कलकत्ता हाईकोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच ने मृत्युदंड से जुड़े कानून पर एक अहम फैसला सुनाते हुए कुल्हाड़ी से पत्नी की हत्या के दोषी पति की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है, लेकिन उसकी फांसी की सजा को कठोर आजीवन कारावास में बदल दिया है। जस्टिस शम्पा सरकार और जस्टिस स्मिता दास दे की खंडपीठ ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने जेल आचरण और मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन रिपोर्ट मंगाए बिना मृत्युदंड देकर गंभीर प्रक्रियात्मक त्रुटि की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट ने दोषी में सुधार की संभावना और सजा में नरमी लाने वाली परिस्थितियों की पूरी तरह अनदेखी की थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 20 जून 2023 को जलपाईगुड़ी जिले के मयनागुड़ी क्षेत्र में हुई एक घटना से जुड़ा है। अपीलकर्ता (दोषी पति) अपनी ससुराल गया हुआ था, जहां परिवार के सदस्य एक श्राद्ध कार्यक्रम के लिए एकत्र हुए थे। सुबह की चाय के बाद, दूसरी महिला से फोन पर बात करने के शक को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया।
विवाद बढ़ने पर पति ने बेडरूम के भीतर कुल्हाड़ी से पत्नी पर हमला कर दिया, जिससे उसके सिर और हाथ पर गंभीर चोटें आईं और उसकी मौत हो गई। जब मृतका की मां और 70 वर्षीय नानी उसे बचाने दौड़ीं, तो दोषी ने उन पर भी कुल्हाड़ी से वार किया। इससे मृतका की मां की छाती पर गंभीर चोट आई, जबकि नानी की एक आंख की रोशनी चली गई। इस घटना को मृतका की बहन और दंपती के सात वर्षीय बेटे ने देखा था।
10 अप्रैल 2025 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, तृतीय न्यायालय, जलपाईगुड़ी ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) और 307 (हत्या का प्रयास) के तहत दोषी ठहराया, जबकि धारा 498ए और 326 के आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद 21 अप्रैल 2025 को ट्रायल कोर्ट ने धारा 302 के तहत उसे फांसी की सजा और धारा 307 के तहत 1 लाख रुपये के जुर्माने के साथ आजीवन कारावास की सजा सुनाई। मृत्युदंड की पुष्टि के लिए मामला हाईकोर्ट भेजा गया था, जिस पर दोषी की आपराधिक अपील के साथ सुनवाई हुई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकीलों ने तर्क दिया कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में भारी विरोधाभास होने के कारण दोषसिद्धि टिकने योग्य नहीं है। उन्होंने कहा कि शिकायतकर्ता घटना के समय मोबाइल बनवाने बाहर गई हुई थी, इसलिए वह चश्मदीद नहीं थी। इसके अलावा, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत कुल्हाड़ी की बरामदगी पर भी सवाल उठाए गए और जब्ती गवाहों की विश्वसनीयता को संदिग्ध बताया गया।
सजा के बिंदु पर बचाव पक्ष ने दलील दी कि ट्रायल जज ने बिना सोचे-समझे सामान्य तौर पर मृत्युदंड दे दिया। बचाव पक्ष ने कहा कि घटना से आधा घंटा पहले ही पूरे परिवार ने साथ में नाश्ता किया था, जिससे यह साबित होता है कि हत्या पूर्व-योजित नहीं थी। बचन सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब, मच्छी सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब, स्वामी श्रद्धानंद बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक, मनोज एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ मध्य प्रदेश और अमन सिंह एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ बिहार जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने जेल आचरण रिपोर्ट नहीं मंगाई। साथ ही दोषी की युवा आयु (37 वर्ष), कोई आपराधिक रिकॉर्ड न होना, उसकी गरीबी और सुधार की संभावना जैसी परिस्थितियों पर विचार नहीं किया गया।
दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने चार प्रत्यक्षदर्शियों के जरिए मामला पूरी तरह साबित किया है, जिनमें से दो घायल गवाह थीं। अभियोजन ने कहा कि मेडिकल साक्ष्य, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, जब्ती मेमो और नाबालिग बेटे की गवाही से अपराध बिना किसी संदेह के साबित हुआ है, इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा दिया गया मृत्युदंड पूरी तरह उचित है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद माना कि अभियोजन पक्ष ने आईपीसी की धारा 302 और 307 के तहत आरोपों को पूरी मजबूती से साबित किया है। पीठ ने रेखांकित किया कि नाबालिग बेटे और घायल गवाहों की गवाही स्वाभाविक व सुसंगत थी, जिसे मेडिकल जांच और हथियार की बरामदगी से पूरा समर्थन मिला। कोर्ट ने दोषसिद्धि के खिलाफ अपील खारिज करते हुए कहा कि सभी साक्ष्य मिलकर दोषी के अपराध की ओर सीधा इशारा करते हैं।
हालांकि, खंडपीठ ने मृत्युदंड देने के ट्रायल कोर्ट के तरीके पर सख्त असहमति जताई। हाईकोर्ट ने पाया कि ट्रायल जज ने हिरासत में दोषी के आचरण या उसकी मानसिक स्थिति पर कोई रिपोर्ट नहीं मंगाई, जो सुप्रीम कोर्ट के मनोज और अमन सिंह फैसलों में तय अनिवार्य निर्देशों का गंभीर उल्लंघन है।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“ट्रायल जज ने जेल आचरण रिपोर्ट नहीं मंगाई। सुधार या पुनर्वास की कोई संभावना थी या नहीं, इस पर विचार नहीं किया गया। अपील में खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत प्रोबेशन अधिकारी की रिपोर्ट दर्शाती है कि अपीलकर्ता का आचरण संतोषजनक था। सुधार की संभावना थी और वह काउंसलिंग ले रहा था। अपीलकर्ता का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास भी नहीं था।”
ट्रायल कोर्ट के तर्कों की आलोचना करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल जज ने हिंदू विवाह के वैदिक मंत्रों और वचनों पर अत्यधिक जोर देते हुए दोषी को ऐसा ‘दानव’ करार दे दिया जिसकी मानसिकता बदली ही नहीं जा सकती:
“हम मृत्युदंड से सहमत नहीं हैं। गंभीर अपराध करने वाला प्रत्येक व्यक्ति भी बदलाव के दौर से गुजर सकता है। ट्रायल कोर्ट ने परिस्थितियों में नरमी लाने वाले (मिटिगेटिंग) तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया। यह तथ्य कि मृतका, अपीलकर्ता और परिवार के अन्य सदस्यों ने साथ बैठकर सुबह की चाय पी थी और घटना नाश्ते के आधे घंटे बाद हुई, यह दर्शाता है कि अपराध पहले से सुनियोजित या पूर्व-निर्धारित नहीं रहा होगा।”
बचन सिंह, मच्छी सिंह और अशोक देबबर्मा बनाम स्टेट ऑफ त्रिपुरा में प्रतिपादित सिद्धांतों को दोहराते हुए पीठ ने स्पष्ट किया:
“सख्त आजीवन कारावास एक सामान्य नियम है और मृत्युदंड एक अपवाद है। जिस तरीके से इस मामले में अपराध को अंजाम दिया गया, वह ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) मामले की कसौटी पर खरा नहीं उतरता।”
“मृत्युदंड केवल तभी दिया जाता है जब अपराध की परिस्थितियों को देखते हुए आजीवन कारावास पूरी तरह से अपर्याप्त सजा प्रतीत हो। इस मामले में कई नरमी वाले पहलू मौजूद हैं और अपराध की गंभीरता तथा नरमी की परिस्थितियों के बीच संतुलन साधने के बाद, हम फांसी की सजा की पुष्टि करने की स्थिति में नहीं हैं।”
निर्णय
अपराध की गंभीरता और नरमी लाने वाली परिस्थितियों—जैसे दोषी का सामाजिक-आर्थिक पिछड़ापन, कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड न होना, जेल में अच्छा आचरण, नाबालिग बेटे व बुजुर्ग मां की जिम्मेदारी और सुधार की सकारात्मक गुंजाइश—के बीच संतुलन बनाते हुए हाईकोर्ट ने मृत्युदंड की पुष्टि करने से इनकार कर दिया।
खंडपीठ ने धारा 302 और 307 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन धारा 302 के तहत दी गई फांसी की सजा को कठोर आजीवन कारावास में बदल दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने निर्देश दिया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 के तहत हिरासत में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित (सेट-ऑफ) किया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम सुजीत डे भौमिक (सुजीत डे भौमिक बनाम स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल के साथ)
वाद संख्या: डेथ रेफरेंस संख्या 3/2025 साथ में सीआरए (डीबी) 32/2025
पीठ: जस्टिस शम्पा सरकार और जस्टिस स्मिता दास दे
निर्णय की तिथि: 28 अगस्त 2026

