सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में लाने से जुड़ी याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई की तारीख वह केंद्र सरकार का औपचारिक रुख सामने आने के बाद ही तय करेगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने सोमवार को यह टिप्पणी उस समय की, जब वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने एक मामले का उल्लेख करते हुए सुनवाई के लिए नवंबर की तारीख मुकर्रर करने का अनुरोध किया। जयसिंह एक महिला याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुई थीं, जो अपने पति पर मुकदमा चलाने की मांग कर रही हैं। पीठ ने निर्देश दिया कि यह मामला पहले से ही बुधवार के लिए सूचीबद्ध है, इसलिए अदालत पहले केंद्र का पक्ष सुनेगी और उसी के आधार पर आगे का कार्यक्रम निर्धारित करेगी।
वकीलों ने अधूरी प्रक्रियाओं की ओर दिलाया ध्यान
अदालत में वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने दलील दी कि केंद्र सरकार ने अब तक केवल एक प्रारंभिक आपत्ति दर्ज कराई है और कोई ठोस जवाब दाखिल नहीं किया है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ताओं के बीच याचिकाओं का आदान-प्रदान भी बाकी है, जिससे यह तय नहीं हो सका है कि याचिकाओं में कौन से कानूनी मुद्दे समान हैं और कौन से अलग। इसी वजह से उन्होंने अदालत से नवंबर में किसी निश्चित तारीख की मांग की।
वहीं, एक अन्य याचिकाकर्ता की पैरवी कर रहीं वरिष्ठ वकील करुणा नंदी ने पीठ से आग्रह किया कि भविष्य की कोई भी तारीख इस तरह तय की जाए, जिससे सभी पक्षों को कानूनी औपचारिकताओं और जरूरी दस्तावेजों की प्रक्रिया पूरी करने का पर्याप्त समय मिल सके।
आपराधिक कानून के पुराने और नए प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन याचिकाओं में वैवाहिक बलात्कार से पति को मिलने वाली वैधानिक छूट की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। अब निरस्त हो चुकी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अपवाद के तहत, वयस्क पत्नी के साथ पति द्वारा बनाए गए गैर-सहमति वाले शारीरिक संबंध को बलात्कार नहीं माना जाता था।
1 जुलाई 2024 से आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य अधिनियम की जगह तीन नए कानून—भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम—लागू हो चुके हैं। हालांकि, भारतीय न्याय संहिता की धारा 63 के अपवाद 2 में भी इस छूट को बरकरार रखा गया है। इसके अनुसार, यदि पत्नी 18 वर्ष से कम उम्र की नहीं है, तो पति द्वारा उसके साथ बनाया गया संबंध बलात्कार के दायरे में नहीं आता। सुप्रीम कोर्ट ने 16 जनवरी 2023 को आईपीसी के इस अपवाद के खिलाफ दाखिल जनहित याचिकाओं पर केंद्र से जवाब मांगा था। बाद में भारतीय न्याय संहिता के संबंधित प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर भी केंद्र को नोटिस जारी किया गया। याचिकाओं का तर्क है कि यह कानूनी छूट पति द्वारा प्रताड़ित विवाहित महिलाओं के साथ भेदभाव करती है।
हाईकोर्ट के विभाजित और विरोधी फैसलों से जुड़ा मामला
शीर्ष अदालत के समक्ष दिल्ली हाईकोर्ट के 11 मई 2022 के विभाजित फैसले के खिलाफ दायर अपील भी शामिल है, जिसे एक महिला याचिकाकर्ता ने आगे बढ़ाया है। दिल्ली हाईकोर्ट के दो जजों की पीठ ने महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न होने के कारण मामले को सुप्रीम कोर्ट में अपील की अनुमति दी थी।
उस खंडपीठ के अध्यक्ष जस्टिस राजीव शकधर ने इस अपवाद को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की बात कही थी और टिप्पणी की थी कि कानून लागू होने के 162 वर्षों बाद भी विवाहित महिला की न्याय की गुहार न सुना जाना दुखद होगा। इसके विपरीत, जस्टिस सी. हरि शंकर ने इस प्रावधान को वैध ठहराते हुए कहा था कि यह असंवैधानिक नहीं है और एक ‘बोधगम्य भिन्नता’ (इंटेलिजिबल डिफ्रेंशिया) पर आधारित है।
दूसरी ओर, कर्नाटक हाईकोर्ट ने इससे पहले कहा था कि पत्नी के साथ बलात्कार और अप्राकृतिक यौन संबंधों के आरोपों से पति को अभियोजन से छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिले समानता के अधिकार के खिलाफ है।

