मेन्स रिया अपराधों में कंपनी पर आपराधिक मुकदमा केवल इसलिए रद्द नहीं हो सकता क्योंकि किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान या उसे आरोपी नहीं बनाया गया: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आपराधिक मंशा (मेन्स रिया) से जुड़े अपराधों में किसी कंपनी के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (सीआरपीसी) की धारा 482 के तहत सिर्फ इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि उसके साथ किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान नहीं की गई है या उसे आरोपी नहीं बनाया गया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने फार्मास्युटिकल कंपनी सनोफी इंडिया लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (बार्क) के खरीद टेंडरों में कथित भ्रष्टाचार और आपराधिक साजिश को लेकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की चार्जशीट को रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय कानून के तहत किसी प्राकृतिक व्यक्ति की मानसिक स्थिति को कॉरपोरेट इकाई पर आरोपित (एट्रिब्यूट) करने के लिए तीन-स्तरीय पदानुक्रमित ढांचा (थ्री-स्टेज फ्रेमवर्क) निर्धारित किया और माना कि किसी कंपनी पर आपराधिक दायित्व पूरी तरह तय होता है या नहीं, यह एक सूक्ष्म जांच का विषय है जिसे ट्रायल के दौरान सुलझाया जाना चाहिए, न कि शुरुआती स्तर पर ही कार्यवाही को खत्म करके।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, सनोफी इंडिया लिमिटेड, फार्मास्युटिकल उत्पादों के निर्माण में लगी एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है। टेंडर प्रक्रिया के तहत कंपनी ने वर्ष 2011-12, 2013-14 और 2015-16 के दौरान बार्क के रेयर मैटेरियल्स प्रोजेक्ट के लिए दवाओं की आपूर्ति की थी।

इसके बाद, सीबीआई की एफआईआर संख्या आरसी.17(ए)/2015 में कंपनी को आरोपी नंबर 4 बनाया गया। आरोप था कि बार्क के साइंटिफिक ऑफिसर (मेडिकल) डॉ. पी. आनंद ने जरूरत से ज्यादा मात्रा में और महंगी दरों पर दवाएं खरीदने के लिए दवा कंपनियों के साथ साजिश रची। जांच पूरी होने के बाद, सीबीआई ने 2017 में डॉ. पी. आनंद (आरोपी नंबर 1) और सनोफी इंडिया लिमिटेड (आरोपी नंबर 2) के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120बी सहपठित धारा 420 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (पीसी एक्ट) की धारा 11, 12, 13(2) सहपठित धारा 13(1)(बी) व (डी) के तहत चार्जशीट दाखिल की। विशेष बात यह थी कि चार्जशीट में अपीलकर्ता कंपनी के किसी भी निदेशक, अधिकारी या कर्मचारी को नामजद या आरोपी नहीं बनाया गया था।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, डॉ. आनंद ने अन्य कंपनियों की कम बोलियों के बावजूद सनोफी से खरीद को सही ठहराने के लिए दवाओं को ‘प्रोप्राइटरी’ (पेटेंट/विशेष स्वामित्व वाली) के रूप में गलत वर्गीकृत किया, प्रतिस्पर्धी बोलीदाताओं को बाहर रखा और न्यूनतम बोलीदाताओं को ऑर्डर देने से इनकार कर दिया। इससे बार्क को 3,53,361 रुपये का अनुचित नुकसान हुआ और आरोपियों को उतना ही अनुचित लाभ मिला। इसके अलावा, यह भी आरोप था कि डॉ. आनंद को कंपनी से बिना किसी प्रतिफल के विभिन्न बहानों के तहत 42,750 रुपये का अवैध परितोषण (रिश्वत) प्राप्त हुआ।

बेंगलुरु की विशेष सीबीआई अदालत द्वारा संज्ञान लिए जाने के बाद, सनोफी ने कार्यवाही रद्द कराने के लिए धारा 482 सीआरपीसी के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट का रुख किया। 15 फरवरी 2019 को हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने इरिडियम इंडिया टेलीकॉम लिमिटेड बनाम मोटोरोला इंक मामले पर भरोसा जताते हुए माना कि निदेशकों या कार्यप्रणाली के प्रभारियों को आरोपी बनाए बिना भी किसी कॉरपोरेट इकाई के खिलाफ मुकदमा विचारणीय है और आरोपों की सच्चाई ट्रायल से ही तय हो सकती है। इसके बाद कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें

सनोफी इंडिया लिमिटेड की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने दलील दी कि जिन अपराधों में मेन्स रिया (आपराधिक मंशा) साबित करना अनिवार्य होता है, वहां कंपनी पर मुकदमा चलाने के लिए उसके ‘ऑल्टर ईगो’ (समानांतर स्वरूप) या गवर्निंग माइंड पर मुकदमा चलाना आवश्यक है। हाउस ऑफ लॉर्ड्स के फैसले टेस्को सुपरमार्केट्स लिमिटेड बनाम नैट्रास का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि कॉरपोरेट आपराधिक दायित्व ‘पहचान के सिद्धांत’ (आइडेंटिफिकेशन प्रिंसिपल) पर आधारित है। इसके तहत केवल उन्हीं व्यक्तियों के जरिए कंपनी पर दायित्व तय किया जा सकता है जो कंपनी के ‘निर्देशनकारी मस्तिष्क और इच्छाशक्ति’ (डायरेक्टिंग माइंड एंड विल) का गठन करते हैं। वकील ने जोर देकर कहा कि चूंकि सीबीआई किसी ऐसे विशिष्ट व्यक्ति की पहचान करने और उसे आरोपी बनाने में विफल रही, जिसकी आपराधिक मंशा कंपनी पर थोपी जा सके या जिसने साजिश का कोई प्रत्यक्ष कार्य किया हो, इसलिए कानूनी अमूर्तता वाली कंपनी पर कोई आपराधिक दायित्व नहीं थोपा जा सकता।

इसके जवाब में, सीबीआई ने अपने जवाबी हलफनामे के जरिए दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट के इरिडियम इंडिया टेलीकॉम लिमिटेड बनाम मोटोरोला इंक और स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक बनाम प्रवर्तन निदेशालय के फैसले किसी कंपनी के कर्मचारियों को व्यक्तिगत रूप से पहचाने या आरोपी बनाए बिना भी कंपनी पर मुकदमा चलाने की अनुमति देते हैं। जांच एजेंसी ने कहा कि चार्जशीट में पर्याप्त मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं जो प्रथम दृष्टया यह साबित करते हैं कि कंपनी ने लोक सेवक से अनुचित लाभ प्राप्त किए और बदले में अवैध रिश्वत दी, जिससे एक विचारणीय साजिश स्थापित होती है।

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कॉरपोरेट आपराधिक दायित्व और एट्रिब्यूशन पर कोर्ट का विश्लेषण

कॉरपोरेट आपराधिक कानून की बुनियादी अवधारणाओं का परीक्षण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि एक कंपनी, जिसकी “न तो शाप देने के लिए कोई आत्मा होती है और न ही लात मारने के लिए कोई शरीर” (नो सोल टू डैम, नो बॉडी टू किक), वह खुद अपने दम पर न तो कोई भौतिक कार्य कर सकती है और न ही मानसिक स्थिति उत्पन्न कर सकती है; वह केवल अपने मानव प्रतिनिधियों के माध्यम से ही कार्य कर सकती है। पूर्ववर्ती भारतीय न्यायशास्त्र की पड़ताल करते हुए कोर्ट ने पाया कि ऐतिहासिक रूप से कॉरपोरेट मुकदमों के रास्ते में दो मुख्य बाधाएं थीं:

  1. अनिवार्य कारावास: स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2005) में संविधान पीठ ने असिस्टेंट कमिश्नर बनाम वेलियप्पा टेक्सटाइल्स लिमिटेड (2003) के फैसले को पलटते हुए माना था कि जहां किसी कानून में अनिवार्य कारावास और जुर्माना दोनों का प्रावधान है, वहां कंपनी को छूट नहीं मिल सकती। कानून किसी को असंभव कार्य करने के लिए बाध्य नहीं करता (लेक्स नॉन कोजिट ऐड इम्पॉसिबिलिया), इसलिए अदालतों के पास ऐसी कंपनियों पर केवल जुर्माने की सजा लगाने का न्यायिक विवेक है।
  2. कॉरपोरेट मेन्स रिया: इरिडियम इंडिया टेलीकॉम लिमिटेड बनाम मोटोरोला इंक (2011) में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि कंपनियों के पास भी आपराधिक मंशा (मेन्स रिया) हो सकती है और मंशा की आवश्यकता वाले अपराधों के लिए उन पर मुकदमा चलाया जा सकता है।

हालांकि, पीठ ने रेखांकित किया कि इरिडियम इंडिया ने केवल इस सवाल का समाधान किया था कि क्या किसी कंपनी के पास मेन्स रिया हो सकती है, लेकिन उसने इस दूसरे प्रश्न को पूरी तरह अनुत्तरित छोड़ दिया था कि भारतीय कानून के तहत ऐसी मेन्स रिया किसी कंपनी पर कैसे या किसके माध्यम से आरोपित (एट्रिब्यूट) की जाती है।

इस सैद्धांतिक शून्यता को भरने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अंग्रेजी कॉमन लॉ का विस्तार से अध्ययन किया। इसमें रेजिना बनाम ग्रेट नॉर्थ ऑफ इंग्लैंड रेलवे कंपनी में पब्लिक न्यूसेंस के फैसले, लेनार्ड्स कैरिंग कंपनी बनाम एशियाटिक पेट्रोलियम कंपनी में प्रतिपादित ‘डायरेक्टिंग माइंड एंड विल’ की अवधारणा, टेस्को सुपरमार्केट्स लिमिटेड बनाम नैट्रास में पहचान का सिद्धांत, मेरिडियन ग्लोबल फंड्स मैनेजमेंट एशिया लिमिटेड बनाम सिक्योरिटीज कमीशन में लॉर्ड हॉफमैन के एट्रिब्यूशन नियम, और हालिया द क्वीन बनाम बार्कलेज पीएलसी तथा द सीरियस फ्रॉड ऑफिस बनाम बार्कलेज पीएलसी के निर्णयों का गहन विश्लेषण शामिल रहा।

एट्रिब्यूशन का तीन-स्तरीय ढांचा (थ्री-स्टेज फ्रेमवर्क)

एक क्रमिक और पदानुक्रमित दृष्टिकोण अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह तय करने के लिए भारतीय कानून के तहत एक तीन-स्तरीय ढांचा तैयार किया कि किसी प्राकृतिक व्यक्ति (एक्स) के कार्य और मानसिक स्थिति को कब कंपनी का कार्य और मंशा माना जा सकता है:

  1. पहला चरण (एट्रिब्यूशन के प्राथमिक नियम): इस चरण में कंपनी के संवैधानिक दस्तावेजों (मेमोरेंडम और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन) या कंपनी लॉ के तहत निहित नियमों की जांच की जाती है, ताकि यह देखा जा सके कि क्या वे ‘एक्स’ को संबंधित कार्य करने की शक्ति प्रदान करते हैं।
  2. दूसरा चरण (एजेंसी और डेलिगेशन के सामान्य नियम): यदि संवैधानिक दस्तावेज मौन हैं, तो अदालत यह देखती है कि क्या वह कार्य करने की शक्ति ‘एक्स’ को स्पष्ट या निहित रूप से सौंपी (डेलिगेट की) गई थी, और क्या यह डेलिगेशन विवेक और स्वतंत्रता के साथ था। बिना पूर्ण विवेक के केवल अधीनस्थ प्रबंधकीय कार्य करना इस मानदंड को पूरा नहीं करता।
  3. तीसरा चरण (एट्रिब्यूशन के विशेष नियम): जहां पहले दो चरणों से कोई उत्तर नहीं मिलता, वहां अदालत यह देखती है कि क्या संबंधित दंडात्मक प्रावधान के उद्देश्य को पूरा करने के लिए एट्रिब्यूशन का कोई विशेष नियम गढ़ा जाना चाहिए:
    • संकीर्ण और स्पष्ट उद्देश्य वाले कानूनों के लिए: अदालत यह देखती है कि क्या उस कानूनी प्रावधान का उद्देश्य यह मानता है कि ‘एक्स’ के कृत्य और मानसिक स्थिति को कंपनी का माना जाए।
    • व्यापक उद्देश्य वाले कानूनों के लिए (जैसे धोखाधड़ी या धोखाधड़ी के सामान्य प्रावधान): अदालत यह मूल्यांकन करती है कि मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों में लागू होने वाला वैधानिक उद्देश्य क्या कोई विशेष नियम बनाने की मांग करता है।
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पीठ ने स्पष्ट किया कि यह ढांचा केवल एक दिशा में काम करता है—प्राकृतिक व्यक्ति से कंपनी की ओर—और यह उल्टी दिशा में लागू नहीं होता। इसके अलावा, यह ढांचा सख्त या पूर्ण दायित्व वाले विनियामक अपराधों पर लागू नहीं होता, और न ही उन कानूनों पर लागू होता है जिनमें पहले से ही एट्रिब्यूशन के विशिष्ट तंत्र या स्पष्ट प्रतिनिधिक दायित्व (वाइकेरियस लायबिलिटी) के प्रावधान मौजूद हैं।

पहचान और आरोपी न बनाए जाने पर कोर्ट के निष्कर्ष

धारा 482 सीआरपीसी के तहत मुख्य प्रश्न पर आते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि यदि किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान नहीं की गई है या उसे आरोपी नहीं बनाया गया है, तो कंपनी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को शुरुआती चरण में ही रद्द किया जाना चाहिए।

पहचान न होने (नॉन-आइडेंटिफिकेशन) के पहलू पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा: “चार्जशीट में प्रथम दृष्टया यह प्रकट होना चाहिए कि स्वयं कंपनी ने अपराध किया है, न कि यह भी अनिवार्य रूप से दर्ज हो कि उसने किस विशेष व्यक्ति के माध्यम से ऐसा किया। कंपनी की भूमिका उसके अपने आचरण, निर्णयों और लेन-देन के बयानों के जरिए बिना उस व्यक्ति का नाम लिए भी उजागर की जा सकती है जिसने उन्हें अंजाम दिया था। किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान न होना, अपने आप में आरोपों को अपराध में कंपनी की भूमिका उजागर करने से अक्षम नहीं बनाता है।”

पीठ ने स्पष्ट किया कि कई बार कंपनी की आपराधिक मंशा को किसी व्यक्ति विशेष के नाम से बांधे बिना भी आसपास के तथ्यों और लेन-देन से समझा जा सकता है: “इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि संबंधित प्राकृतिक व्यक्तियों और उनके विशिष्ट कृत्यों की पहचान की जाए और उनका उल्लेख किया जाए तो इससे मामले में मदद मिलेगी। लेकिन इसका संबंध मामले की मजबूती से है, न कि इस बात से कि आरोप किसी अपराध को प्रकट करते हैं या नहीं। एट्रिब्यूशन की वास्तविक भूमिका मेन्स रिया को निर्णायक रूप से स्थापित करने की है, और यह एक ऐसा कार्य है जिसे ट्रायल के दौरान किया जाना चाहिए।”

आरोपी न बनाए जाने (नॉन-अरैनमेंट) के पहलू पर कोर्ट ने अनीता हाडा बनाम गॉडफादर ट्रैवल्स एंड टूर्स प्राइवेट लिमिटेड और हिंदुस्तान यूनिलीवर लिमिटेड बनाम मध्य प्रदेश राज्य जैसे पुराने फैसलों के संदर्भ को स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि उन मामलों में कंपनी को आरोपी बनाना केवल इसलिए अनिवार्य शर्त थी क्योंकि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 141 और खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम की धारा 17 जैसे प्रावधान विशेष रूप से कंपनी द्वारा किए गए अपराधों के लिए व्यक्तियों के खिलाफ व्युत्पन्न या प्रतिनिधिक दायित्व (वाइकेरियस लायबिलिटी) तय करते हैं। इसके विपरीत, सामान्य आपराधिक कानून के तहत कॉरपोरेट आपराधिक दायित्व प्रत्यक्ष होता है, प्रतिनिधिक नहीं: “परिणामस्वरूप, इस दलील को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि किसी प्राकृतिक व्यक्ति को आरोपी न बनाए जाने के कारण हाईकोर्ट को अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर देनी चाहिए थी।”

कॉरपोरेट अभियोजन के लिए प्रारंभिक मानक

प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान या उसे आरोपी बनाए जाने को अनिवार्य पूर्व-शर्त न मानते हुए भी पीठ ने रेखांकित किया कि कंपनियों को मनगढ़ंत या बिना आधार के आरोपों का सामना करने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता। धारा 482 सीआरपीसी की जांच में टिके रहने के लिए शिकायत या चार्जशीट को एक स्पष्ट मानक पूरा करना होगा: “यद्यपि किसी प्राकृतिक व्यक्ति की पहचान और उसे आरोपी बनाना आवश्यक नहीं है, फिर भी आरोपों से कम से कम प्रथम दृष्टया यह प्रकट होना चाहिए कि: (i) किसी प्राकृतिक व्यक्ति या व्यक्तियों ने कंपनी की ओर से कार्य किया, (ii) ऐसा कार्य संबंधित अपराध के संदर्भ में है, और (iii) ऐसे कार्यों की परिस्थितियां मेन्स रिया के अस्तित्व को पूरी तरह से बेतुका या स्वाभाविक रूप से असंभव नहीं बनाती हैं।”

इस परीक्षण को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि चार्जशीट और साथ में संलग्न सामग्री प्रथम दृष्टया यह दर्शाती है कि प्राकृतिक व्यक्तियों ने बार्क टेंडरों के संबंध में सनोफी इंडिया लिमिटेड की ओर से कार्य किया था और आसपास की परिस्थितियां आपराधिक मंशा की संभावित मौजूदगी को दर्शाती हैं, जो कि शुरुआती स्तर पर कार्यवाही जारी रखने के लिए पर्याप्त है।

फैसला

यह निर्णय देते हुए कि कर्नाटक हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार करके कोई त्रुटि नहीं की है, सुप्रीम कोर्ट ने सनोफी इंडिया की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही, कोर्ट की रजिस्ट्री को इस फैसले की एक प्रति देश के सभी हाईकोर्ट्स को भेजने का निर्देश दिया गया।

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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: सनोफी इंडिया लिमिटेड बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4250/2026 (विशेष अनुमति याचिका (क्रिमिनल) संख्या 3597/2019 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस मनोज मिश्रा
निर्णय की तिथि: 7 सितंबर 2026

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