कर्नाटक हाईकोर्ट ने करियांगला गांव स्थित एक मस्जिद के लाउडस्पीकर लाइसेंस को बहाल कर दिया है। अदालत ने पुलिस द्वारा लाइसेंस रद्द किए जाने के फैसले को त्रुटिपूर्ण ठहराते हुए स्पष्ट किया कि संबंधित प्राधिकारी ने न तो याचिकाकर्ता को पहले कोई नोटिस दिया और न ही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए उनका पक्ष सुना।
जस्टिस सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने इस्लामिक एजुकेशन सेंटर के अध्यक्ष इसाक पुंचामे की याचिका का निपटारा करते हुए यह निर्णय सुनाया। हाईकोर्ट ने बंटवाल सब-डिवीजन के पुलिस उपाधीक्षक (डीवाईएसपी) द्वारा 13 अगस्त 2025 को जारी निरस्तीकरण आदेश को रद्द करते हुए उसे केवल एक ‘कारण बताओ नोटिस’ मानने का निर्देश दिया। अदालत ने साफ किया कि चूंकि पुलिस के आदेश को कारण बताओ नोटिस माना गया है, इसलिए मस्जिद में दैनिक नमाज और धार्मिक आयोजनों के लिए ध्वनि विस्तारक यंत्रों (लाउडस्पीकर) के इस्तेमाल की अनुमति पूर्ववत जारी रहेगी।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरूरी
प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी करते हुए जस्टिस गोविंदराज ने कहा कि किसी भी प्राधिकारी को केवल इसलिए आदेश पारित करने का अधिकार नहीं मिल जाता कि उसके पास वैधानिक शक्तियां हैं, बल्कि उसे तय कानूनी प्रक्रियाओं और अनिवार्यताओं का भी पूरी तरह पालन करना होता है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस तर्क को भी सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें 31 जुलाई 2025 को करियांगला ग्राम पंचायत द्वारा जारी एक नोटिस का हवाला दिया गया था। सरकारी वकील का कहना था कि मस्जिद परिसर के पास स्वीकृत भवन योजना (प्लान सैंक्शन) नहीं है और संपत्ति को लेकर विवाद होने के कारण पुलिस ने लाउडस्पीकर की अनुमति रद्द की थी।
इस दलील को अस्वीकार करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि विवादित निर्माण का नोटिस पंचायत की ओर से दिया गया था, न कि पुलिस की ओर से। चूंकि ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण नियमों के तहत लाउडस्पीकर का लाइसेंस जारी करने वाली वैधानिक संस्था पुलिस है, इसलिए यह पुलिस का कानूनी दायित्व था कि वह स्वयं अलग से नोटिस जारी करती और संस्था को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर देती।
अदालत ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह इस कारण बताओ नोटिस पर 10 सितंबर तक अपना औपचारिक जवाब दाखिल करे। इसके बाद बंटवाल के डीवाईएसपी को प्राप्त आपत्तियों पर विधिवत विचार करते हुए कानून के अनुसार अंतिम निर्णय लेना होगा।
विवाद की पृष्ठभूमि और प्रक्रियागत खामियां
यह विवाद तब शुरू हुआ था जब योगेश नामक एक स्थानीय निवासी ने क्षेत्रीय मजिस्ट्रेट अदालत में निजी शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि रमजान के दौरान प्रतिदिन पांच वक्त की नमाज के लिए लाउडस्पीकर बजाए जाने से स्थानीय लोगों को असुविधा हो रही है। अदालत के संज्ञान लेने पर पुलिस ने कर्नाटक पुलिस अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की और बाद में आरोपपत्र (चार्जशीट) दाखिल किया।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई के समय चक्र (टाइमलाइन) पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पाया कि जहां एक तरफ पुलिस ने मामले में चार्जशीट सितंबर 2025 में दाखिल की, वहीं लाइसेंस जारी करने वाले प्राधिकारी ने इससे एक महीने पहले ही, यानी 13 अगस्त 2025 को, लाइसेंस रद्द करने का तुगलकी आदेश जारी कर दिया था।
याचिकाकर्ता इसाक पुंचामे ने अदालत में दलील दी थी कि उनका ट्रस्ट एक पंजीकृत धर्मार्थ संस्था है, जिसने अपनी निजी भूमि पर भवन का निर्माण किया है और यह स्थानीय समुदाय के लिए धार्मिक व सामाजिक गतिविधियां संचालित करता है। ट्रस्ट ने जुलाई 2025 में ध्वनि प्रदूषण (विनियमन एवं नियंत्रण) नियम, 2000 के नियम 5 के तहत कानूनी ध्वनि सीमाओं का पालन करने की शर्त पर लाउडस्पीकर के उपयोग की वैध अनुमति ली थी। याचिका में कहा गया था कि बिना किसी पूर्व सूचना और निष्पक्ष सुनवाई के लाइसेंस रद्द करना वैधानिक दायरे में धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों के संचालन के अधिकार का सीधा हनन है।

