इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नैनीताल बैंक का मुख्य सर्वर हैक कर 16 करोड़ रुपये से अधिक की रकम उड़ाने के मामले में आरोपी मोहम्मद शहवेज की दूसरी जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि देश में साइबर अपराध एक ‘साइलेंट वायरस’ की तरह फैल रहा है, जो न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है, बल्कि समाज के भरोसे, सुरक्षा और प्रगति को भी गहरी चोट पहुंचा रहा है।
साइबर अपराध समाज के लिए बड़ा खतरा: हाईकोर्ट
जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की एकल पीठ ने 19 अगस्त को दिए अपने आदेश में कहा कि देश में तेजी से हो रहे तकनीकी विकास और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार ने जहां कनेक्टिविटी को बढ़ाया है, वहीं इसके कारण कई ऐसी खामियां भी उजागर हुई हैं जिनका फायदा साइबर अपराधी उठा रहे हैं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि ‘डिजिटल इंडिया’ जैसी पहलों ने देश के डिजिटल बदलाव की गति को तेज किया है, लेकिन इसके साथ ही फिशिंग घोटाले, रैंसमवेयर हमले, साइबर स्टॉकिंग और डेटा लीक जैसे अपराधों में भारी बढ़ोतरी हुई है। कोर्ट ने कहा कि साइबर अपराध धर्म, क्षेत्र, शिक्षा या वर्ग से परे हर व्यक्ति को प्रभावित कर रहा है और प्रतिदिन अनगिनत निर्दोष लोग अपनी मेहनत की कमाई गंवा रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के साथ हुई यह धोखाधड़ी एक गंभीर अपराध है, और ऐसे कृत्यों को बढ़ावा देना समाज के लिए गलत मिसाल कायम करेगा।
2 प्रतिशत कमीशन पर म्यूल अकाउंट देने का आरोप
यह मामला वर्ष 2024 में गौतम बुद्ध नगर के साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था। जांच के दौरान गिरफ्तार सह-आरोपी दानिश के बयान के आधार पर शहवेज की भूमिका सामने आई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शहवेज एक संगठित साइबर फ्रॉड सिंडिकेट का सक्रिय सदस्य है। उस पर आरोप है कि उसने मुख्य आरोपी उमियालाकेई एमेका उर्फ एलेक्स को दो प्रतिशत कमीशन के बदले म्यूल (फर्जी) बैंक खाते मुहैया कराए थे। पुलिस ने शहवेज को 21 अप्रैल 2025 को गिरफ्तार किया था। उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (मूल्यवान प्रतिभूति की कूटरचना), 468, 471, 120बी (आपराधिक साजिश) और 201 (साक्ष्य गायब करना) के साथ-साथ आईटी अधिनियम की धारा 66 और 66सी के तहत मामले दर्ज हैं।
समानता के आधार पर मांगी गई थी जमानत
सुनवाई के दौरान शहवेज के वकील ने उसे निर्दोष बताते हुए कहा कि उसे इस मामले में गलत फंसाया गया है और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं रहा है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि मुकदमे में अभी तक आरोप तय नहीं किए गए हैं और सह-आरोपी हर्ष बंसल को समन जारी होने के कारण प्रक्रिया में देरी हो रही है। आरोपी के वकील ने अदालत से समानता (पैरिटी) के आधार पर जमानत देने का अनुरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि इसी मामले में सह-आरोपी कुलदीप सिंह को 27 अगस्त 2025 और शुभम बंसल को 14 अगस्त 2025 को हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी है। इससे पहले शहवेज की पहली जमानत याचिका 27 नवंबर 2025 को हाईकोर्ट द्वारा खारिज की जा चुकी थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर खारिज की अर्जी
अदालत ने समानता के तर्क को अस्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के ‘सागर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले के फैसले का उल्लेख किया। हाईकोर्ट ने कहा कि जमानत देने के लिए केवल समानता ही एकमात्र आधार नहीं हो सकता। अदालत को प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका, उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की प्रकृति, सजा की गंभीरता और साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका जैसे पहलुओं का मूल्यांकन करना होता है। कोर्ट ने पाया कि याचिका में जमानत के लिए कोई नया आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है। साथ ही, आरोपी के रिहा होने पर मुकदमे की कार्यवाही प्रभावित होने और अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों से छेड़छाड़ की पूरी संभावना है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने जमानत याचिका खारिज कर दी।

