हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने 15 साल से अधिक समय से लंबित रखरखाव के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पीड़िता को मिलने वाली मासिक वित्तीय सहायता राशि में बढ़ोतरी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कम और स्थिर भरण-पोषण भत्ता असहाय पत्नियों को गरीबी और कंगाली की ओर धकेलता है। इसलिए जीवन यापन के बढ़ते खर्चों और महंगाई को ध्यान में रखते हुए इस राशि में समय-समय पर संशोधन होना अनिवार्य है।
चरणबद्ध तरीके से बढ़ेगी भरण-पोषण राशि
जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की पीठ ने 22 अगस्त को जारी अपने आदेश में भरण-पोषण की राशि को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने का निर्देश दिया। संशोधित व्यवस्था के तहत, 2011 से 2016 की अवधि के लिए 5,000 रुपये प्रति माह, 2016 से 2021 के लिए 7,000 रुपये प्रति माह और 2021 से अप्रैल 2026 तक के लिए 9,000 रुपये प्रति माह की दर तय की गई है। इसके अलावा, अप्रैल 2026 के बाद से हर दो साल में इस भरण-पोषण राशि में अपने आप 5 प्रतिशत की वृद्धि लागू होगी।
मामले की पृष्ठभूमि और उत्पीड़न के आरोप
याचिकाकर्ता महिला ने सितंबर 2009 में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार शादी की थी। वह पति की तीसरी पत्नी थी, जो इससे पहले दो बार तलाक ले चुका था। महिला ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें मार्च 2011 में याचिका दायर होने की तारीख से 5,000 रुपये प्रति माह का तय भत्ता मंजूर किया गया था।
महिला ने अपनी याचिका में बताया कि शादी के एक महीने बाद से ही उसके साथ दुर्व्यवहार, दहेज उत्पीड़न और मारपीट शुरू हो गई थी। उस पर घर से बाहर निकलने पर भी कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे। लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के कारण उसे अपना ससुराल छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। एडवोकेट वरुण चौहान के माध्यम से महिला ने अदालत को सूचित किया कि उसके पास आय का कोई स्वतंत्र साधन नहीं है, जबकि उसका पति कॉलेज में लेक्चरर और प्रिंसिपल के रूप में 50,000 रुपये प्रति माह कमाता रहा है।
पति की कानूनी जिम्मेदारी पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पति के उपस्थित न होने पर अदालत ने मामले की कार्यवाही एकतरफा (एक्स-पार्टी) चलाई। पति के वित्तीय असमर्थता के तर्कों को खारिज करते हुए पीठ ने कहा कि कमाने में सक्षम और स्वस्थ पति अपनी उस पत्नी के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ सकता जो अपना गुजारा करने में असमर्थ है।
पीठ ने जोर देकर कहा कि भरण-पोषण की गणना व्यावहारिक होनी चाहिए और इसमें महंगाई के प्रभाव को शामिल किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि अपर्याप्त सहायता राशि पीड़िता को भुखमरी और बेसहारा स्थिति में छोड़ देती है। अदालत ने रेखांकित किया कि यह कदम संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत गरिमापूर्ण जीवन की गारंटी सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

