बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘सत्यमेव जयते’ शो से जुड़े मानहानि के मामले को किया रद्द, दो डॉक्टरों को मिली राहत

बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभिनेता आमिर खान के टीवी शो ‘सत्यमेव जयते’ के साल 2012 के एक एपिसोड में कीटनाशकों के इस्तेमाल पर टिप्पणी करने वाले दो चिकित्सा शोधकर्ताओं के खिलाफ लंबित आपराधिक मानहानि मामले को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि दोनों डॉक्टरों की टिप्पणियां वैज्ञानिक शोध और जनस्वास्थ्य जागरूकता से जुड़ी थीं, न कि किसी विशिष्ट कंपनी या उत्पाद की छवि खराब करने के उद्देश्य से की गई थीं।

जनस्वास्थ्य जागरूकता से जुड़ी थीं टिप्पणियां

जस्टिस मिलिंद एन. जाधव की पीठ ने 18 अगस्त के अपने आदेश में बांद्रा, मुंबई की 9वीं एडिशनल चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट के समक्ष डॉ. रश्मि संघी और डॉ. गोपाल काबरा के खिलाफ चल रही कार्यवाही को निरस्त कर दिया। पीठ ने कहा कि दोनों शोधकर्ताओं में से किसी ने भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी खास कीटनाशक या उसके असर का नकारात्मक उल्लेख नहीं किया और न ही किसी रसायन निर्माता का नाम लिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन बयानों का मूल उद्देश्य अकादमिक अध्ययनों में सामने आए नवजात शिशुओं के शारीरिक विकारों और जन्मजात बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक करना था। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा 3 अक्टूबर 2016 को जारी किए गए समन आदेश की कड़ी आलोचना की। अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट का वह फैसला बिना किसी ठोस आधार के था और उसमें न्यायिक विवेक के इस्तेमाल की कमी स्पष्ट दिखाई देती है।

क्या था पूरा विवाद

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यह मामला 24 जून 2012 को प्रसारित ‘सत्यमेव जयते’ के “टॉक्सिक फूड – पॉइज़न इन अवर प्लेट” शीर्षक वाले एपिसोड से जुड़ा है। इस कार्यक्रम में कीटनाशकों के नियमन, खाद्य पदार्थों में जहरीले अवशेषों और जैविक खेती जैसे विषयों पर विभिन्न विशेषज्ञों ने चर्चा की थी। इस प्रसारण के दौरान डॉ. संघी ने लगभग 40 सेकंड और डॉ. काबरा ने मुख्य मेजबान के सवालों का जवाब देते हुए तीन से चार मिनट बात की थी।

प्रसारण के लगभग तीन साल बाद, मार्च 2015 में कीटनाशक निर्माताओं के संगठन ‘क्रॉप केयर फेडरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड’ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 500 के तहत मानहानि की शिकायत दर्ज कराई थी। संगठन का आरोप था कि शो में कीटनाशकों के इस्तेमाल को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताकर उद्योग को नुकसान पहुंचाया गया।

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वैज्ञानिक शोध और नियामक संस्था की मंजूरी

मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने दोनों डॉक्टरों की शोध पृष्ठभूमि को रेखांकित किया। डॉ. रश्मि संघी ने फरवरी 2003 में ‘जर्नल ऑफ ह्यूमन एंड एक्सपेरिमेंटल टॉक्सिकोलॉजी’ में भोपाल में मां के दूध में कीटनाशकों के अवशेषों पर एक शोध पत्र प्रकाशित किया था। वहीं, डॉ. गोपाल काबरा ने गर्भावस्था के शुरुआती दौर में पर्यावरणीय कारणों से होने वाले मृत जन्म और जन्मजात विकृतियों पर महत्वपूर्ण अध्ययन किए थे।

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इसके अतिरिक्त, हाईकोर्ट ने ब्रॉडकास्टिंग कंटेंट कंप्लेट्स काउंसिल (बीसीसीसी) के 22 अप्रैल 2013 के आदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें इस टीवी एपिसोड की समीक्षा के बाद उसमें किसी भी आपत्तिजनक सामग्री के होने से इनकार किया गया था।

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