आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अपने दो नाबालिग बेटों की कस्टडी मांगने वाली एक महिला की बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका खारिज कर दी है। अदालत से तलाक के पूर्व समझौते और बच्चों के अधिकार से जुड़े तथ्यों को छिपाने पर कोर्ट ने महिला पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे अपने पिता की देखरेख में हैं, इसलिए इसे गैर-कानूनी हिरासत नहीं माना जा सकता।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस पुरुषोत्तम कुमार चिंतालपुडी की पीठ ने 28 जुलाई को यह निर्णय सुनाते हुए सुनवाई के बाद महिला द्वारा मांगी गई माफी को भी अस्वीकार कर दिया। पीठ ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है और महत्वपूर्ण जानकारी छिपाकर राज्य की प्रशासनिक व कानूनी व्यवस्था को व्यर्थ में सक्रिय किया।
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जुर्माने की 50,000 रुपये की राशि तीन सप्ताह के भीतर रजिस्ट्रार (न्यायिक) के पास जमा कराई जाए। इस रकम को किसी राष्ट्रीयकृत बैंक में दोनों बच्चों के नाम 25-25 हजार रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट (एफडी) के रूप में रखा जाएगा, जो उनके वयस्क होने पर उन्हें सौंपी जाएगी।
आपसी सहमति और समझौते की शर्तें
मामले की शुरुआत 28 जून को हुई, जब महिला ने मुख्य न्यायाधीश को एक प्रतिवेदन भेजकर दावा किया था कि उसका पति बच्चों को लेकर गायब हो गया है और उनका कोई सुराग नहीं मिल रहा है। हालांकि, राज्य के प्रतिनिधियों ने अदालत को अवगत कराया कि दोनों पक्षों ने 26 मार्च 2025 को एक सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे।
इस एमओयू में आपसी सहमति से विवाह समाप्त करने की शर्तें तय की गई थीं। इसके तहत 10 लाख रुपये के वित्तीय निपटान के साथ-साथ जून 2025 से मई 2026 तक 12 महीनों के लिए 30,000 रुपये प्रति माह के भुगतान का प्रावधान था। समझौते में स्पष्ट लिखा था कि दोनों बेटों की पूरी देखरेख और कस्टडी पिता के पास रहेगी और महिला भविष्य में कस्टडी का कोई दावा नहीं करेगी।
पूर्व अदालती कार्यवाही और तेलंगाना हाईकोर्ट का आदेश
इस समझौते का उल्लेख तेलंगाना हाईकोर्ट की कार्यवाही में भी हो चुका था। 18 सितंबर 2025 को तेलंगाना हाईकोर्ट ने इसी एमओयू के आधार पर पति और एक अन्य सह-आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर की कार्यवाही को रद्द कर दिया था।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने 23 जुलाई को अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे बच्चों को ढूंढकर अदालत के समक्ष पेश करें। इसके साथ ही पति को प्रतिवादी के रूप में शामिल करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश और 26 मार्च 2025 के एमओयू को मामले के आधिकारिक रिकॉर्ड में जोड़ा गया।
अदालत में उपस्थिति और माफी याचिका खारिज
28 जुलाई को सुनवाई के दौरान पति, उसकी मां और दोनों नाबालिग बच्चे पीठ के समक्ष उपस्थित हुए। शुरुआत में याचिकाकर्ता महिला ने कहा कि वह केवल तेलुगु जानती है और अंग्रेजी नहीं पढ़ सकती। इसके बाद अदालत ने कानूनी सहायता उपलब्ध कराई और उसने लीगल एड वकील की मौजूदगी में एमओयू को पढ़ा।
जब कोर्ट ने उससे एमओयू और 18 सितंबर 2025 के तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को याचिका में शामिल न करने का कारण पूछा, तो उसने तर्क दिया कि उसने इन्हें अप्रासंगिक माना था। सुनवाई के दौरान महिला ने यह भी स्वीकार किया कि उसे समझौते की शर्तों के तहत पति से 5 लाख रुपये प्राप्त हो चुके हैं।
पीठ ने माना कि याचिका आवश्यक तथ्यों को छिपाकर दायर की गई थी। फैसला आने के बाद महिला ने अदालत से क्षमा याचना की, लेकिन पीठ ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया कि उसका आचरण क्षमा योग्य नहीं है।

