पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार के उस आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया है, जिसके तहत राज्य के सरकारी कर्मचारियों के विदेश जाने पर सितंबर तक पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस रोक को स्पष्ट रूप से मनमाना और असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि केवल सरकारी सेवा में होने के आधार पर नागरिकों के पूरे वर्ग पर ऐसा प्रतिबंध नहीं थोपा जा सकता। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला अखरोट तोड़ने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल करने जैसा है, जिसकी अनुमति हमारे संवैधानिक न्यायशास्त्र में नहीं दी जा सकती।
जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने 27 अगस्त को फैसला सुनाते हुए हरियाणा प्रशासन को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता नर्सिंग अधिकारी को एक पेशेवर परीक्षा में शामिल होने के लिए ऑस्ट्रेलिया जाने की तुरंत अनुमति दे। हाईकोर्ट ने दोहराया कि सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक निर्णयों के अनुसार, विदेश यात्रा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का अभिन्न अंग है।
वैश्विक संकट और ईंधन बचत का तर्क खारिज
यह विवाद हरियाणा के मानव संसाधन विभाग द्वारा 10 जून को जारी उन निर्देशों से जुड़ा है, जिनमें राज्य सरकार के सभी विभागों, बोर्डों, निगमों और सार्वजनिक प्राधिकरणों के कर्मचारियों की आधिकारिक व निजी विदेश यात्रा पर सितंबर तक रोक लगा दी गई थी। इस आदेश में केवल गंभीर चिकित्सीय कारणों के लिए ही छूट का प्रावधान रखा गया था।
राज्य सरकार के वकील ने अदालत में इस प्रतिबंध का बचाव करते हुए दलील दी कि रूस-यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया संकट के चलते वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, खासकर ईंधन और अन्य आवश्यक संसाधनों पर गंभीर असर पड़ा है। इसी कारण जनहित में खर्च घटाने और संसाधनों की बचत के उद्देश्य से यह अस्थायी मितव्ययिता कदम उठाया गया था।
हाईकोर्ट ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि सरकार वैश्विक संकट व ईंधन संरक्षण के लक्ष्य और कर्मचारियों की निजी विदेश यात्रा पर पूर्ण रोक के बीच कोई तार्किक संबंध साबित करने में नाकाम रही है। अदालत ने कहा कि कौशल बढ़ाने के लिए विदेश जा रही एक नर्सिंग अधिकारी को रोकने से ईंधन की बचत कैसे होगी, इसका कोई ठोस और स्पष्टीकरण सरकार के पास नहीं है। ऐसे में यह पूर्ण प्रतिबंध अपने कथित उद्देश्य के मुकाबले अत्यधिक अनुपातहीन है।
रोहतक पीजीआईएमएस की नर्सिंग अधिकारी को मिली राहत
यह मामला रोहतक स्थित पीजीआईएमएस अस्पताल में 23 फरवरी 2021 से सेवारत एक नर्सिंग अधिकारी की याचिका पर सामने आया। याचिकाकर्ता ने व्यावसायिक अनुभव और उच्च योग्यता हासिल करने के लिए ऑस्ट्रेलियन हेल्थ प्रैक्टिशनर रेगुलेशन एजेंसी एंड नेशनल बोर्ड्स की ‘ऑब्जेक्टिव स्ट्रक्चर्ड क्लिनिकल एग्जामिनेशन’ (ओएससीई) परीक्षा के लिए आवेदन किया था।
याचिकाकर्ता ने इस साल जनवरी में ऑस्ट्रेलियाई वीजा आवेदन के लिए विभागीय अनापत्ति प्राप्त की, तय शुल्क जमा किया और 29 मई को उन्हें वैध वीजा जारी हो गया। इसके बाद जब उन्होंने 18 अगस्त को अर्जित अवकाश (ईएल) के लिए आवेदन दिया, तो अधिकारियों ने 10 जून के सरकारी निर्देशों का हवाला देते हुए उनके आवेदन पर विचार करने से इनकार कर दिया था।
संवैधानिक कसौटी पर खरा नहीं उतरा प्रशासनिक आदेश
जस्टिस बराड़ ने स्पष्ट किया कि आज के वैश्वीकृत दौर में विदेश यात्रा के अधिकार को केवल एक प्रशासनिक रियायत मानकर छीना नहीं जा सकता। याचिकाकर्ता को परीक्षा में शामिल होने से रोकना न केवल उनके विदेश यात्रा के अधिकार का हनन है, बल्कि उन्हें उच्च शिक्षा पाने के अधिकार से भी वंचित करता है, जो संविधान के भाग 3 और अनुच्छेद 21 के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है।
अदालत ने रेखांकित किया कि सरकार के ये निर्देश पूरी तरह से प्रशासनिक हैं और इन्हें किसी विधायी कानून का समर्थन हासिल नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सरकार के पास कर्मचारियों की विदेश यात्रा को विनियमित करने का अधिकार मान भी लिया जाए, तब भी यह प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 की कसौटी पर निष्पक्ष, तार्किक, गैर-मनमाना और आनुपातिक होना चाहिए। कर्मचारियों के पद, कर्तव्यों की प्रकृति, यात्रा के उद्देश्य या व्यक्तिगत परिस्थितियों का आकलन किए बिना यांत्रिक रूप से लागू किया गया यह पूर्ण प्रतिबंध पूरी तरह अनुचित है।

