सुप्रीम कोर्ट ने वाणियम्बाडी सबवे परियोजना का समयबद्ध निर्माण पूरा करने का दिया निर्देश, 20 वर्षों से प्रयासरत नागरिक की सराहना की

सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु राज्य अधिकारियों और दक्षिण रेलवे को वाणियम्बाडी में लंबे समय से लंबित ‘लिमिटेड यूज़ सबवे’ (LUS) का निर्माण कार्य समयबद्ध तरीके से पूरा करने का निर्देश दिया है। एक स्थानीय निवासी द्वारा दायर अपील का निपटारा करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने टेंडर को अंतिम रूप देने और भूमि अधिग्रहण को लेकर अधिकारियों द्वारा दिए गए आश्वासनों को रिकॉर्ड पर लिया। इसके साथ ही अदालत ने दोनों पक्षों को आठ महीने के भीतर अनुपालन हलफनामा (अनुपालन शपथ पत्र) दाखिल करने का निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला तमिलनाडु के तिरुपत्तूर जिले में वाणियम्बाडी और केथंडापट्टी रेलवे स्टेशनों के बीच स्थित लेवल क्रॉसिंग संख्या 81 से जुड़ा है। रेलवे लाइन वाणियम्बाडी कस्बे को पूर्वी और पश्चिमी दो हिस्सों में बांटती है, और इस लेवल क्रॉसिंग का उपयोग स्थानीय निवासियों और यात्रियों द्वारा बडे पैमाने पर किया जाता है।

नवंबर 2007 में, तमिलनाडु सरकार ने दक्षिण रेलवे के साथ लागत-साझाकरण के आधार पर 13 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से इस लेवल क्रॉसिंग के स्थान पर रोड ओवर ब्रिज (ROB) के निर्माण के लिए प्रशासनिक स्वीकृति दी थी। हालांकि, बाद के मूल्यांकनों में पाया गया कि घनी आबादी वाले क्षेत्र में ROB के निर्माण के लिए भारी मात्रा में भूमि अधिग्रहण की आवश्यकता होगी और इसमें लागत भी अधिक आएगी। इसके बाद रोड अंडर ब्रिज (RUB) के वैकल्पिक प्रस्ताव पर विचार किया गया।

वर्ष 2018 में, अपीलकर्ता मदुरै फारूक अहमद ने काम शुरू करने या जनता के लिए लेवल क्रॉसिंग को फिर से खोलने की मांग को लेकर मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस दौरान बंद पड़े लेवल क्रॉसिंग को अस्थायी रूप से खोल दिया गया और हाईकोर्ट ने 18 जुलाई 2023 को याचिका का निपटारा कर दिया। इस बीच, राज्य सरकार ने दिसंबर 2019 में परियोजना को ROB से बदलकर RUB करने की मंजूरी दी और जनवरी 2021 में ‘तमिलनाडु राजमार्ग अधिनियम, 2001’ के तहत भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की।

इसके बाद राज्य राजमार्ग विभाग और दक्षिण रेलवे के अधिकारियों द्वारा किए गए संयुक्त निरीक्षण के आधार पर प्रस्ताव में फिर बदलाव किया गया और RUB के स्थान पर ‘लिमिटेड यूज़ सबवे’ (LUS) का विकल्प चुना गया। इससे आवश्यक भूमि अधिग्रहण का दायरा घटकर लगभग 5,009 वर्ग मीटर रह गया। राज्य सरकार ने 15 मई 2025 को आधिकारिक रूप से LUS के नाम से परियोजना को स्वीकृति प्रदान की।

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परियोजना का काम तेजी से पूरा कराने और समय सीमा तय करने की मांग को लेकर अपीलकर्ता ने फिर मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हाईकोर्ट ने 25 जुलाई 2025 को याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि ऐसा निर्देश देने के लिए परियोजना की लगातार निगरानी करनी होगी। हाईकोर्ट के इस आदेश से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

पक्षों की दलीलें और वर्तमान स्थिति

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने परियोजना की अद्यतन स्थिति और निष्पादन की समय-सीमा से संबंधित दस्तावेज और संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किए:

  • दक्षिण रेलवे (प्रतिवादी संख्या 2): हलफनामे के माध्यम से बताया कि LUS के रेलवे हिस्से के निर्माण के लिए टेंडर जारी कर दिया गया है, जिसमें सात बोलीदाताओं ने भाग लिया है। रेलवे ने कहा कि अनुबंध आवंटित होने और राज्य सरकार द्वारा बॉक्स कास्टिंग के लिए आवश्यक भूमि सौंपे जाने के बाद छह महीने के भीतर रेलवे हिस्से का काम पूरा कर लिया जाएगा।
  • राज्य प्राधिकारी: स्पष्ट किया कि 15 मई 2025 के आदेश के अनुसार भूमि अधिग्रहण की कार्यवाही जारी है और 26 फरवरी 2026 को भूमि अधिग्रहण अधिकारी को निर्देश भेज दिए गए हैं। राजमार्ग विभाग के हिस्से के लिए डिजाइन, अनुमान और चित्र तैयार करने की प्रक्रिया भी चल रही है।
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सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिया कि लगभग 20 वर्षों से विचाराधीन यह परियोजना अब केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित न रहकर क्रियान्वयन के चरण में पहुंच चुकी है। अदालत ने कहा कि चूंकि संबंधित अधिकारियों ने ऑन-रिकॉर्ड ठोस प्रतिबद्धताएं जताई हैं, इसलिए इस परियोजना की निरंतर निगरानी करने की आवश्यकता नहीं है।

पीठ ने एक सजग नागरिक के रूप में अपीलकर्ता के निरंतर प्रयासों की सराहना करते हुए टिप्पणी की:

“आजकल रिट अदालतों के सामने अक्सर जनहित याचिका के नाम पर ऐसी याचिकाएं आती हैं जो गहराई से देखने पर किसी वास्तविक जनहित को आगे नहीं बढ़ातीं। लेकिन वर्तमान मामला इससे अलग है। अपीलकर्ता ने यह दिखाया है कि कैसे एक जागरूक और जिम्मेदार नागरिक सार्वजनिक अधिकारियों और संवैधानिक अदालतों के साथ निरंतर और सार्थक जुड़ाव के माध्यम से पूरे समुदाय को प्रभावित करने वाले मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित कर सकता है। ऐसे सकारात्मक नागरिक सहयोग की सराहना की जानी चाहिए।”

अदालत ने आगे कहा कि “केवल परियोजना के निर्माण की लगातार निगरानी करने के उद्देश्य से इस अपील को लंबित रखने का कोई औचित्य नहीं है।”

कोर्ट के निर्देश और निर्णय

विशेष अनुमति याचिका पर अनुमति देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देशों के साथ अपील का निपटारा किया:

  1. राज्य प्राधिकारी: भूमि अधिग्रहण की लंबित कार्यवाही और अन्य आवश्यक स्वीकृतियों को तेजी से पूरा करें तथा दक्षिण रेलवे को बिना किसी देरी के भूमि सौंपना सुनिश्चित करें। इसके साथ ही राजमार्ग वाले हिस्से के डिजाइन, अनुमान और प्रशासनिक स्वीकृति की प्रक्रिया भी तेजी से पूरी करें।
  2. दक्षिण रेलवे: तय समय-सीमा के भीतर टेंडर प्रक्रिया को अंतिम रूप दे और अनुबंध आवंटन व भूमि की उपलब्धता के बाद छह महीने के भीतर अपने हिस्से का निर्माण कार्य पूरा करे।
  3. अनुपालन हलफनामा: राज्य प्राधिकारी और दक्षिण रेलवे दोनों अपने-अपने क्षेत्रों में काम पूरा होने पर, या निर्णय की तिथि से आठ महीने के भीतर, सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अनुपालन हलफनामा दाखिल करें।
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मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मदुरै फारूक अहमद बनाम प्रमुख सचिव, तमिलनाडु सरकार व अन्य

वाद संख्या: सिविल अपील नंबर [एसएलपी (सी) नंबर 31444/2025 से उत्पन्न]

पीठ: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

निर्णय की तिथि: 21 अगस्त 2026

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