एनबीएफसी से खरीदे गए कर्ज की वसूली के लिए भी बैंक सरफेसी एक्ट का कर सकते हैं इस्तेमाल: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सरफेसी एक्ट (SARFAESI Act) के दायरे में आने वाला कोई भी बैंक किसी गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (एनबीएफसी) से खरीदे या हस्तांतरित (असाइन) कराए गए सुरक्षित कर्ज की वसूली के लिए इस कानून के कड़े प्रावधानों का इस्तेमाल कर सकता है—भले ही वह एनबीएफसी कर्ज जारी करते समय इस कानून के तहत अधिसूचित वित्तीय संस्थान न रही हो। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की पीठ ने अपीलों के एक समूह का निपटारा करते हुए कहा कि जैसे ही सरफेसी एक्ट के अंतर्गत आने वाली कोई संस्था किसी वैध और जीवित कर्ज (लाइव एंड सबसिस्टिंग डेट) को अपने हाथ में लेती है, वह लोन खाता तत्काल सरफेसी कानून के तहत प्रवर्तनीय सुरक्षित ऋण बन जाता है। इस निर्णय के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के विपरीत फैसले के खिलाफ कोटक महिंद्रा बैंक लिमिटेड (केएमबीएल) की अपील स्वीकार कर ली, जबकि बकाएदार कर्जदारों की याचिकाओं को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद का मुख्य मामला सिटी फाइनेंशियल कंज्यूमर फाइनेंस लिमिटेड (सीएफसीएफएल) नामक एनबीएफसी से जुड़ा था। यह एनबीएफसी शुरुआत में सरफेसी एक्ट की धारा 2(1)(m) के तहत केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित “वित्तीय संस्थान” नहीं थी (केंद्र सरकार ने इसे बाद में 27 अगस्त 2018 को अधिसूचित किया था)।

मुख्य मामले में अमित विपिन शाह ने तृप्ति संजय मेहता और संजय वालचंद मेहता (मेहता दंपति) से एक आवासीय फ्लैट खरीदने के लिए सीएफसीएफएल से ₹69,60,000 का होम लोन लिया था। कर्ज न चुकाए जाने पर सीएफसीएफएल ने आर्बिट्रेशन की कार्यवाही शुरू की, जिसमें 31 जुलाई 2010 को शाह के खिलाफ ब्याज सहित ₹75,30,872 चुकाने का पंचाट (अवॉर्ड) पारित हुआ। इसके बाद 13 जुलाई 2012 को कोटक महिंद्रा बैंक लिमिटेड ने इस लोन खाते का असाइनमेंट सीएफसीएफएल से अपने हाथ में ले लिया। केएमबीएल ने जुलाई 2013 में सरफेसी एक्ट की धारा 13(2) के तहत मांग नोटिस भेजा और चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, मुंबई से धारा 14 के तहत फ्लैट का भौतिक कब्जा लेने का आदेश हासिल कर लिया।

हालांकि, फ्लैट पर अपना कब्जा बनाए रखने वाले और शाह को मालिकाना हक न मिलने का दावा करने वाले मेहता दंपति ने इस कार्रवाई को डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल-II, मुंबई (डीआरटी) में चुनौती दी। डीआरटी ने नवंबर 2014 में फैसला सुनाते हुए कहा कि केएमबीएल, सीएफसीएफएल के असाइनी के रूप में, सरफेसी एक्ट लागू नहीं कर सकता क्योंकि कर्ज सृजन के समय सीएफसीएफएल इस कानून के दायरे में नहीं थी। इस फैसले पर डेट्स रिकवरी अपीलेट ट्रिब्यूनल और बाद में 16 जुलाई 2015 को बॉम्बे हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी मुहर लगा दी थी।

इसके साथ ही दो अन्य जुड़ी हुई अपीलें भी थीं:

  • दूसरे मामले में अनिल मनोहर साबले और जयश्री अनिल साबले ने 2009 में सीएफसीएफएल से हाउसिंग लोन लिया था। डिफॉल्ट और आर्बिट्रेशन अवॉर्ड के बाद केएमबीएल ने 9 अप्रैल 2013 को यह लोन खाता अधिग्रहित किया। बैंक द्वारा सिम्बोलिक पजेशन लेने के बाद एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, नागपुर ने 3 अक्टूबर 2018 को धारा 14 के तहत कब्जा सौंपने का आदेश दिया। साबले परिवार ने इस आदेश को सीधे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
  • तीसरे मामले में पूर्ति रेंट अ कार एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड और उसके निदेशकों ने 2009 में सीएफसीएफएल से ₹2.98 करोड़ का लोन लिया था, जो एनपीए घोषित हो गया। केएमबीएल ने 18 जुलाई 2012 को डीड ऑफ असाइनमेंट के जरिए यह कर्ज लिया और चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, एस्प्लेनेड, मुंबई से धारा 14 का आदेश प्राप्त किया। कर्जदारों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी, जिसे हाईकोर्ट ने 24 फरवरी 2022 को सुप्रीम कोर्ट की पुरानी नजीरों के आधार पर खारिज कर दिया था।
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पक्षकारों की दलीलें

कर्जदारों की ओर से दलील दी गई कि सरफेसी एक्ट के अंतर्गत आने वाले बैंक और वित्तीय संस्थान ऐसे संस्थानों के एनपीए को नहीं खरीद सकते जो इस कानून के दायरे में नहीं आते। उन्होंने तर्क दिया कि ऐसा करना अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिस्डिक्शन) से बाहर है, क्योंकि सरफेसी कानून अदालती दखल के बिना जब्ती और नीलामी का एक असाधारण अधिकार देता है। मर्दिया केमिकल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ मामले का हवाला देते हुए कर्जदारों ने कहा कि इस कानून की संवैधानिक वैधता को बैंकों और मान्यता प्राप्त वित्तीय संस्थानों में एनपीए की गंभीर समस्या से निपटने के उद्देश्य से ही बरकरार रखा गया था। ऐसे में गैर-अधिसूचित एनबीएफसी से जानबूझकर एनपीए खरीदना कानून के मूल उद्देश्य के खिलाफ है। कर्जदारों ने सरफेसी एक्ट की धारा 2(1)(f) में “बोरोअर”, धारा 2(1)(ha) में “डेट”, धारा 2(1)(m) में “फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन”, धारा 2(1)(o) में “एनपीए” और धारा 2(1)(zb) में “सिक्योरिटी अरेंजमेंट” की परिभाषाओं का हवाला देते हुए दावा किया कि कर्ज और सिक्योरिटी के सृजन के समय दोनों पक्षों का कानून के दायरे में होना जरूरी था।

दूसरी ओर, केएमबीएल ने तर्क दिया कि लोन एग्रीमेंट में कर्ज को असाइन करने का स्पष्ट अधिकार दिया गया था, जिससे मूल ऋणदाता के सभी अधिकार और कानूनी उपाय असाइनी बैंक में निहित हो गए।

मामले में प्रतिवादी के रूप में पेश हुए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने कहा कि उसे बैंकों द्वारा वित्तीय संस्थानों और एनबीएफसी से एनपीए खरीदने पर कोई आपत्ति नहीं है। बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट, 1949 की धारा 21 और 35A के तहत 13 जुलाई 2005 को जारी अपने सर्कुलर का हवाला देते हुए आरबीआई ने कहा कि बैंकों की बैलेंस शीट को साफ-सुथरा करने और संकटग्रस्त संपत्तियों के लिए एक मजबूत सेकेंडरी मार्केट तैयार करने के उद्देश्य से लोन असाइनमेंट पूरी तरह वैध गतिविधि है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड बनाम ऑफिशियल लिक्विडेटर ऑफ एपीएस स्टार इंडस्ट्रीज लिमिटेड में भी मान्यता दी है। आरबीआई ने आगाह किया कि यदि बॉम्बे हाईकोर्ट जैसा संकुचित दृष्टिकोण अपनाया गया, तो असाइनी बैंक बकाएदारों के खिलाफ सुरक्षा अधिकारों को लागू नहीं कर पाएंगे, जबकि कर्जदार असाइनमेंट के बावजूद अपना कर्ज चुकाने के कानूनी और नैतिक दायित्व से मुक्त नहीं होते।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने सरफेसी एक्ट के उद्देश्यों और कारणों के कथन (स्टेटमेंट ऑफ ऑब्जेक्ट्स एंड रीजंस) तथा धारा 2 की कानूनी रूपरेखा की पड़ताल की। कोर्ट ने रेखांकित किया कि इस कानून का मकसद अदालतों के हस्तक्षेप के बिना फंसे कर्जों की त्वरित वसूली सुनिश्चित करना है ताकि अर्थव्यवस्था में नकदी का प्रवाह बना रहे।

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सरफेसी की कठोर कार्यवाही से बचने की कर्जदारों की दलीलों को खारिज करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“सरफेसी एक्ट बैंकों और वित्तीय संस्थानों द्वारा गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) और फंसे हुए कर्जों के निपटारे को सुगम बनाता है ताकि अर्थव्यवस्था के विकास में मदद मिल सके। निःसंदेह, यह इस संबंध में कड़े उपायों का प्रावधान करता है, जिससे न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा काफी हद तक सीमित हो जाता है। हालांकि, इस कानून के मूल उद्देश्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि कर्जदारों के इस तर्क को स्वीकार कर लिया जाए, तो इसका अर्थ यह होगा कि सरफेसी एक्ट की धारा 2(1)(m) के दायरे से बाहर की एनबीएफसी से वित्तीय सहायता लेने वाले लोगों को ऐसे कर्जों की अदायगी में चूक करने की अधिक छूट मिल जाएगी, क्योंकि वहां वसूली केवल सामान्य और समय लेने वाली सिविल प्रक्रियाओं के जरिए ही हो सकती है, जबकि धारा 2(1)(m) के तहत आने वाली एनबीएफसी से कर्ज लेने वालों पर त्वरित व आसान वसूली लागू होती है। कोई वित्तीय संस्थान सरफेसी एक्ट के तहत आता है या नहीं, इससे इतर कर्जदारों द्वारा ऐसे संस्थानों को कर्ज न चुकाने से एक ऐसी श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू होती है जिसका पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ता है।”

पीठ ने इस विषय पर पहले दिए गए दो ऐतिहासिक निर्णयों—एम.डी. फ्रोजन फूड्स एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम हीरो फिनकॉर्प लिमिटेड और इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड बनाम डेक्कन क्रॉनिकल होल्डिंग्स लिमिटेड—का विस्तार से विश्लेषण किया। एम.डी. फ्रोजन फूड्स में कोर्ट ने तय किया था कि सरफेसी एक्ट उन सभी दावों पर लागू होता है जो कानून के प्रभाव में आने पर ‘जीवित और बकाया’ थे, भले ही समझौता निष्पादन के समय ऋणदाता अधिसूचित संस्था न रही हो। वहीं इंडियाबुल्स मामले में कोर्ट ने माना था कि विलय के जरिए उत्तराधिकारी बनी कंपनी को गैर-अधिसूचित एनबीएफसी से प्राप्त कर्जों पर सरफेसी के तहत वसूली का पूरा अधिकार है।

इन नजीरों के तर्क को बैंक द्वारा असाइनमेंट के जरिए खरीदे गए कर्जों पर लागू करते हुए पीठ ने कहा:

“एम.डी. फ्रोजन फूड्स और इंडियाबुल्स के फैसले स्पष्ट करते हैं कि जब कोई दावा सरफेसी एक्ट के लागू होने की तिथि पर ‘जीवित और बकाया’ है, तो जैसे ही वह संस्था उस कानून के दायरे में आती है जिसके पास वह लोन खाता है, इसके प्रावधान लागू हो जाएंगे। इसी तर्क के आधार पर, जब कोई ऐसी संस्था, जिस पर सरफेसी एक्ट पहले से ही लागू है, किसी ऐसी इकाई से गैर-निष्पादित सुरक्षित लोन खाते का अधिग्रहण करती है जो सरफेसी एक्ट के दायरे में नहीं आती, तो वह लोन खाता तत्काल सरफेसी एक्ट के प्रावधानों के तहत आने वाले ‘सुरक्षित ऋण’ की सभी विशेषताओं से युक्त हो जाता है।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:

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“मूल रूप से, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोन/कर्ज उस संस्थान के साथ सरफेसी एक्ट के दायरे में आता है, जैसा कि पिछले दो फैसलों में हुआ था, या केवल लोन/कर्ज ही उस बैंक द्वारा अधिग्रहित किए जाने के कारण इसके दायरे में आता है जिस पर सरफेसी एक्ट पहले से ही लागू है। दोनों ही स्थितियों में, कर्ज की वसूली के लिए सरफेसी एक्ट के प्रावधान उपलब्ध होंगे।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि कर्जदार कानूनी परिभाषाओं की बाल की खाल निकालकर वसूली की कार्रवाई से बच नहीं सकते, क्योंकि पूर्व के फैसलों में इन प्रावधानों की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या तय की जा चुकी है।

कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने 16 जुलाई 2015 के अपने फैसले में कानून की गलत व्याख्या की थी। अदालत ने हाईकोर्ट और डीआरटी के उस आदेश को निरस्त कर दिया। चूंकि डीआरटी ने मेहता दंपति की आपत्तियों को शुरुआती स्तर पर ही स्वीकार कर लिया था और मामले के अन्य तथ्यों व कानूनी पहलुओं पर विचार नहीं किया था, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने उनके सिक्योरिटाइजेशन आवेदन (एस.ए. संख्या 39/2014) को डीआरटी, नागपुर की फाइल पर पुनर्स्थापित करने का निर्देश दिया। इसके लिए मेहता दंपति को आठ सप्ताह के भीतर बैंक के पास ₹25 लाख की अतिरिक्त राशि जमा कराने का निर्देश दिया गया (₹40 लाख वे अंतरिम आदेश के तहत पहले ही जमा कर चुके हैं)। कोर्ट की रजिस्ट्री को उनके मूल दस्तावेज उचित पावती के साथ लौटाने का निर्देश दिया गया।

साबले परिवार के मामले में कोर्ट ने माना कि केएमबीएल धारा 14 के तहत कब्जा लेने की पूरी कानूनी हकदार थी, क्योंकि उनका आवेदन देरी के आधार पर पहले ही खारिज होकर अंतिम रूप ले चुका था। पूर्ति रेंट अ कार के मामले में कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया और नोट किया कि विवादित संपत्ति 2023 में ही नीलाम होकर बेची जा चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील संख्या 8531/2015 को स्वीकार कर लिया और बाकी दोनों अपीलें खारिज कर दीं। इसके साथ ही सभी लंबित अंतरिम अर्जियां भी खारिज कर दी गईं।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: कोटक महिंद्रा बैंक लिमिटेड बनाम तृप्ति संजय मेहता एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8531/2015
पीठ: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा
निर्णय की तिथि: 2 सितंबर, 2026

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