वैवाहिक विवाद अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं; ट्रायल कोर्ट के फैसले को त्रुटिपूर्ण पाए बिना हाईकोर्ट बरी करने का आदेश नहीं पलट सकता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वैवाहिक जीवन में होने वाले सामान्य घरेलू विवाद अपने आप में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 107 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने (धारा 306) का अपराध नहीं बनते। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा पति को बरी किए जाने के निर्णय को पलटते हुए उसे क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने का दोषी ठहराया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि जब तक अपीलीय अदालत यह निष्कर्ष दर्ज न करे कि साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण या असंभव था, तब तक बरी किए जाने के आदेश को उलटा नहीं जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जनवरी 2008 में हुए एक विवाह से जुड़ा है। विवाह के कुछ समय बाद पीड़िता के परिवार की ओर से आरोप लगाए गए कि ससुराल में सास और ननदों द्वारा उसे परेशान किया जाता था। मई 2008 में पीड़िता के पिता की बरसी के दौरान दोनों पक्षों के बीच विवाद होने की बात भी सामने आई। जुलाई 2009 में पीड़िता ने एक बच्ची को जन्म दिया, जिसके बाद मायके पक्ष ने आरोप लगाया कि उसके साथ प्रताड़ना जारी रही और उसे उचित भोजन भी नहीं दिया जाता था।

16 नवंबर 2009 को पीड़िता ने अपने ससुराल में कीटनाशक (एंडोसल्फान) पी लिया। पति उसे तत्काल इलाज के लिए अस्पताल ले गया, जहां उपचार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर पति, उसकी मां और बहनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 498-ए और 306 के तहत चार्जशीट दाखिल की।

ट्रायल कोर्ट (सत्र न्यायालय) ने रिश्तेदारों, पड़ोसियों, मेडिकल ऑफिसर और एक फार्मासिस्ट सहित कुल 15 अभियोजन गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद 10 जून 2010 को सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। ट्रायल कोर्ट का मानना था कि दहेज की मांग और क्रूरता के आरोप साबित नहीं हो सके, गवाहों के बयान सामान्य और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे, पीड़िता के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं था और पति ने उसे बचाने के लिए तुरंत चिकित्सीय सहायता का प्रबंध किया था।

राज्य सरकार की अपील पर हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सास और ननदों को बरी रखने का फैसला तो बरकरार रखा, लेकिन पति को बरी करने का आदेश पलट दिया। हाईकोर्ट ने पति को आईपीसी की धारा 498-ए और 306 के तहत दोषी ठहराते हुए चार साल के कठोर कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई। इस सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।

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सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें

अपीलकर्ता (पति) की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एन. गोबर्धन ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के विस्तृत तर्कों और निष्कर्षों पर विचार किए बिना बरी किए जाने का फैसला पलट कर भारी चूक की है। उन्होंने कहा कि जिरह के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में कई बड़े सुधार और विरोधाभास सामने आए थे। इसके अलावा, घटना के तुरंत बाद चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने में पति के तत्पर आचरण को हाईकोर्ट ने पूरी तरह अनदेखा कर दिया। वरिष्ठ वकील ने शिव स्वरूप बनाम किंग एम्परर, भुवनेश्वर मंडल बनाम बिहार राज्य, यूपी राज्य बनाम सम्मन दास और मदन मोहन सिंह बनाम गुजरात राज्य जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जो आत्महत्या के लिए उकसाने या दुष्प्रेरण को दर्शाता हो।

वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता विक्रांत नारायण वासुदेवा ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि पीड़िता के परिजनों ने लगातार प्रताड़ना और दुर्व्यवहार के बारे में स्पष्ट गवाही दी है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि मामूली विरोधाभासों से अभियोजन का मामला कमजोर नहीं होता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 113ए के तहत लागू होने वाले वैधानिक अनुमान का खंडन आरोपी पक्ष नहीं कर सका।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी निष्कर्ष

फैसला सुनाते हुए जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर ने दर्ज किया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों ने केवल सामान्य और अस्पष्ट आरोप लगाए हैं, तथा वे प्रताड़ना या गैरकानूनी दहेज मांग की किसी विशिष्ट घटना को साबित करने में विफल रहे।

अदालत ने पाया कि जिरह के दौरान पीड़िता की मां ने स्वीकार किया कि उसने कभी किसी अधिकारी के समक्ष प्रताड़ना की शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। उन्होंने यह भी माना कि जब भी दंपति मायके आता था, वे खुश दिखते थे। इसी तरह पीड़िता की बहनों ने भी माना कि ससुराल जाने पर उनका अच्छा स्वागत-सत्कार किया जाता था।

स्वतंत्र गवाहों के बयानों ने भी अभियोजन की कहानी को कमजोर किया। पड़ोस में रहने वाली एक महिला गवाह ने बताया कि परिवार की समाज में अच्छी प्रतिष्ठा थी और उसने कभी दोनों के बीच कोई झगड़ा नहीं सुना था। गवाह के अनुसार पीड़िता ने गलती से जहर पी लिया था और पति ने उसे बचाने का पूरा प्रयास किया। एक स्थानीय फार्मासिस्ट ने अदालत को बताया कि घटना की सुबह 9 बजे पति घबराया हुआ उसकी दुकान पर आया और पत्नी की तबीयत खराब होने की बात कहकर मदद मांगी। जब घर जाकर देखा गया तो वहां कीटनाशक की खाली शीशी मिली, जिसके बाद फार्मासिस्ट की सलाह पर पति ने तुरंत गाड़ी का इंतजाम कर पत्नी को अस्पताल पहुंचाया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने ऐसे तथ्यों के आधार पर दोषसिद्धि तय की जिनका रिकॉर्ड में कोई ठोस आधार नहीं था, जैसे कि पीड़िता को घसीटने या गाली-गलौज करने के आरोप, जो गवाहों ने पुलिस को दिए बयानों में कभी नहीं कहे थे। बरी किए जाने के फैसलों के खिलाफ अपीलों के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए पीठ ने शिव स्वरूप बनाम किंग एम्परर (प्रिवी काउंसिल) और भुवनेश्वर मंडल बनाम बिहार राज्य के ऐतिहासिक सिद्धांत को उद्धृत किया:

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“संहिता की धारा 417, 418 और 423 हाईकोर्ट को उस साक्ष्य की व्यापक समीक्षा करने की पूरी शक्ति देती हैं जिसके आधार पर बरी करने का आदेश दिया गया था, और यह निष्कर्ष निकालने की भी शक्ति देती हैं कि उस साक्ष्य पर बरी करने का आदेश उलट दिया जाना चाहिए। जब तक कि संहिता में स्पष्ट रूप से न कहा गया हो, इस शक्ति पर कोई सीमा नहीं लगाई जानी चाहिए। लेकिन संहिता द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हुए और तथ्यों पर अपने निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले, हाईकोर्ट को हमेशा ऐसे मामलों को उचित महत्व और विचार देना चाहिए जैसे: (1) गवाहों की विश्वसनीयता के संबंध में ट्रायल जज का दृष्टिकोण; (2) आरोपी के पक्ष में निर्दोषिता का अनुमान, एक ऐसा अनुमान जो ट्रायल में बरी होने के तथ्य से बिल्कुल भी कमजोर नहीं होता; (3) किसी भी संदेह का लाभ पाने का आरोपी का अधिकार; और (4) उस जज द्वारा निकाले गए तथ्यात्मक निष्कर्ष में हस्तक्षेप करने में अपीलीय अदालत का संयम, जिसे गवाहों को प्रत्यक्ष रूप से देखने का अवसर मिला था।”

उत्तर प्रदेश राज्य बनाम सम्मन दास के निर्णय का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया:

“…बरी किए जाने के खिलाफ अपीलों में कुछ बुनियादी नियमों को हमेशा ध्यान में रखा जाना चाहिए। पहला, आरोपी के पक्ष में निर्दोषिता का अनुमान होता है जिसे ध्यान में रखना आवश्यक है, खासकर जब आरोपी को निचली अदालत द्वारा बरी कर दिया गया हो; दूसरा, यदि मामले में दो दृष्टिकोण संभव हैं, तो आरोपी के अनुकूल दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए; तीसरा, ट्रायल जज द्वारा बरी किए जाने की स्थिति में, अपीलीय अदालत को इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि ट्रायल जज के पास गवाहों के हाव-भाव को देखने का लाभ था; और चौथा, आरोपी संदेह के लाभ का हकदार है…”

आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप पर पीठ ने मदन मोहन सिंह बनाम गुजरात राज्य का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया:

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“…आईपीसी की धारा 306 के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए, उस उकसावे के परिणामस्वरूप संबंधित व्यक्ति की आत्महत्या कराने के इरादे से आरोपी की ओर से आईपीसी की धारा 107 के तहत परिकल्पित विशिष्ट उकसावे की आवश्यकता होती है। आईपीसी की धारा 306 के तहत इस विशिष्ट अपराध के लिए मृतक को आत्महत्या करने में सहायता करने, प्रेरित करने या उकसाने का आरोपी का इरादा अनिवार्य है…”

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“यह संभव है कि पति और पीड़िता के वैवाहिक जीवन में कुछ विवाद या अनबन रही हो। हालांकि, यह अपने आप में आईपीसी की धारा 107 के साथ पठित धारा 306 के प्रावधानों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। वास्तव में, ऐसा कोई भी साक्ष्य मौजूद नहीं है जो आरोपी द्वारा उकसाने के किसी भी कृत्य की ओर संकेत करता हो।”

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों का बिल्कुल सही मूल्यांकन किया था और हाईकोर्ट द्वारा बरी किए जाने का फैसला उलटना पूरी तरह से आधारहीन था। शीर्ष अदालत ने 17 अगस्त 2016 के हाईकोर्ट के दोषसिद्धि संबंधी फैसले को निरस्त कर दिया।

अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया और उसके जमानत बांड रद्द करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संजय कुमार बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1108/2016
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां, जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर
निर्णय की तिथि: 03 सितंबर 2026

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