बॉम्बे हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में पांच साल से अधिक समय से जेल में बंद 25 वर्षीय विचाराधीन कैदी को जमानत दे दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबे समय तक जेल में रहने से युवा आरोपियों पर गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में उन्हें लगातार जेल के माहौल में रखने के बजाय समाज की मुख्यधारा में लौटने, सुधार करने और गरिमापूर्ण आजीविका कमाने का उचित मौका मिलना चाहिए।
न्यायमूर्ति मिलिंद जे जाधव की एकल पीठ ने 31 अगस्त को दिए अपने आदेश में रेखांकित किया कि युवा आरोपियों के संदर्भ में न्यायपालिका को सुधारात्मक रवैया अपनाना चाहिए। अदालत ने कहा कि जेल की लंबी सजा युवाओं पर बहुत भारी पड़ती है। अगर किसी युवा आरोपी को सुधारने का कोई भी मौका दिखता है, तो अदालत को सकारात्मक कदम उठाते हुए वह अवसर जरूर देना चाहिए।
सुनवाई में देरी और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन
यह मामला शुभम बालासाहेब टकले की याचिका से जुड़ा है, जिसे 2018 में दर्ज एक आपराधिक मामले में गिरफ्तार किया गया था। शुभम पर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना), 506 (आपराधिक धमकी), 141 (गैरकानूनी जमावड़ा), 147 (दंगा भड़काना) और 148 (घातक हथियारों के साथ दंगा) के तहत आरोप तय किए गए थे।
याचिकाकर्ता ने अपनी कम उम्र, मुकदमे में अत्यधिक विलंब और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले त्वरित सुनवाई तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हवाला देकर जमानत की गुहार लगाई थी।
मामले के तथ्यों की पड़ताल करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि शुभम बिना दोषसिद्धि के पांच साल और तीन महीने तक विचाराधीन कैदी के रूप में सलाखों के पीछे रहा। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि मुकदमा शुरू होने के बावजूद अभियोजन पक्ष अब तक सूचीबद्ध 35 गवाहों में से केवल तीन से ही पूछताछ कर सका है। गवाहों की संख्या और धीमी गति को देखते हुए निकट भविष्य में सुनवाई पूरी होने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही।
जमानत नियम है और जेल अपवाद
अदालत ने कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि जमानत सामान्य नियम है और जेल अपवाद। जब तक किसी व्यक्ति पर आरोप सिद्ध नहीं हो जाते, उसे निर्दोष माना जाता है। ऐसे में फैसला आने से पहले की हिरासत दंडात्मक कार्रवाई में नहीं बदलनी चाहिए। लंबे समय तक किसी व्यक्ति को जेल में बंद रखना त्वरित सुनवाई के उसके संवैधानिक अधिकार को कमजोर करता है।
युवा विचाराधीन कैदियों के लिए सुधारात्मक कदम आवश्यक
अदालत ने युवा कैदियों पर जेल के पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक और सामाजिक असर पर गहरी चिंता व्यक्त की। आंकड़ों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जेलों में अक्सर युवाओं को प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। यदि आरोपी को और अधिक समय तक सलाखों के पीछे रखा गया, तो इस बात की पूरी आशंका है कि उसका सामाजिक संस्थाओं और व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाए। ऐसी स्थिति में वह या तो अपना जीवन बर्बाद कर लेगा या फिर अपराध के रास्ते पर आगे बढ़ जाएगा।
न्यायमूर्ति जाधव ने कहा कि युवा आरोपियों को आगे भी हिरासत में भेजने से पहले अदालतों को सुधार के लिए रचनात्मक जोखिम उठाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। अदालत ने उम्मीद जताई कि रिहाई के बाद याचिकाकर्ता का परिवार उसे सही राह दिखाने में पूरी मदद करेगा, जिससे वह अपराध की दुनिया से दूर रहकर एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में जीवन बिता सके।

