न्यायनिर्णयन की प्रक्रिया में फर्जी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) द्वारा मनगढ़ंत फैसलों के इस्तेमाल पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कस्टम्स विभाग द्वारा लगाया गया 425 करोड़ रुपये से अधिक का जुर्माना आदेश रद्द कर दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायनिर्णयन प्रक्रिया में ऐसे संदिग्ध एआई दस्तावेजों का सहारा लेना आदेश की वैधता के लिए घातक है। कोर्ट ने रेखांकित किया कि बिना सत्यापन के एआई द्वारा तैयार नजीरों के इस्तेमाल के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ (शून्य सहनशीलता) की नीति अपनाना अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद एडिशनल कमिश्नर ऑफ कस्टम्स, सूरत द्वारा 8 अक्टूबर 2025 को पारित एक मूल आदेश (ऑर्डर-इन-ओरिजिनल) से जुड़ा है। अधिकारी ने अपीलकर्ता विजय घनश्याम गड़िया पर कस्टम्स एक्ट, 1962 की धारा 114 के तहत 425,27,99,100 रुपये का भारी जुर्माना लगाया था। अपीलकर्ता पर आरोप था कि उसने कम टैरिफ चुकाने के लिए प्राकृतिक हीरों की खेप को लैब में तैयार हीरे (लैब-ग्रोन डायमंड्स) बताकर गलत घोषणा की थी।
अपीलकर्ता ने इस जुर्माने को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने 20 जनवरी 2026 के अपने आदेश के जरिए अपील खारिज कर दी। इसके बाद अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षकारों की दलीलें और कोर्ट द्वारा सत्यापन
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता ने दलील दी कि 8 अक्टूबर 2025 के आदेश में एडिशनल कमिश्नर द्वारा उद्धृत कई फैसले और लेख वास्तव में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग करके तैयार किए गए थे।
शीर्ष अदालत ने कहा कि इस दलील के सामने आने के बाद मामले के मेरिट में जाना जरूरी नहीं रह गया। इसके बाद पीठ ने स्वयं व्यक्तिगत रूप से यह जांचने का प्रयास किया कि अपीलकर्ता की यह दलील सही है या नहीं।
सत्यापन करने पर कोर्ट ने पाया कि न्यायनिर्णायक अधिकारी ने वास्तव में ऐसे न्यायिक फैसलों पर भरोसा किया था जो या तो अस्तित्व में ही नहीं थे या उनके उद्धरण (साइटेशन) पूरी तरह फर्जी थे। जांच में यह भी सामने आया कि अधिकारी द्वारा उद्धृत कुछ फैसले यद्यपि अस्तित्व में तो थे, लेकिन उनमें वह निष्कर्ष (रेशियो) तय ही नहीं किया गया था जो आदेश में निकाला गया था; वे स्पष्ट रूप से एआई के भ्रम (हैलुसिनेशन) प्रतीत होते थे। इस मामले में उपस्थित एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने भी इन निष्कर्षों पर कोई विवाद खड़ा नहीं किया।
न्यायिक प्रक्रिया में एआई पर पूर्व फैसला
इस गंभीर तथ्य के उजागर होने पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय पूजा रमेश सिंह बनाम जम्मू एंड कश्मीर बैंक लिमिटेड का उल्लेख किया, जिसमें फैसलों में एआई के उपयोग के मुद्दे पर विस्तार से विचार किया गया था। उस फैसले के सिद्धांतों को दोहराते हुए पीठ ने कहा:
“बिना सत्यापन के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार नजीरों को पेश करने, उद्धृत करने या उपयोग करने के प्रति अदालतों द्वारा ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाना आवश्यक है। किसी वकील द्वारा बिना सत्यापन ऐसे फैसलों को उद्धृत करना पेशेवर कदाचार है। इसी प्रकार, यदि कोई न्यायाधीश किसी निर्णय के समर्थन में एआई द्वारा तैयार ऐसी फर्जी या मनगढ़ंत सामग्री पर भरोसा करता है, तो यह एक गंभीर चूक है। हमें यह घोषणा करने में कोई संकोच नहीं है कि ऐसा निर्णय कानून की नजर में कोई निर्णय नहीं है, भले ही उस सामग्री का फैसला लेने पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा हो या नहीं। ऐसे निर्णयों को निरस्त किया जाना चाहिए, भले ही निर्णय प्रक्रिया में फर्जी या मनगढ़ंत सामग्री का लेशमात्र भी प्रवेश हुआ हो, क्योंकि यह न्यायनिर्णयन की पवित्रता का उल्लंघन करता है। निर्णय प्रक्रिया में शुचिता बनाए रखना नितांत आवश्यक है, और हम बार तथा बेंच दोनों के लिए ऐसी सामग्री को उद्धृत करने, संदर्भित करने या उस पर भरोसा करने के प्रति शून्य सहनशीलता दोहराते हैं और घोषित करते हैं। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि हमारे फैसले का कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उचित उपयोग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, बल्कि फर्जी या भ्रमित सामग्री को अदालती नजीर के रूप में प्रस्तुत करने या उस पर भरोसा करने पर रोक होगी।”
कोर्ट का विश्लेषण: ‘प्रशिक्षण के पहिए हो सकता है, पायलट की सीट नहीं’
न्यायिक प्रक्रियाओं में तकनीक की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने माना कि यद्यपि यह मुद्दा प्रासंगिक रूप से विचार के लिए आया है, लेकिन न्याय प्रक्रिया में एआई का उपयोग अब कोई नई बात नहीं रह गई है। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में अदालतों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग के लिए मसौदा नियमावली, 2026 सार्वजनिक सुझावों और टिप्पणियों के लिए जारी की है।
अदालत ने कहा कि भले ही नियम अभी अंतिम रूप नहीं ले पाए हैं, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए एक सहायक साधन के रूप में एआई के इस्तेमाल से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, इसके साथ ही अदालत ने एक गंभीर चेतावनी भी जारी की:
“फिर भी, सावधानी का एक स्वर जरूर बजाया जाना चाहिए: सहायता कभी भी न्यायनिर्णयन का विकल्प नहीं बन सकती। एआई साइकिल सीखने वाले प्रशिक्षण पहियों (ट्रेनिंग व्हील्स) की तरह काम कर सकता है, लेकिन इसे पायलट की सीट सौंप देना अदूरदर्शी और खतरनाक दोनों होगा।”
पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में एआई के उपयोग के कारण संदिग्ध सामग्री पर भरोसा किया गया, जो अपीलकर्ता पर जुर्माना लगाने वाले आदेश की स्थिरता के लिए पूरी तरह घातक साबित हुआ।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सिविल अपील को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट के आदेश को 8 अक्टूबर 2025 के मूल आदेश सहित निरस्त कर दिया।
इसके साथ ही, कस्टम्स प्राधिकरण के समक्ष अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही को पुनर्जीवित कर दिया गया है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस मामले का नए सिरे से निपटारा उसी रैंक के किसी अन्य अधिकारी द्वारा किया जाएगा, न कि उस अधिकारी द्वारा जिसने 8 अक्टूबर 2025 का आदेश पारित किया था। इसके अतिरिक्त, पीठ ने यह नियुक्ति प्राधिकारी के विवेक पर छोड़ दिया कि वह 8 अक्टूबर 2025 के आदेश के लेखक के विरुद्ध कानून के अनुसार ऐसी कार्रवाई शुरू करे जो परिस्थितियों के तहत उचित हो।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: विजय घनश्याम गड़िया बनाम भारत संघ एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 की (एसएलपी (सिविल) संख्या 15605/2026 से उद्भूत)
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू
निर्णय की तिथि: 2 सितंबर 2026

