सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने झारखंड हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है, जिसमें बिजली वितरण निगम (जेबीवीएनएल) द्वारा कैप्टिव बिजली आपूर्तिकर्ताओं के खिलाफ शुरू की गई कार्यवाही में प्रतिवादी ‘एनर्जी वॉचडॉग’ को भी सुने जाने की अनुमति दी गई थी। शीर्ष अदालत ने विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) का निस्तारण करते हुए स्पष्ट किया कि मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों में हाईकोर्ट द्वारा अपनाया गया यह अंतरिम उपाय संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत त्रुटिपूर्ण नहीं माना जा सकता। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष या विद्युत अधिनियम, 2003 के तहत तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप के अंतिम दायरे पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
विवाद की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता संख्या 1, मैसर्स अमलगम स्टील्स एंड पावर लिमिटेड, ने 17 मई 2012 को झारखंड बिजली वितरण निगम लिमिटेड (जेबीवीएनएल) के साथ अपने कैप्टिव पावर प्लांट से सरप्लस बिजली याचिकाकर्ता संख्या 2 को आपूर्ति करने के लिए एक कैप्टिव पावर प्लांट (सीपीपी) समझौता किया था। इस समझौते का नवीनीकरण वर्ष 2017 और 2023 में किया गया।
इसके बाद, प्रतिवादी संख्या 1 ‘एनर्जी वॉचडॉग’ ने 15 अप्रैल 2024 को झारखंड सरकार के ऊर्जा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव को एक शिकायत भेजी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्ता संख्या 2, बिजली नियम, 2005 के नियम 3 के अनुसार वैध ‘कैप्टिव यूजर’ का दर्जा रखे बिना ही याचिकाकर्ता संख्या 1 द्वारा स्थापित कैप्टिव पावर जनरेशन यूनिट से उत्पादित बिजली का उपभोग कर रहा है। एनर्जी वॉचडॉग ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 135 के तहत कार्रवाई की मांग की। इस शिकायत के आधार पर झारखंड सरकार और जेबीवीएनएल ने 28 जून 2024 को मामले में तथ्य-अन्वेषण (फैक्ट-फाइंडिंग) जांच शुरू की।
एनर्जी वॉचडॉग ने बाद में रांची स्थित झारखंड हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (डब्ल्यू.पी. (पीआईएल) संख्या 3347/2025) दायर की। याचिका में मांग की गई कि ओपन एक्सेस मंजूरी के बिना और वैधानिक कैप्टिव शर्तों को पूरा किए बिना दोनों कंपनियों के बीच बिजली आपूर्ति को अवैध और अनधिकृत घोषित किया जाए। इसके साथ ही विस्तृत जांच कराने और सरकारी बिजली वितरण कंपनी को हुए वित्तीय नुकसान की वसूली के निर्देश देने का अनुरोध किया गया।
इस बीच, 26 अगस्त 2025 को जेबीवीएनएल ने याचिकाकर्ताओं को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए आरोप लगाया कि उन्होंने सीपीपी समझौते के नियमों का उल्लंघन किया है, बिना सहमति के बिजली की आपूर्ति की है और जेबीवीएनएल के ‘पहले इनकार के अधिकार’ (राइट ऑफ फर्स्ट रिफ्यूजल) की अवहेलना की है। उसी दिन जेबीवीएनएल ने याचिकाकर्ता संख्या 1 से 176.74 करोड़ रुपये और याचिकाकर्ता संख्या 2 से 108.17 करोड़ रुपये के क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज की मांग करते हुए डिमांड नोटिस भी जारी कर दिए।
याचिकाकर्ता संख्या 1 ने जनहित याचिका की विचारणीयता (मेंटेनेबिलिटी) पर प्रारंभिक आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट में अंतरिम आवेदन दायर किया। 5 फरवरी 2026 को अपने अंतरिम आदेश में हाईकोर्ट ने माना कि जेबीवीएनएल के हलफनामे से प्रथम दृष्टया आरोपों में दम नजर आता है, इसलिए याचिका विचारणीय है। हाईकोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि भले ही एनर्जी वॉचडॉग जेबीवीएनएल और याचिकाकर्ता के बीच हुए अनुबंध का पक्षकार नहीं है, फिर भी न्याय के हित में यह बेहतर होगा कि कारण बताओ नोटिस के तहत लंबित कार्यवाही में याचिकाकर्ताओं के साथ-साथ एनर्जी वॉचडॉग को भी सुना जाए। इसी अंतरिम निर्देश के खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे।
शीर्ष अदालत में पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. ए.एम. सिंघवी ने तर्क दिया कि एनर्जी वॉचडॉग समझौते का कोई पक्षकार नहीं है और उसे कोई कानूनी क्षति नहीं पहुंची है। उन्होंने कहा कि संगठन ‘पीड़ित व्यक्ति’ के दायरे में नहीं आता, इसलिए उसे रिट याचिका दायर करने का कोई अधिकार (लोकस) नहीं है। डॉ. सिंघवी ने यह भी दलील दी कि विद्युत अधिनियम, 2003 एक व्यापक और संपूर्ण वैधानिक ढांचा है, जो बिजली क्षेत्र में विनियमन, अधिनिर्णय और अनुपालन को नियंत्रित करता है। हाईकोर्ट कानून द्वारा न सोची गई एक त्रिपक्षीय प्रक्रिया शुरू करके और तीसरे पक्ष को जेबीवीएनएल की कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति देकर वैधानिक ढांचे का विस्तार नहीं कर सकता था। उन्होंने कहा कि कार्यवाही पूरी होने के बाद यदि संगठन असंतुष्ट रहता है, तो वह कानून सम्मत उपाय अपना सकता है। अपने तर्कों के समर्थन में उन्होंने अयाउबखान नूरखान पठान बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य, डी.एन. जीवराज बनाम मुख्य सचिव, कर्नाटक सरकार व अन्य, और कुंगा नीमा लेप्चा व अन्य बनाम सिक्किम राज्य व अन्य के फैसलों का हवाला दिया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 1 की ओर से अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दलील दी कि याचिकाकर्ताओं ने क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज का भुगतान नहीं किया था और एनर्जी वॉचडॉग की छह शिकायतों के बाद ही यह जांच शुरू हुई थी। उन्होंने बताया कि मांग झारखंड ओपन एक्सेस नियमों के तहत निकाली गई है, इसलिए हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश में किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
विद्युत क्षेत्र के नियामक ढांचे का विश्लेषण करते हुए पीठ ने पीटीसी इंडिया लिमिटेड बनाम केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग में संविधान पीठ के उस फैसले का उल्लेख किया, जिसमें माना गया था कि विद्युत अधिनियम बिजली से जुड़े सभी मामलों के लिए एक संपूर्ण कोड है। पीठ ने सदर्न पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ऑफ आंध्र प्रदेश लिमिटेड व अन्य बनाम ग्रीन इंफ्रा विंड सॉल्यूशंस लिमिटेड व अन्य का भी संदर्भ दिया, जिसमें दोहराया गया था कि बिजली क्षेत्र के पुनर्गठन और केंद्रीय तथा राज्य विनियामक आयोगों के गठन के बाद विनियामक निकायों से बाहर कोई अवशिष्ट शक्ति नहीं बचती।
अदालत ने अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए रेखांकित किया:
- धारा 79 केंद्रीय आयोग के कार्यों को तय करती है, जिसमें धारा 79(3) शक्तियों के प्रयोग में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का निर्देश देती है।
- धारा 86 राज्य आयोग के कार्यों से संबंधित है, जहां धारा 86(1)(एफ) लाइसेंसधारियों और उत्पादक कंपनियों के बीच विवादों के निपटारे का अधिकार देती है, तथा धारा 86(3) पारदर्शिता बरतने का आदेश देती है।
- धारा 94(3) उपयुक्त आयोग को यह अधिकार देती है कि वह अपने समक्ष कार्यवाही में उपभोक्ताओं के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए किसी भी व्यक्ति को अधिकृत कर सकता है।
पीठ ने कहा कि अंतिम आदेश पारित करते समय हाईकोर्ट के लिए इस वैधानिक विनियामक व्यवस्था पर विचार करना आवश्यक है।
हाईकोर्ट के विवादित अंतरिम निर्देश पर विचार करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा: “मामले पर विस्तार से विचार करने के बाद हमारी यह राय है कि प्रतिवादी संख्या 1 एनर्जी वॉचडॉग द्वारा हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत तथ्यों से हाईकोर्ट को यह आभास हुआ प्रतीत होता है कि प्रतिवादी संख्या 1 और 2 के खिलाफ जेबीवीएनएल द्वारा की जाने वाली जांच में सब कुछ ठीक नहीं है। हाईकोर्ट ने उन परिस्थितियों का विस्तार से उल्लेख किया है जिनमें सही समय पर प्रतिवादी संख्या 1 और 2 की लंबी शिकायत के बावजूद याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई थी।”
अनुबंध की गोपनीयता (प्रिविटी ऑफ कॉन्ट्रैक्ट) और याचिकाकर्ता की आपत्तियों पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा: “हम इस तथ्य से पूरी तरह अवगत हैं कि जेबीवीएनएल द्वारा याचिकाकर्ताओं के खिलाफ सीपीपी समझौते के उल्लंघन के लिए कार्यवाही शुरू की गई है, और प्रतिवादी संख्या 1 उक्त समझौते का पक्षकार नहीं है। हालांकि, मामले के विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों में हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि याचिकाकर्ताओं के अलावा किसी अन्य पक्ष के माध्यम से भी जेबीवीएनएल के संज्ञान में पूरे तथ्य लाना आवश्यक है ताकि एक उचित निर्णय पर पहुंचा जा सके। हाईकोर्ट ने मामले के विशिष्ट तथ्यों में एक अंतरिम उपाय अपनाना अनिवार्य पाया, जिसे हमारी राय में त्रुटिपूर्ण नहीं कहा जा सकता और जिस पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत इस स्तर पर किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।”
जेबीवीएनएल की आगामी जांच के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए पीठ ने निर्देश दिया: “हमें पूरा विश्वास है कि जेबीवीएनएल पूरी सावधानी और विचार-विमर्श के बाद एनर्जी वॉचडॉग द्वारा पेश की जाने वाली सामग्री के आधार पर अपना स्वतंत्र निर्णय लेगा। जेबीवीएनएल मौखिक सुनवाई के इस निर्देश को किसी अदालत या न्यायाधिकरण की तरह नहीं बदलेगा, बल्कि आवश्यक कार्रवाई शुरू करने में सक्षम होने के लिए सूचना एकत्र करने के साधन के रूप में इसका उपयोग करेगा।”
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और स्पष्ट किया कि उसने विवाद के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। पीठ ने निर्देश दिया कि अंतिम सुनवाई के समय हाईकोर्ट सभी पहलुओं पर विचार करेगा, जिसमें विद्युत अधिनियम के तहत कार्यवाही में तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप का दायरा और सीमा भी शामिल है। इन स्पष्टीकरणों के साथ शीर्ष अदालत ने विशेष अनुमति याचिका और सभी लंबित आवेदनों का निस्तारण कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मैसर्स अमलगम स्टील्स एंड पावर लिमिटेड व अन्य बनाम एनर्जी वॉचडॉग व अन्य
वाद संख्या: विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 10538/2026
पीठ: जस्टिस पामिडीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 3 सितंबर 2026

