कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक पति के पक्ष में दी गई तलाक की मंजूरी को बरकरार रखा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना किसी आधार के पति और उसके परिवार पर गंभीर आरोप लगाना, दफ्तर में हंगामा करना और आश्रित विधवा मां को अकेला छोड़ने का दबाव बनाना कानूनी तौर पर ‘मानसिक क्रूरता’ के दायरे में आता है।
जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतीम भट्टाचार्य की पीठ ने एक अगस्त के आदेश में यह फैसला सुनाया। इसके साथ ही पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि पत्नी द्वारा अलग घर की मांग करना स्वतः ही क्रूरता नहीं माना जा सकता, क्योंकि आधुनिक समाज इस पुरानी सोच से आगे बढ़ चुका है कि महिला का एकमात्र कर्तव्य पति के परिवार की सेवा करना है। हालांकि, कोर्ट ने जोर दिया कि इस तरह की मांग का मूल्यांकन प्रत्येक परिवार की विशिष्ट परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए।
आधुनिक पारिवारिक जीवन और सामाजिक संदर्भ
अदालत ने कहा कि कानून और समाज अब उन रूढ़िवादी धारणाओं से आगे निकल चुके हैं जो महिलाओं को स्वतंत्र दांपत्य जीवन से वंचित करती थीं, खासकर आज के एकल परिवारों के दौर में। लेकिन पीठ ने यह भी कहा कि इस प्रगतिशील सोच को चरम सीमा तक नहीं ले जाया जा सकता। इस मामले में, चूंकि पति की विधवा मां पूरी तरह से उस पर आश्रित थीं, इसलिए पत्नी द्वारा अलग रहने की जिद और साथ ही लगाए गए गंभीर एवं मनगढ़ंत आरोपों ने मानसिक क्रूरता की सीमा को पार कर दिया।
बिना सबूत के आरोप और गवाही में विरोधाभास
अदालत ने पाया कि पत्नी द्वारा लगाए गए आरोपों का समर्थन करने के लिए कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया। पत्नी के वकील संजय मुखर्जी ने तर्क दिया था कि उनकी मुवक्किल अपनी सास द्वारा बच्चे के साथ किए जाने वाले कथित दुर्व्यवहार से बचाने के लिए अलग घर चाहती थीं। हालांकि, पीठ ने ध्यान दिलाया कि महिला ने इस कथित उत्पीड़न की शिकायत न तो पुलिस में की, न बाल कल्याण प्राधिकारियों को दी और न ही किसी गवाह को पेश किया।
इसके अलावा cross-examination के दौरान महिला की गवाही में बड़े विरोधाभास सामने आए। उसने पहले दावा किया था कि पति ने उसकी चिकित्सीय सहायता नहीं की, लेकिन पूछताछ में उसने स्वीकार किया कि उसके पति ने कई अस्पतालों में उसके इलाज का इंतजाम किया था।
वहीं, पति के वकील श्यामल चक्रवर्ती ने सबूत पेश करते हुए बताया कि पत्नी ने उनके मुवक्किल के व्यावसायिक स्थल पर बार-बार जाकर बाधा पहुंचाई। वह पति की आपत्ति के बावजूद उनके दफ्तर पहुंची, ग्राहकों के सामने अभद्र भाषा का प्रयोग किया और टेलीफोन जैसे उपकरणों को नुकसान पहुंचाया, जिससे पति की व्यावसायिक प्रतिष्ठा को आघात पहुंचा।
विवाह का घटनाक्रम और कानूनी तर्क
दोनों पक्षों का विवाह जून 2009 में स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत हुआ था और अप्रैल 2013 में उनका एक बच्चा हुआ। अप्रैल 2014 में पत्नी ने ससुराल छोड़ दिया, हालांकि उसने दावा किया कि वह सुलह के प्रयास में कभी-कभी सात से आठ दिनों के लिए लौटती थी। दिसंबर 2014 से दोनों लगातार अलग रह रहे हैं।
फरवरी 2016 में हुई एक घटना के बाद महिला ने पति के खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। उसका आरोप था कि जब वह भारी बारिश में बच्चे के लिए रेनकोट मांगने पति के दफ्तर गई, तो उसने दुर्व्यवहार किया। पत्नी के पक्ष का तर्क था कि आपराधिक मामला दर्ज कराना या अलग घर मांगना क्रूरता नहीं है, और केवल ‘विवाह का अटूट रूप से टूटना’ तलाक का सीधा आधार नहीं होता।
पति ने स्पष्ट किया कि उसने अलगाव के आधार पर नहीं बल्कि लगातार हुई क्रूरता के आधार पर तलाक मांगा था। उसने कहा कि कुछ दिनों के लिए साथ रहने से वह पीड़ा कम नहीं होती जो झूठे आरोपों और उसकी आश्रित मां को छोड़ने के दबाव से उत्पन्न हुई थी।
मामले के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि बेबुनियाद आरोपों, व्यावसायिक स्थल पर व्यवधान और आश्रित मां से अलग करने के दबाव का संयुक्त प्रभाव मानसिक क्रूरता को साबित करता है, जो तलाक का वैध आधार है।

