मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक बोर्ड को भंग करने की आरबीआई की शक्ति अनुच्छेद 243ZL की छह महीने की सीमा से बंधी नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 (बीआर एक्ट) की धारा 36AAA के तहत मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के निदेशक मंडल (बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स) को भंग (सुपरसीड) करने का भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का नियामक अधिकार संविधान के अनुच्छेद 243ZL(1) में तय छह महीने की समय-सीमा से सीमित नहीं है, और न ही यह निदेशकों के मूल निर्वाचित कार्यकाल की समाप्ति से बाधित होता है। जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए अदालत ने अभ्युदय को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड के पूर्व निदेशकों द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें आरबीआई द्वारा बोर्ड को भंग करने और प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) नियुक्त करने के फैसले को सही ठहराया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अभ्युदय को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड की स्थापना मूल रूप से 1960 में महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव सोसायटीज एक्ट के तहत हुई थी। बाद में 1965 में आरबीआई और सहकारिता आयुक्त की अनुमति से इसे बैंक में परिवर्तित कर दिया गया। वर्ष 1988 में भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 42(6)(a) के तहत इसे एक शेड्यूल्ड बैंक घोषित किया गया। इसके बाद, बैंकिंग विनियमन अधिनियम की धारा 45 के अंतर्गत आरबीआई द्वारा दिए गए निर्देशों के तहत गुजरात के दो और कर्नाटक के एक बैंक का इसमें विलय हुआ, जिसके चलते यह मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक बन गया।

मई 2019 में अपीलकर्ताओं को बैंक के शेयरधारकों द्वारा पांच साल के वैधानिक कार्यकाल के लिए निदेशक मंडल में चुना गया था। 24 नवंबर 2023 को आरबीआई ने बीआर एक्ट की धारा 56 के साथ पठित धारा 36AAA(1) और (2) के तहत प्रदत्त शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बैंक के बोर्ड को एक साल के लिए भंग कर दिया और सत्य प्रकाश पाठक को प्रशासक नियुक्त किया। आरबीआई ने यह कदम तीन मुख्य आधारों पर उठाया था:

  1. बैंक की वित्तीय स्थिति खतरनाक स्तर तक बिगड़ चुकी थी;
  2. जमाकर्ताओं (डिपॉजिटर्स) के हितों की रक्षा करने और बैंक को डूबने से बचाने के लिए बोर्ड को भंग करना आवश्यक था; और
  3. वित्तीय स्थिरता बहाल करने के लिए बैंक के कामकाज का प्रबंधन विशेषज्ञ पेशेवरों द्वारा कराया जाना जरूरी था।

पूर्व निदेशकों ने इस आदेश को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट में याचिकाएं लंबित रहने के दौरान ही 24 मई 2024 को अपीलकर्ताओं का पांच साल का वैधानिक कार्यकाल समाप्त हो गया। इसके बाद, 18 नवंबर 2024 को आरबीआई ने बोर्ड को भंग रखने की अवधि को 24 नवंबर 2024 से एक और साल के लिए बढ़ा दिया। उसी दिन हाईकोर्ट ने रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि बीआर एक्ट की धारा 36AAA संविधान के अनुच्छेद 243ZL और 243ZT के कारण निष्प्रभावी नहीं होती, राज्य सरकार से परामर्श का प्रावधान मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक पर लागू नहीं होता, और धारा 36AAA में प्राकृतिक न्याय (नेचुरल जस्टिस) के सिद्धांतों को शामिल नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। इस दौरान 7 नवंबर 2025 को आरबीआई ने एक तीसरा आदेश पारित कर 24 नवंबर 2025 से निलंबन की अवधि को एक और साल के लिए बढ़ा दिया।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता देवदत्त कामत ने दलील दी कि बीआर एक्ट की धारा 36AAA(1) के तहत बोर्ड को भंग रखने की अवधि निदेशक मंडल के निर्वाचित कार्यकाल से आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। उन्होंने कहा कि 24 मई 2024 को कार्यकाल समाप्त होने के बाद जब कोई बोर्ड अस्तित्व में ही नहीं बचा था, तो उसे भंग रखने के बाद के आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि लगातार अवधि बढ़ाना संविधान के भाग IXB (अनुच्छेद 243ZL और 243ZT) के जनादेश का उल्लंघन है और अनुच्छेद 243ZL(2) के तहत तुरंत चुनाव कराए जाने चाहिए थे। इसके अलावा उन्होंने कहा कि धारा 36AAA(1) के परंतु (प्रोवाइज़ो) के तहत परामर्श लेना अनिवार्य था जो नहीं किया गया, और पांडुरंग गणपति चौगुले बनाम विश्वासराव पाटिल मुर्गुर सहकारी बैंक लिमिटेड मामले में संविधान पीठ का फैसला यहां लागू नहीं होता क्योंकि वह मामला सरफेसी (SARFAESI) एक्ट से जुड़ा था।

आरबीआई की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता जयदीप गुप्ता ने इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि बीआर एक्ट की धारा 36AAA(7) के तहत प्रशासक को नए निदेशकों के चुनाव के लिए आम बैठक केवल तभी बुलानी होती है जब आरबीआई द्वारा तय निलंबन की अवधि समाप्त हो रही हो। इससे साफ है कि पूर्व बोर्ड के कार्यकाल का आरबीआई की नियामक शक्ति पर कोई असर नहीं पड़ता। उन्होंने बताया कि आरबीआई लिखित कारणों के आधार पर कुल मिलाकर अधिकतम पांच साल तक बोर्ड को भंग रख सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि अनुच्छेद 243ZL(1) का तीसरा प्रोवाइज़ो बैंकिंग कारोबार करने वाली सहकारी समितियों को मुख्य नियम से अलग करता है और उन पर बीआर एक्ट लागू करता है, जबकि अनुच्छेद 243ZT केवल राज्य कानूनों पर लागू होता है, केंद्र द्वारा संसद की सूची-I की प्रविष्टि 45 के तहत बनाए गए बैंकिंग कानूनों पर नहीं।

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प्रतिवादी संख्या 5 की ओर से पेश अधिवक्ता निनाद लाउड ने आरबीआई के रुख का समर्थन करते हुए कहा कि संविधान (सतानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2011 ने तीसरे प्रोवाइज़ो के जरिए बैंकिंग कारोबार करने वाली समितियों पर बीआर एक्ट के लागू होने को स्पष्ट रूप से सुरक्षित रखा है और इसका दायरा पांडुरंग गणपति चौगुले मामले में संविधान पीठ द्वारा पहले ही तय किया जा चुका है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने विचार के लिए दो प्रमुख मुद्दे तय किए: पहला, क्या बीआर एक्ट की धारा 36AAA(1) के तहत आरबीआई की बोर्ड को भंग करने की शक्ति संविधान के अनुच्छेद 243ZL(1) में दी गई छह महीने की सीमा से बंधी है? दूसरा, क्या यह निलंबन आदेश निदेशक मंडल के मूल निर्वाचित कार्यकाल की समाप्ति के बाद भी बढ़ाया जा सकता है?

अनुच्छेद 243ZL की संरचना का विश्लेषण करते हुए अदालत ने पाया कि भले ही मुख्य प्रावधान छह महीने की सामान्य सीमा तय करता है, लेकिन इसका तीसरा प्रोवाइज़ो यह स्पष्ट करता है कि बैंकिंग कारोबार करने वाली सहकारी समितियों पर बीआर एक्ट के प्रावधान “भी लागू होंगे”। संदर्भ द्वारा समावेशन (डॉक्ट्रिन ऑफ इनकॉर्पोरेशन बाय रेफरेंस) के सिद्धांत को रेखांकित करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि “भी लागू होंगे” शब्द का इस्तेमाल जोड़ने वाले (एडिटिव) अर्थ में किया गया है, जो धारा 36AAA सहित पूरे बीआर एक्ट को एक स्वतंत्र प्रावधान के रूप में संविधान के भाग IXB में शामिल करता है।

पीठ ने अनुच्छेद 243ZL(1) के चौथे प्रोवाइज़ो पर भी ध्यान आकर्षित किया, जो बैंकिंग सहकारी समितियों के लिए इस अवधि को छह महीने से बढ़ाकर एक साल करता है, लेकिन स्पष्ट रूप से मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव समितियों को इस छूट से बाहर रखता है। इस पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:

“किसी भी अपवर्जन (एक्सक्लूजन) का मूल स्वभाव यह मानकर चलता है कि पहले कोई समावेशन (इनक्लूजन) मौजूद था; संसद किसी प्रोवाइज़ो से ऐसी चीज को कभी बाहर नहीं करती जो शुरू से उसके दायरे में आ ही नहीं सकती थी।”

बैंकिंग व्यवस्था में जुड़े लोकहित को रेखांकित करते हुए अदालत ने टिप्पणी की:

“बैंकिंग, सामान्य व्यावसायिक या सहकारी गतिविधियों से अलग, एक विशिष्ट दर्जे के लोकहित से जुड़ी है: यह वह माध्यम है जिसके जरिए जमाकर्ताओं की बचत—जो अक्सर साधारण आय वाले लोग होते हैं और बैंकिंग व्यवस्था में अपना विश्वास तथा जीवन भर की कमाई लगाते हैं—रखी और उपयोग की जाती है।”

कोर्ट ने सख्त नियामक व्यवस्था की जरूरत पर बल देते हुए कहा:

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“अनुच्छेद 243ZL(1) के तीसरे प्रोवाइज़ो का ऐसा अर्थ निकालना जिससे मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक बीआर एक्ट के दायरे से बाहर हो जाएं और आरबीआई के नियामक हाथ महज छह महीने की कठोर अवधि तक सीमित रह जाएं—जो संकटग्रस्त बैंक को पुनर्जीवित करने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त है—जमाकर्ताओं की सुरक्षा और बैंकिंग अनुशासन को एक संवैधानिक प्रोवाइज़ो की संकीर्ण और तकनीकी व्याख्या के आगे गौण कर देना होगा।”

अदालत ने आगे माना:

“हमारा यह सुविचारित मत है कि ऐसी व्याख्या को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो जमाकर्ताओं की रक्षा करने और बैंकिंग प्रणाली में वित्तीय अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य को पूरा करे, न कि उस व्याख्या को जो नियामक अधिकार को खंडित करे और एक कृत्रिम रूप से सीमित अवधि समाप्त होते ही मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंकों को पर्यवेक्षी शून्य (सुपरवाइजरी वैक्यूम) में धकेल दे।”

दूसरे मुद्दे पर पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 36AAA(1) के तहत आरबीआई समय-समय पर निलंबन को बढ़ा सकता है, जिसकी कुल अधिकतम सीमा पांच वर्ष है। धारा 36AAA(7) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा कि प्रशासक को नए चुनाव कराने के लिए आम बैठक तभी बुलानी होती है जब आरबीआई द्वारा निर्धारित अवधि समाप्त हो रही हो। इसलिए, निदेशकों का पांच साल का कार्यकाल समाप्त हो जाने से आरबीआई के आदेश पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, जब तक कि कुल अवधि पांच साल की वैधानिक सीमा के भीतर हो।

पूर्व परामर्श के संबंध में अपीलकर्ताओं की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 36AAA(1) के प्रोवाइज़ो के तहत राज्य सरकार से परामर्श का नियम केवल राज्य के सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के पास पंजीकृत बैंकों पर लागू होता है, मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव बैंकों पर नहीं।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि न पाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरबीआई के आदेशों को वैध माना और पूर्व निदेशकों की दोनों अपीलों को बिना किसी खर्च के आदेश के खारिज कर दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संदीप एस. घांडत एवं अन्य बनाम भारतीय रिजर्व बैंक एवं अन्य

वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 5351-5352 / 2025

पीठ: जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे

निर्णय की तिथि: 03 सितंबर 2026

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