज वैध रूप से पर्सनल गारंटी का भी हिस्सा बन चुका था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय द्वारा देशभर के प्रत्येक जिले में “प्रधानमंत्री कौशल केंद्र” (पीएमकेके) नाम से मॉडल ट्रेनिंग सेंटर स्थापित करने की योजना से जुड़ा है। नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (एनएसडीसी)—जो कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने वाली संस्थाओं को वित्तीय सहायता देने वाली एक गैर-लाभकारी कंपनी और क्रियान्वयन एजेंसी है—ने 29 जुलाई 2016 को प्रस्ताव आमंत्रित करते हुए एक ‘रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल’ जारी किया था।

सूर्य वायर्स प्राइवेट लिमिटेड (कंपनी) और दिशा एजुकेशन सोसाइटी ने संयुक्त रूप से ट्रेनिंग सेंटर स्थापित करने के लिए तकनीकी और वित्तीय प्रस्ताव प्रस्तुत किए, जिसके आधार पर उन्हें जिले आवंटित किए गए। शांति फाइनेंस एंड प्रॉपर्टी डेवलपमेंट प्राइवेट लिमिटेड ने मॉर्गेज सिक्योरिटी उपलब्ध कराते हुए सह-उधारकर्ता के रूप में भाग लिया। सूर्य वायर्स प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक और अधिकृत प्रतिनिधि (रेस्पोंडेंट नंबर 2) ने इस वित्तीय सहायता को सुरक्षित करने के लिए पर्सनल गारंटी निष्पादित की।

20 दिसंबर 2016 को पक्षकारों के बीच एक साथ कई समझौते हुए, जिनमें एक सर्विस लेवल एग्रीमेंट (एसएलए), 7,17,63,197 रुपये का पहला लोन एग्रीमेंट और कई सहायक “फैसिलिटी एग्रीमेंट्स” शामिल थे। इन सहायक समझौतों में डीड ऑफ असाइनमेंट, डीड ऑफ हाइपोथीकेशन, इर्रेवोकेबल पावर ऑफ अटॉर्नी, अंडरटेकिंग-कम-डिक्लेरेशन और 27 दिसंबर 2016 को रेस्पोंडेंट नंबर 2 द्वारा दी गई पर्सनल गारंटी शामिल थी। इसके बाद, 18 अगस्त 2017 को 2,13,83,194 रुपये के अतिरिक्त लोन के लिए भी इसी प्रकार के समझौतों का दूसरा सेट निष्पादित किया गया, जिसमें रेस्पोंडेंट नंबर 2 की दूसरी पर्सनल गारंटी भी शामिल थी।

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कर्ज की अदायगी में चूक होने पर एनएसडीसी ने 29 अक्टूबर 2021 को लोन रिकॉल नोटिस जारी किए। इसके बाद 21 जून 2022 को इंडियन काउंसिल ऑफ आर्बिट्रेशन (आईसीए) के समक्ष सभी पक्षों से वसूली के लिए आर्बिट्रेशन की कार्यवाही शुरू की गई। इस पर रेस्पोंडेंट नंबर 2, 3, 5 और 7 ने आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट की धारा 16 के तहत एक आवेदन दायर कर दलील दी कि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का उन पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है, क्योंकि उन्होंने अपनी व्यक्तिगत क्षमता में लोन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।

23 अक्टूबर 2024 को एकमात्र आर्बिट्रेटर ने धारा 16 के आवेदन को स्वीकार करते हुए इन सभी को पक्षकारों की सूची से हटाने का निर्देश दिया। एनएसडीसी ने इस फैसले के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में धारा 37(2)(ए) के तहत अपील दायर की, जिसमें उसने केवल रेस्पोंडेंट नंबर 2 को हटाए जाने को चुनौती दी। 28 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट ने आर्बिट्रेटर के आदेश की पुष्टि करते हुए कहा कि पर्सनल गारंटी में अलग से कोई आर्बिट्रेशन क्लॉज नहीं है, किसी दस्तावेज का सामान्य संदर्भ अपने आप आर्बिट्रेशन क्लॉज को लागू नहीं करता जब तक कि पक्षकारों की स्पष्ट सहमति न हो, और एनएसडीसी यह साबित करने में विफल रहा कि रेस्पोंडेंट नंबर 2 कंपनी का “अल्टर ईगो” था या उसने धोखाधड़ी के लिए कॉर्पोरेट ढांचे का दुरुपयोग किया था। इसके बाद एनएसडीसी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि लोन एग्रीमेंट के क्लॉज 11.2 (विवाद समाधान), आर्टिकल 1 (परिभाषाएं), आर्टिकल 12 (विविध प्रावधान) और अनुसूचियों (शिड्यूल्स) को एक साथ पढ़ने से स्पष्ट होता है कि आर्बिट्रेशन क्लॉज पर्सनल गारंटी में भी समाहित है। उन्होंने तर्क दिया कि पर्सनल गारंटी कोई स्वतंत्र या अलग दस्तावेज नहीं था, बल्कि समझौते के तहत परिभाषित एक “फैसिलिटी एग्रीमेंट” और लोन जारी करने से पहले की अनिवार्य शर्त थी, जो पूरे लेनदेन का अटूट हिस्सा था। अपीलकर्ता ने कहा कि हाईकोर्ट ने धारा 7(5) को लागू करने में अत्यधिक तकनीकी और संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया, जो तय कानूनी सिद्धांतों के विपरीत है।

दूसरी ओर, रेस्पोंडेंट नंबर 2 के वकील ने दलील दी कि निष्पादित किए गए सात दस्तावेजों में से केवल चार में ही आर्बिट्रेशन क्लॉज मौजूद था, और लोन एग्रीमेंट के आर्बिट्रेशन क्लॉज को कभी भी पर्सनल गारंटी में शामिल नहीं किया गया। उन्होंने इसे दो अलग-अलग समझौतों का मामला बताया, जिसमें अलग-अलग पक्षकार शामिल थे और यह कोई मानक प्रारूप नहीं था। उनका कहना था कि क्लॉज 11.2 आर्बिट्रेशन को केवल लोन एग्रीमेंट से जुड़े विवादों तक सीमित करता है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि उचित मामलों में गैर-हस्ताक्षरकर्ता को भी परस्पर मंशा साबित होने पर बांधा जा सकता है, लेकिन यह मंशा दस्तावेज की भाषा से ही स्पष्ट होनी चाहिए, इसे केवल अनुमान पर आधारित नहीं माना जा सकता।

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सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने 1996 के अधिनियम की धारा 7(5) के दायरे और पूर्व के महत्वपूर्ण फैसलों की पड़ताल की:

  • एम.आर. इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम सोम दत्त बिल्डर्स लिमिटेड (2009) मामले में कोर्ट ने संदर्भ द्वारा समावेशन के मूल सिद्धांत तय किए थे। इसमें स्पष्ट किया गया था कि किसी अन्य अनुबंध का सामान्य संदर्भ आर्बिट्रेशन क्लॉज को तब तक शामिल नहीं करता जब तक कि स्पष्ट मंशा और विशिष्ट संदर्भ न हो, जबकि व्यापारिक संघों की मानक शर्तों या सामान्य अनुबंध शर्तों के मामले में स्थिति अलग होती है।
  • आईनॉक्स विंड लिमिटेड बनाम थर्मोकैबल्स लिमिटेड (2018) में दो जजों की पीठ ने दोहराया था कि किसी पूर्व अनुबंध का सामान्य संदर्भ पर्याप्त नहीं होता, लेकिन मानक प्रारूप का सामान्य संदर्भ आर्बिट्रेशन क्लॉज को समाहित करने के लिए पर्याप्त है।
  • शिनहान बैंक बनाम कैरोल इन्फो सर्विसेज लिमिटेड (2023) में तीन जजों की पीठ ने पुनः पुष्टि की कि धारा 7(5) तब संतुष्ट मानी जाती है जब अनुबंध का संदर्भ आर्बिट्रेशन क्लॉज को उस अनुबंध का हिस्सा बना देता है।
  • कॉक्स एंड किंग्स लिमिटेड बनाम एसएपी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (2024) के संविधान पीठ के फैसले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि धारा 2(1)(एच) के तहत “पक्षकार” की परिभाषा में हस्ताक्षरकर्ता और गैर-हस्ताक्षरकर्ता दोनों शामिल हैं। पक्षकारों का आचरण उनकी सहमति का संकेत हो सकता है, विशेष रूप से ऐसे समग्र लेनदेन में जहां मुख्य अनुबंध के बाद कई पूरक समझौते किए जाते हैं।
  • अजय मधुसूदन पटेल एवं अन्य बनाम ज्योतींद्र एस. पटेल एवं अन्य (2025) में तीन जजों की पीठ ने कहा था कि किसी अनुबंध के मोलभाव, क्रियान्वयन और समाप्ति में गैर-हस्ताक्षरकर्ता की भागीदारी से उसकी सहमति और मंशा का पता लगाया जा सकता है।
  • एएसएफ बिल्डटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम शापूरजी पलोनजी एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड (2025) में कोर्ट ने जोर दिया था कि आर्बिट्रेशन को प्रभावी बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि वह सहमति और स्वायत्तता के सिद्धांतों से समझौता किए बिना जटिल बहु-पक्षीय और बहु-अनुबंध व्यवस्थाओं को संभालने में सक्षम हो।

इन सिद्धांतों को मौजूदा मामले पर लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि रेस्पोंडेंट नंबर 2 ने दो अलग-अलग रूपों में दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए थे: पहला कंपनी के प्रबंध निदेशक के रूप में अधिकृत प्रतिनिधि बनकर, और दूसरा अपनी व्यक्तिगत क्षमता में पर्सनल गारंटर के रूप में।

लोन एग्रीमेंट के विभिन्न प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि क्लॉज 1.1(बी) के तहत “एग्रीमेंट” में सभी शिड्यूल्स शामिल हैं, क्लॉज 1.1(एल) के अनुसार “फैसिलिटी एग्रीमेंट्स” में शिड्यूल 4 के सभी दस्तावेज आते हैं, और शिड्यूल 4 में स्पष्ट रूप से “पर्सनल गारंटी” का उल्लेख है। इसके अलावा, आर्टिकल 12 का क्लॉज 12.1 स्पष्ट करता है कि फैसिलिटी एग्रीमेंट्स “इस एग्रीमेंट का हिस्सा माने जाएंगे, मानो उनके प्रावधानों को विस्तार से यहीं शामिल किया गया हो।”

अनुबंध की भाषा का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की:

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“यह वाक्यांश कि ‘मानो उनके प्रावधानों को विस्तार से यहीं शामिल किया गया हो’ अनुबंध के भीतर एक कानूनी कल्पना के रूप में कार्य करता है, जो पर्सनल गारंटी सहित प्रत्येक फैसिलिटी एग्रीमेंट को लोन एग्रीमेंट के समान कानूनी और मध्यस्थता ढांचे में बांधता है। इसलिए, पर्सनल गारंटी लोन एग्रीमेंट से अलग नहीं है, बल्कि उसके ताने-बाने में पूरी तरह समाई हुई है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि शिड्यूल 1 में इन सभी दस्तावेजों का निष्पादन लोन जारी करने से पहले की अनिवार्य शर्त थी। दस्तावेजों का लगभग एक ही समय पर निष्पादित होना यह सिद्ध करता है कि पक्षकारों का इरादा इसे एक एकल और समग्र लेनदेन बनाने का था। सार्वजनिक धन और कौशल प्रशिक्षण के व्यापक उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“इस प्रकार परिभाषित और एकीकृत की गई गारंटी को केवल विवाद समाधान के उद्देश्य से उस क्लॉज 11.2 से अलग नहीं किया जा सकता, जो उस समझौते से उत्पन्न अधिकारों और दायित्वों के विवादों को नियंत्रित करता है, जबकि वह देयता के विस्तार सहित अन्य सभी उद्देश्यों के लिए उससे बंधी रहती है।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा:

“उपर्युक्त कारणों से, हम यह निर्णय देते हैं कि लोन एग्रीमेंट्स के क्लॉज 11.2 में निहित आर्बिट्रेशन क्लॉज, 1996 के अधिनियम की धारा 7(5) के अर्थ के तहत, रेस्पोंडेंट नंबर 2 द्वारा निष्पादित 27.12.2016 और 18.08.2017 की पर्सनल गारंटी में समाहित माना जाएगा, और वह उससे उत्पन्न होने वाले विवादों के लिए आर्बिट्रेशन के समक्ष जाने के लिए बाध्य है।”

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और दिल्ली हाईकोर्ट के 28 जनवरी 2026 के फैसले तथा एकमात्र आर्बिट्रेटर के 23 अक्टूबर 2024 के उस आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया, जिसके तहत रेस्पोंडेंट नंबर 2 को आर्बिट्रेशन की कार्यवाही से हटाया गया था।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन बनाम सूर्य वायर्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एस.एल.पी. (सिविल) संख्या 10030/2026 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 8 सितंबर 2026

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