देश में शिक्षक शिक्षा के विनियामक ढांचे को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस पमिदीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे शामिल थे, ने निर्णय दिया कि नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन (एनसीटीई) और उसकी कार्यकारी समिति के पास शिक्षक शिक्षण संस्थानों (टीईआई) से वार्षिक परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट (पीएआर) अनिवार्य रूप से मांगने का पर्याप्त सांविधिक और प्रासंगिक अधिकार है। दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ के आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 22 सितंबर 2019 को एनसीटीई के सदस्य सचिव द्वारा जारी सार्वजनिक नोटिस पूरी तरह से वैध और कानूनी था। अदालत ने रेखांकित किया कि संवैधानिक अदालतों को ऐसा संकीर्ण दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए जिससे किसी नियामक के वैधानिक कार्यों में बाधा उत्पन्न हो।
मामले की पृष्ठभूमि
विवाद की शुरुआत 22 सितंबर 2019 को एनसीटीई कार्यकारी समिति के सदस्य सचिव संजय अवस्थी द्वारा जारी एक सार्वजनिक नोटिस से हुई थी। इस नोटिस के जरिए सभी मान्यता प्राप्त शिक्षक शिक्षण संस्थानों के लिए शैक्षणिक सत्र 2018-2019 की वार्षिक पीएआर निर्दिष्ट ऑनलाइन पोर्टल पर जमा करना अनिवार्य किया गया था। नोटिस में केंद्र और राज्य सरकार के संस्थानों के लिए 5,000 रुपये प्रति संस्थान तथा अन्य सभी श्रेणियों के संस्थानों के लिए 15,000 रुपये प्रति संस्थान का शुल्क भी निर्धारित किया गया था। साथ ही चेतावनी दी गई थी कि रिपोर्ट जमा न करने पर नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन एक्ट, 1993 (एनसीटीई एक्ट) की धारा 17(1) के तहत कार्रवाई की जाएगी।
इससे पूर्व, एनसीटीई की जनरल बॉडी ने अपनी 46वीं बैठक में मान्यता के वार्षिक नवीनीकरण की व्यवस्था को मंजूरी दी थी। हालांकि, विभिन्न हाईकोर्टों में इस निर्णय के खिलाफ बड़े पैमाने पर मुकदमेबाजी शुरू हो गई। इसके बाद 5 फरवरी 2019 को आयोजित 48वीं बैठक में काउंसिल ने इस पर पुनर्विचार किया। काउंसिल ने पाया कि वार्षिक नवीनीकरण व्यवस्था व्यावहारिक नहीं है, इसलिए इसके स्थान पर मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (एमआईएस) स्थापित करने के उद्देश्य से पीएआर व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया। इसके तहत एनसीटीई को एक प्रोफार्मा तैयार कर आगे की कार्यवाही करने के लिए अधिकृत किया गया था।
संस्थानों के एक एसोसिएशन ने इस सार्वजनिक नोटिस को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल पीठ ने याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपील स्वीकार करते हुए नोटिस को रद्द कर दिया। खंडपीठ का मानना था कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि नोटिस के साथ संलग्न प्रोफार्मा काउंसिल के समक्ष रखा गया था या उसे काउंसिल ने अनुमोदित किया था। इसके अलावा, खंडपीठ ने यह भी कहा कि धारा 12(के) के तहत काउंसिल की शक्ति धारा 27 के तहत सदस्य सचिव को सौंपे जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
पक्षों की दलीलें
प्रतिवादियों का मुख्य तर्क था कि एनसीटीई एक्ट के तहत केवल काउंसिल ही इस प्रकार का विनियामक नोटिस जारी और लागू करने के लिए अधिकृत है। जनरल बॉडी की बैठक के कार्यवृत्त का हवाला देते हुए उन्होंने दलील दी कि कार्यकारी समिति के पास ऐसा नोटिस जारी करने का कोई अधिकार नहीं था, क्योंकि काउंसिल के निर्णय में स्पष्ट था कि प्रोफार्मा काउंसिल द्वारा ही तैयार और अनुमोदित किया जाना था।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मूल प्रश्न था कि शिक्षक शिक्षा प्रणाली के योजनाबद्ध और समन्वित विकास के उद्देश्य से क्या एनसीटीई के विनियामक अधिकारों के अंतर्गत मान्यता प्राप्त संस्थानों से वार्षिक पीएआर मांगना वैधानिक दायरे में आता है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के सीमित दृष्टिकोण को अस्वीकार करते हुए टिप्पणी की: “जब किसी सांविधिक नियामक द्वारा शक्तियों के प्रयोग की जांच के लिए हाईकोर्ट के समक्ष मामला आता है, तो दृष्टिकोण यह देखना होना चाहिए कि क्या प्राधिकरण का कामकाज किसी अनिवार्य प्रावधान का उल्लंघन करता है या उसने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है।”
संवैधानिक और कानूनी ढांचे का परीक्षण करते हुए अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत प्रारंभिक शिक्षा के मौलिक अधिकार और बच्चों के मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (आरटीई एक्ट) के अंतर्संबंधों को रेखांकित किया। दिनेश बिवाजी आस्तिकार बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने याद दिलाया कि उसमें पांच दायित्व धारक तय किए गए थे—उपयुक्त सरकारें, स्थानीय प्राधिकारी, पड़ोसी स्कूल, माता-पिता/अभिभावक और प्रारंभिक स्कूल शिक्षक। सुप्रीम कोर्ट ने इसमें दो और दायित्व धारक जोड़े: शिक्षक तैयार करने वाले संस्थान (टीईआई) छठे दायित्व धारक हैं और एनसीटीई सातवां दायित्व धारक है।
अदालत ने टिप्पणी की: “हमें यह घोषित करने में कोई संकोच नहीं है कि काउंसिल और इसके साथ गठित निकायों, जैसे कि कार्यकारी समिति और क्षेत्रीय समितियों द्वारा निभाए जाने वाले कर्तव्य संभवतः सभी दायित्व धारकों में सबसे उच्च हैं।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि एनसीटीई एक्ट की धारा 19 के तहत कार्यकारी समिति ही वह निकाय है जो वास्तव में काउंसिल के कार्यों का निष्पादन करती है। इसके अतिरिक्त, पीएआर मांगने का अधिकार सीधे तौर पर अधिनियम की धारा 12(के) से प्राप्त होता है, जो काउंसिल को मान्यता प्राप्त संस्थानों पर जवाबदेही तय करने के लिए उपयुक्त प्रदर्शन मूल्यांकन प्रणाली विकसित करने का अधिकार देती है।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि जब काउंसिल ने वार्षिक नवीनीकरण के स्थान पर पीएआर लागू करने का निर्णय ले लिया था, तो उस नीतिगत फैसले को धरातल पर उतारना कार्यकारी समिति और उसके सदस्य सचिव का कर्तव्य था। अदालत ने कहा: “हम यह समझने में असमर्थ हैं कि देश में शिक्षक शिक्षा प्रणाली के योजनाबद्ध और समन्वित विकास के लिए सशक्त एक सांविधिक निकाय को टीईआई से परफॉर्मेंस अप्रेजल रिपोर्ट मांगने से कैसे रोका जा सकता है। हमारी राय में, कानून के तहत किसी विशिष्ट अधिकार के बिना भी, ऐसा विनियामक कदम हमेशा एक नियामक के कर्तव्यों और कार्यों के लिए प्रासंगिक और सहायक हो सकता है।”
पीठ ने यह भी जोड़ा कि नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) द्वारा स्वयं एनसीटीई का परफॉर्मेंस ऑडिट किया जाता है, ऐसे में एनसीटीई द्वारा अपने अधीनस्थ हितधारकों से मूल्यांकन रिपोर्ट मांगना स्वाभाविक और प्रासंगिक है। विजय राजमोहन बनाम सीबीआई के फैसले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि प्रशासनिक कानून में जवाबदेही एक अनिवार्य सिद्धांत है, जिसके तीन प्रमुख घटक हैं—जिम्मेदारी, जवाबदेही और प्रवर्तनीयता।
रिपोर्ट के साथ लिए जाने वाले शुल्क पर अदालत ने स्पष्ट किया कि यह वास्तव में प्रक्रिया शुल्क (प्रोसेस फीस) के स्वरूप में है, जो किसी भी नियामक के पास उपलब्ध प्रासंगिक और सहायक शक्तियों का ही हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि काउंसिल और उसकी कार्यकारी समिति ने पूरी तरह से अपने अधिकार क्षेत्र के भीतर कार्य किया है और सदस्य सचिव द्वारा जारी 22 सितंबर 2019 का सार्वजनिक नोटिस पूरी तरह से वैध है। शीर्ष अदालत ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा एलपीए संख्या 190/2021 में पारित 13 मार्च 2023 के फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने इस मामले में वाद व्यय को लेकर कोई आदेश नहीं दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: द नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन बनाम एसोसिएशन ऑफ एनसीटीई अप्रूव्ड कॉलेजेस ट्रस्ट व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या /2026 (विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 11756/2023 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस पमिदीघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 03 सितंबर, 2026

