केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय ने भारत सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट, विभिन्न हाईकोर्ट, जिला एवं अधीनस्थ अदालतों, ट्रिब्यूनलों और अन्य मंचों पर पैरवी करने वाले वकीलों को पैनल काउंसल के रूप में नियुक्त करने के लिए नए दिशानिर्देश जारी किए हैं।
कानूनी कार्य विभाग ने 20 अगस्त 2026 को जारी ऑफिस मेमोरेंडम में पैनल में शामिल होने के लिए जरूरी योग्यता, न्यूनतम वकालत अनुभव, आवेदन प्रक्रिया, कार्यकाल, प्रदर्शन की समीक्षा और पैनल से हटाए जाने के आधार तय किए हैं। ये दिशानिर्देश जारी होने की तारीख से प्रभावी हो गए हैं।
आमतौर पर किसी वकील को तीन साल के लिए पैनल काउंसल बनाया जाएगा। हालांकि, विभाग द्वारा पहले से की गई नियुक्तियां अपने निर्धारित कार्यकाल की समाप्ति तक जारी रहेंगी।
लॉ की डिग्री, बार काउंसिल में नामांकन और AIBE पास होना जरूरी
पैनल में शामिल होने के लिए आवेदक के पास बार काउंसिल ऑफ इंडिया से मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय या कॉलेज से कानून में स्नातक की डिग्री होनी चाहिए। साथ ही, एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत संबंधित स्टेट बार काउंसिल में उसका नामांकन होना जरूरी है।
आवेदक के लिए ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) पास करना और सर्टिफिकेट ऑफ प्रैक्टिस प्राप्त करना भी अनिवार्य किया गया है।
सिर्फ वकालत के वर्षों के आधार पर ही चयन नहीं होगा। विभाग यह भी देखेगा कि वकील ने किस प्रकृति और जटिलता के मामलों में काम किया है, उसने किस स्तर की जिम्मेदारी संभाली है और महत्वपूर्ण मामलों को संभालने की उसकी क्षमता कैसी है। चयन प्रक्रिया में वकील के पिछले प्रदर्शन, आचरण और ईमानदारी पर भी विचार किया जाएगा।
इनकम टैक्स, कस्टम्स, GST और PMLA जैसे विशेष कानूनों में अनुभव रखने वाले वकीलों को केंद्र सरकार की ओर से अदालतों, ट्रिब्यूनलों और अर्ध-न्यायिक मंचों पर पैरवी के लिए विशेष पैनल में शामिल किया जा सकता है। सरकारी सेवा के दौरान 10 साल तक कानूनी कार्य करने का अनुभव रखने वाले वकीलों पर भी उनकी विशेषज्ञता के आधार पर विचार किया जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट के पैनल के लिए कितना अनुभव जरूरी?
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के पैनल काउंसल की अलग-अलग श्रेणियों के लिए न्यूनतम वकालत अनुभव निर्धारित किया गया है।
ग्रुप ‘A’ पैनल काउंसल के लिए कम से कम पांच साल, ग्रुप ‘B’ के लिए चार साल और ग्रुप ‘C’ पैनल काउंसल के लिए तीन साल की वकालत का अनुभव जरूरी होगा।
कई हाईकोर्ट के लिए डिप्टी सॉलिसिटर जनरल के पद पर पैनल में शामिल होने के लिए सामान्य तौर पर 10 साल का न्यूनतम अनुभव निर्धारित किया गया है। सीनियर पैनल काउंसल के लिए पांच साल और सेंट्रल गवर्नमेंट काउंसल के लिए चार साल का अनुभव रखा गया है। इनमें इलाहाबाद, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, मद्रास, पटना, पंजाब एवं हरियाणा और राजस्थान सहित विभिन्न हाईकोर्ट शामिल हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट के लिए अलग अनुभव सीमा तय की गई है। यहां सेंट्रल गवर्नमेंट स्टैंडिंग काउंसल और सीनियर पैनल काउंसल के लिए पांच-पांच साल, जबकि गवर्नमेंट प्लीडर के लिए दो साल का वकालत अनुभव जरूरी होगा।
दिशानिर्देशों में सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (CAT), आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT), जिला अदालतों और मध्यस्थता से जुड़े मामलों के लिए भी अलग-अलग अनुभव तय किया गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में स्टैंडिंग काउंसल और टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया के स्टैंडिंग काउंसल के लिए कम से कम 15 साल का अनुभव जरूरी होगा।
अधूरे या तय प्रारूप में नहीं मिले आवेदन हो सकते हैं खारिज
पैनल में शामिल होने के इच्छुक वकीलों को निर्धारित प्रारूप में अपना आवेदन कानून एवं न्याय मंत्रालय के कानूनी कार्य विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी को भेजना होगा।
विभाग आवेदन की जांच करते समय पात्रता की शर्तें, आवेदन की पूर्णता, जमा किए गए दस्तावेजों की प्रामाणिकता और आवेदक की उपयुक्तता देखेगा। तय प्रारूप में नहीं मिले, अस्पष्ट, अधूरे या पात्रता की शर्तें पूरी नहीं करने वाले आवेदन सीधे खारिज किए जा सकते हैं।
आवेदक को यह बताना होगा कि वह किस कोर्ट या ट्रिब्यूनल के लिए पैनल में शामिल होना चाहता है। आवेदन के साथ बायोडाटा, शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर अनुभव, बार काउंसिल नामांकन संख्या और संबंधित प्रमाणपत्र देने होंगे।
यदि वकील पहले किसी सरकारी विभाग, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, वैधानिक संस्था या अन्य संगठन के पैनल में रहा है तो उससे संबंधित आदेश की प्रति भी देनी होगी। आवेदक को विभाग की फीस और अन्य नियम एवं शर्तें मानने का लिखित अंडरटेकिंग भी देना होगा।
आवेदक को यह घोषणा भी करनी होगी कि उसे किसी आपराधिक अपराध, जिसमें नैतिक अधमता से जुड़ा अपराध भी शामिल है, में दोषी नहीं ठहराया गया है और किसी अदालत, बार काउंसिल या सक्षम प्राधिकरण ने उसे वकालत करने से अयोग्य, प्रतिबंधित या वंचित नहीं किया है।
हर साल होगी पैनल वकीलों के काम की समीक्षा
पैनल में नियुक्ति का कार्यकाल तीन साल या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, रहेगा। इसके बावजूद पैनल में शामिल वकीलों के प्रदर्शन की हर साल समीक्षा की जाएगी।
केंद्र सरकार निर्देशों का उल्लंघन करने, केस की फाइल वापस नहीं करने, कोर्ट फीस या खर्च से जुड़ी रकम का दुरुपयोग करने, अदालत की अवमानना, पेशेवर कदाचार या किसी अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने जैसे मामलों में वकील को पैनल से हटा सकती है।
पैनल में शामिल कोई वकील इस्तीफा देना चाहता है तो उसे सामान्य तौर पर कम से कम एक महीने पहले केंद्र सरकार को लिखित सूचना देनी होगी। इस्तीफा, कार्यकाल पूरा होने, नियुक्ति समाप्त होने या उसका नवीनीकरण नहीं होने की स्थिति में वकील को सभी मूल केस फाइल, रिकॉर्ड, दस्तावेज और ब्रीफ संबंधित अधिकारी को लौटाने होंगे तथा लंबित मामलों का व्यवस्थित हस्तांतरण सुनिश्चित करना होगा।
पैनल में नियुक्ति से केस मिलने की गारंटी नहीं
पैनल काउंसल को सौंपा गया कोई केस या ब्रीफ सक्षम प्राधिकारी की पूर्व लिखित अनुमति के बिना किसी दूसरे वकील को सौंपा या ट्रांसफर नहीं किया जा सकेगा। वकील को मंत्रालय, विभाग या संगठन से संबंधित सभी सूचनाओं, रिकॉर्ड और दस्तावेजों की गोपनीयता भी बनाए रखनी होगी।
दिशानिर्देशों में यह भी साफ किया गया है कि केवल पैनल में शामिल होने से किसी वकील को न्यूनतम संख्या में केस या कानूनी काम मिलने का कोई अधिकार या गारंटी नहीं होगी। किस वकील को कौन सा मामला सौंपा जाएगा, इसका फैसला पूरी तरह कानूनी कार्य विभाग के विवेक पर रहेगा। पैनल काउंसल की प्रोफेशनल फीस भी विभाग द्वारा समय-समय पर तय या संशोधित फीस शेड्यूल के अनुसार दी जाएगी।

